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कहानियों के पीछे छूटी हुई दुनिया की तलाश है ‘छरबिंदा’ – नवनीत नीरव

बच्चों के लिए लिखना मैंने कभी अलग से नहीं सीखा। शायद बच्चों के साथ रहते-रहते, उनके लिए किताबें बनाते हुए , उनकी कहानियाँ सुनते-सुनाते और उनके बीच बैठकर उनकी दुनिया को देखते हुए यह धीरे-धीरे मेरे भीतर आता गया। पिछले कई वर्षों से बच्चों की किताबों के साथ काम करते हुए मैंने एक बात बहुत गहराई से महसूस की है—हम बच्चों के लिए बहुत कुछ लिखते हैं, लेकिन कई बार बच्चा स्वयं हमारी किताबों में उतना नहीं होता,  जितना हम समझते हैं कि वह है। हम उसके लिए कहानी लिखते हैं, लेकिन कहानी में अपनी स्मृतियाँ लेकर आते हैं। हम उसके लिए भाषा चुनते हैं, लेकिन कई बार वह भाषा हमारी होती है। हम उसकी दुनिया बनाते हैं, लेकिन उस दुनिया में उसके डर, उसकी जिज्ञासाएँ, उसकी छोटी-छोटी इच्छाएँ और उसकी अपनी कल्पनाएँ कहाँ हैं—यह सवाल मेरे भीतर धीरे-धीरे जमा होता गया। ‘छरबिंदा’ शायद उसी जमा होते हुए सवाल का परिणाम है।

बचपन को याद करना आसान है, मगर समझना मुश्किल

यह किताब इसलिए नहीं लिखी गयी, कि हिंदी में एक और बाल-कहानी संग्रह आ जाए। मैंने इसे इसलिए लिखा क्योंकि मुझे लगा कि कुछ वर्षों से कहानियाँ मेरे भीतर लगातार दस्तक दे रही हैं। वे कहानियाँ जिन्हें मैं किसी और तरह से नहीं कह पा रहा था। और शायद इसलिए ‘छरबिंदा’ मेरे लिए आठ कहानियों की किताब से पहले आठ अलग-अलग बेचैनियों की किताब है। किताब में कहानियों का क्रम उनके लिखे जाने का क्रम नहीं हैं। पिछ्ले दो दशकों से देश के अलग-अलग भागों में रहना-घूमना होता रहा है। आज जब इस आलेख को लिखने बैठा हूँ तो उनके लिखे जाने के वर्ष को उन जगहों के साथ जोड़कर याद करने की कोशिश कर रहा हूँ।

मसलन सबसे पहले लिखी गयी कहानी थी रात और मैं फिर बहादुर, जो 2005-06 में राँची, झारखंड में रहने के दौरान लिखी गयी थी। जब मैंने कहानियाँ लिखनी शुरु की थी। सबसे हालिया कहानी ‘छरबिन्दा (2024-25)‘ है, जिसका प्लॉट झारखंड में ही शिक्षकों के साथ कहानियों पर काम करते हुए विकसित हुआ। बाकी अन्य कहानियाँ जैसे बारिश, चाशनी और रॉन’, ‘बिजुरी’, ‘पुटू’, ‘हवाओं के गाँव’, ‘रॉबिन की चमकदार पोशाक’, ‘बताशे का पेड़’ दिल्ली, राजस्थान, बिहार आदि में विकसित हुईं। इनमें से हर कहानी मेरे पास किसी न किसी अनुभव, दृश्य, आवाज़, सवाल या कल्पना के रास्ते आई।

मुझे अक्सर लगता है कि बचपन को याद करना आसान है। परन्तु बचपन को समझना मुश्किल। हममें से बहुत से लोग अपने बचपन को याद करते हुए बच्चों के लिए लिखते हैं। यह स्वाभाविक भी है। हमारे पास वही अनुभव हैं। हमें वही स्कूल और गलियाँ याद हैं, वही पेड़, वही गर्मियाँ, वही बारिश, वही घर, वही लोग। लेकिन जिन बच्चों के लिए मैं आज लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, उनका बचपन मेरा बचपन नहीं है। यह बात मैं भली भाँति समझता हूँ.  इसे बार-बार खुद के लिये दुहराता रहता हूँ कि वे एक अलग समय में बड़े हो रहे हैं। उनके घर और परिवेश अलग हैं। इस समय की दोस्तियाँ भी अलग तरह से बनती हैं।

एक पिता होने के नाते इस बात को महसूस भी कर रहा हूँ। उनके आसपास स्क्रीन हैं, बाजार हैं, शहर हैं और बारंबार-लगातार आती हुई सूचनाएँ हैं। हर पल, हर घड़ी वे बहुत कुछ देखते है, लेकिन उन्हें समझते भी हैं इसमें संदेह रहता है। उनके पास हमारे समय से कहीं अधिक जानकारी है, लेकिन बहुधा एकल परिवारों में बड़े हो रहे इन बच्चों के भीतर अकेलापन कम है, ऐसा तो नहीं माना जा सकता। इसलिए मैं ‘छरबिंदा’ लिखते हुए अपने बीते हुए बचपन में लौटना नहीं चाहता था। मैं उन बच्चों के पास जाना चाहता था जो मेरे समक्ष हैं। इसलिये मैं कह सकता हूँ कि छरबिंदा की इन कहानियों में स्मृतियाँ तो हैं, लेकिन केवल स्मृतियाँ ही नहीं है। इनमें कल्पना है, सामाजिक यथार्थ है, लेकिन ये निरी सामाजिक मुद्दों की कहानियाँ बनकर नहीं रह जातीं। मैं चाहता था कि इस संग्रह की कहानियों में जीवन अपनी पूरी उलझन के साथ आए। अब जब संग्रह प्रकाशित है और मैं पीछे मुड़कर इसकी कहानियों को देखता हूँ तो लगता है कि हर कहानी ने मुझे कुछ अलग देखने के लिए मजबूर किया।

क्या बच्चे वही सीखते हैं, जो समाज उनको सिखाता है?

संग्रह की पहली कहानी ‘बारिश, चाशनी और रॉन’ मेरे लिए उन छोटी चीज़ों की कहानी है जिनसे बच्चे अपनी बड़ी दुनिया बनाते हैं। बारिश और चाशनी जैसी चीज़ें अपने भीतर केवल मौसम या स्वाद नहीं रखतीं। उनके साथ स्मृतियाँ, इच्छाएँ, रिश्ते और अनुभव जुड़ते जाते हैं। रॉन उस संसार को एक विशिष्ट मानवीय उपस्थिति देता है। मुझे हमेशा लगता रहा है कि बच्चों की दुनिया को समझने के लिए हमें उनके बड़े सवालों से पहले उनकी छोटी चीज़ों को देखना चाहिए। बच्चा कई बार दुनिया को वहीं से समझता है—एक स्वाद से, किसी आवाज़ से, किसी वस्तु से, किसी व्यक्ति से।

‘बिजुरी’ लिखते हुए मेरे सामने सामाजिक और भावनात्मक स्वीकार्यता का प्रश्न था। एक प्रकाशन के लिये ‘चाइल्ड इन केयर’ विषय पर एक युवतम पात्र की आपबीती को सुनते हुए एक सवाल लगातार बना रहा कि हम किसी व्यक्ति को देखते कैसे हैं? हम उसके बारे में निर्णय कितनी जल्दी बना लेते हैं? क्या बच्चा भी वही सीखता है जो समाज उसे सिखाता है, या उसके भीतर किसी दूसरे मनुष्य को देखने की कोई स्वतंत्र संभावना बची रहती है? मेरे लिए ‘बिजुरी’ किसी मुद्दे को समझाने वाली कहानी नहीं थी। मैं किसी निष्कर्ष तक बच्चे को ले जाना नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि वह पात्र के साथ कुछ समय बिताए और फिर अपने भीतर देखे कि वह किसी दूसरे को किस तरह देखता है।

‘पुटू’ लिखते हुए कहानी मेरे लिए मनुष्य की दुनिया से थोड़ा बाहर चली गई। एक खरगोश का बच्चा। उसकी नन्ही-सी उपस्थिति। उसके प्रति पैदा होने वाला अपनापन। और उसके साथ जुड़ी सुरक्षा, भय और स्वतंत्रता की भावनाएँ। हम बच्चों को अक्सर बताते हैं कि जानवरों से प्यार करना चाहिए। लेकिन मैं उस तरह की सीख वाली कहानी नहीं लिखना चाहता था। मुझे अधिक दिलचस्प यह लगा कि जब कोई छोटा जीव हमारे जीवन में आता है तो हमारे भीतर क्या बदलता है। क्या हम उसे केवल अपना समझने लगते हैं? क्या हम उसकी स्वतंत्रता के बारे में सोचते हैं? क्या किसी जीव की रक्षा करने और उसे अपने पास रखने में कोई फर्क है? बच्चों के साथ काम करते हुए मैंने पाया है कि वे इन सवालों को हमसे कहीं अधिक सहजता से समझ सकते हैं। शायद इसलिए कि उनके भीतर मनुष्य और दूसरे जीवों के बीच की दीवार अभी उतनी मजबूत नहीं हुई होती। इस कहानी में मैंने अपने स्मृतियों और अनुभवों को भी जगह दी है।

‘हवाओं के गाँव’ शायद उन कहानियों में से है जहाँ मैं यथार्थ से थोड़ा दूर जाना चाहता था। मुझे हमेशा लगता रहा है कि बच्चों की कल्पना को हम अक्सर कम आँकते हैं। हम कहते हैं—यह संभव नहीं है। बच्चे पूछते हैं—क्यों? हम कहते हैं—हवा का कोई गाँव नहीं होता। बच्चे शायद कहें— हो तो सकता है। कहानी इसी ‘हो सकता है’ से जन्म लेती है। हवा के गाँवों के पते देना, उनके रास्ते बनाना, उनके संसार की कल्पना करना और ‘पुर’ वाले 108 गाँवों तक पहुँचना मेरे लिए केवल फैंटेसी रचना नहीं था। मैं उस जगह जाना चाहता था जहाँ बच्चे दुनिया को उनकी दिखाई देने वाली सीमा से आगे देख सकते हैं। हमारे समय में बच्चों को बहुत जल्दी वास्तविक बना दिया जाता है। मैं उन्हें कुछ देर के लिए असंभव पर विश्वास करने देना चाहता था। क्योंकि मुझे लगता है कि कल्पना से दुनिया से भागा नहीं जाता। कई बार कल्पना ही हमें दुनिया को नए ढंग से देखने की क्षमता देती है। इन सारी बातों को कहने के लिये आधार बनी बचपन से युवा होने तक कई बार सुनी गयी एक लोककथा और उससे जुड़ा खेल जिसे अक्सर गाँव में अपने चाचा (पिता के बड़े भाई) के साथ उमस भरी रातों में छत पर नींद और राहत पाने के लिये खेला करता था।  

अपने आसपास के लोगों को हम कितना कम जानते हैं?

‘रात और मैं, फिर बहादुर’ मेरे लिए एक दूसरी तरह की बेचैनी से निकली कहानी है। बिहार-झारखंड में बचपन से युवा होते मैंने इस बात को गहरे महसूस किया है हमारे आसपास कितने लोग काम करते हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। हम उन्हें उनके नाम से नहीं, उनके काम से पहचानते हैं। चौकीदार, ड्राइवर, घरेलू कामगार, सुरक्षा कर्मचारी—वे हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा होते हैं, लेकिन उनकी अपनी कहानियाँ अक्सर हमारी निगाह से बाहर रहती हैं।

राँची में रहते हुए मुझे एक ऐसी ही घटना से दो चार होने का मौका मिला था।  जिसमें एक नेपाली चौकीदार (जिसे हमारे यहाँ बहादुर ही कहा जाता है‌) के काम को लेकर हमारे मुहल्ले में संदेह किया गया था। कई दिनों तक हवा में फुसफुसाहटें तैरती रहीं। उस चौकीदार पर हुए संदेह और उसके ऊपर लगाए गए लांछन की घटना उन वर्षों में मुझे परेशान करती रही। किसी मनुष्य के बारे में केवल इसलिए संदेह क्यों किया जाता है कि वह कहाँ से आया है? उसकी भाषा, उसका चेहरा, उसका काम या उसकी पहचान हमारे भीतर कौन-सी धारणाएँ पैदा करती है? मैं चाहता था कि कहानी इन सवालों को बाल पाठकों के सामने रखे, लेकिन उनके उत्तर न थमाये । क्योंकि पूर्वाग्रह का सबसे खतरनाक रूप वही है जिसे हम पूर्वाग्रह मानते ही नहीं।

‘रॉबिन की चमकदार पोशाक’ में एक पुरस्कृत कहानी है जिसे दिल्ली में ‘लैंगिक पहचान और समानता‘ के लिये काम करने वाली एक संस्था के लिये लिखा था। इस बात को यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ कि इस कहानी को लिखते हुए वास्तव मैं बच्चों की इच्छा और चाह की दुनिया में दाखिल हुआ था। बच्चों के लिए वस्तुएँ कभी केवल वस्तुएँ नहीं होतीं। एक चमकदार पोशाक केवल कपड़ा नहीं है। वह किसी के लिए सपना हो सकती है। किसी के लिए आत्मविश्वास। किसी के लिए दूसरों की नजर में अपने होने का प्रमाण। बड़े लोग अक्सर बच्चे की ऐसी इच्छाओं को छोटा समझ लेते हैं। ‘इतनी-सी बात के लिए?’ लेकिन बच्चे के लिए वह ‘इतनी-सी बात’ नहीं होती। मैं उस इच्छा को छोटा नहीं करना चाहता था। मैं उसे समझना चाहता था।  

लोककथाओं के साथ बिताए समय से निकली कहानी

‘बताशे का पेड़’। यह हाल के वर्षों लिखी गयी कहानी है। अपनी बेटी को सुनाने के ख्याल से कुछ पुरानी लोककथाओं को दुहराने का मौका मिला था। परिणामस्वरूप यह कहानी निकल आयी। कुछ बातें कहानी सुनाने के बाद हुई चर्चा के अधखुले सिरों से विकसित हुई। यह सवाल जिसने इस कहानी का बीज पकड़ाया कि —पेड़ पर बताशे क्यों नहीं लग सकते? मुझ जैसे वयस्क यह जानते हैं कि ‘पेड़ पर बताशे नहीं लग सकते!’ लेकिन बच्चे उस अवस्था में नहीं हैं कि इस ‘नहीं’ तक पूरी तरह पहुँचा पायें । और मुझे लगता है कि साहित्य को कभी-कभी बच्चे के इस ‘अभी नहीं’ की रक्षा करनी चाहिए।  बचपन में मैं खुद भी इस सवाल को लेकर महीनों चला हूँ। इसलिये बताशे का पेड़ मेरे लिए केवल एक मजेदार कल्पना नहीं था। आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह दो पीढ़ियों के बीच उस इच्छा का पेड़ था जिसमें दुनिया थोड़ी देर के लिए हमारी इच्छा के अनुसार बदल सकती है। मेरे विचार से कहानियों की यही तो खूबी है। वास्तविक दुनिया में जिस चीज़ के लिए हमें इंतजार करना पड़ता है, कहानी में वह अचानक सामने आ सकती है।

बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में कुछ वर्षों तक राजकीय विद्यालयों के शिक्षकों के साथ काम करते हुए बहुत से ऐसे विषय मिले, जो प्रथम दृष्टयता मामूली लगते हैं। इतने मामूली और छोटे जिनके बारे कोई एक बात भी संभव नहीं हो, अगर बड़ों की नज़र से देखें तो। इसलिये शायद शीर्षक कहानी ‘छरबिंदा’ मेरे लिए सबसे छोटी चीज़ से सबसे बड़ा सवाल पूछने की कोशिश है। एक छोटा-सा जीव। इतना छोटा कि हम उसे आसानी से देखे बिना उसके ऊपर से गुजर सकते हैं। लेकिन कहानी में जब वही छोटा जीव हमारे सामने ठहरता है तो अचानक हमारी अपनी जगह बदल जाती है। होपोन, एमिली और उस छोटे-से जीव के बीच बनने वाला संबंध मुझे इसलिए महत्वपूर्ण लगा क्योंकि मैं मनुष्य को हमेशा कहानी का केंद्र मानकर नहीं चलना चाहता था। हमारे आसपास कितनी जिंदगियाँ हैं जिन्हें हम देखे बिना जीते रहते हैं। एक कीड़ा भी डरता होगा। उसे भी जीवन प्रिय होगा। उसकी भी अपनी एक दुनिया होगी। यह विचार मेरे लिए पर्यावरण से अधिक संबंध का विचार है। पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना केवल इसलिए जरूरी नहीं कि पर्यावरण बचाना है। यह इसलिए भी जरूरी है कि हम अपने अलावा किसी दूसरे जीवन की उपस्थिति को महसूस करना सीखें।

अब संग्रह प्रकाशित है। ‘छरबिंदा’ की आठों कहानियों को साथ रखकर देखता हूँ तो उनमें एक चीज़ मुझे बार-बार दिखाई देती है—मैं यथार्थ और फैंटेसी के बीच दीवार नहीं बना पाया। और अब लगता है कि शायद बनानी भी नहीं चाहिए थी। समाजिक यथार्थ पर काम करने वाले अक्सर फैंटेसी से दूरी बनाए रखते हैं और फैंटेसी को हल्के-फुलके साहित्य के भरोसे छोड़ दिया जाता है। ‘रात और मैं, फिर बहादुर’ जैसी कहानी हमें सामाजिक यथार्थ की ओर ले जाती है। ‘हवाओं के गाँव’ हमें हवा के जादुई संसार में ले जाती है। ‘बताशे का पेड़’ में फैंटेसी का पुट ही असंभव को संभव बनाता है। ‘पुटू’ मनुष्य और दूसरे जीव के बीच संबंध की ओर ले जाता है। ‘छरबिंदा’ एक छोटे जीव के माध्यम से हमारी मनुष्य-केंद्रित दृष्टि को थोड़ा हिलाती है। मेरे लिए ये अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। बच्चे की दुनिया में ये सब एक साथ रहते हैं। एक बच्चा स्कूल से लौटते हुए किसी सामाजिक विसंगतियों को देख सकता है और उसी शाम हवा के गाँव की कल्पना भी कर सकता है। वह किसी चौकीदार के प्रति समाज के व्यवहार को महसूस कर सकता है और अगले ही क्षण बताशे के पेड़ पर विश्वास कर सकता है। बच्चे की दुनिया में यथार्थ और कल्पना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। तो फिर कहानी में वे क्यों हों?

‘बचपन को समझने की एक खिड़की’

बच्चों के साथ लंबे समय से काम करते हुए मेरी सबसे बड़ी सीखों में से एक यह है कि बच्चे उतने सरल नहीं हैं जितना हम उन्हें मान लेते हैं। वे बहुत कुछ समझते हैं। कई बार वे वह भी समझ लेते हैं जिसे हम उनसे छिपाना चाहते हैं। वे हमारे व्यवहार को पढ़ते हैं। हमारी आवाज़ पढ़ते हैं। हमारी चुप्पी पढ़ते हैं। हमारे पूर्वाग्रह पढ़ते हैं। और अपनी दुनिया भी बनाते हैं। इसलिए मैं उनके लिए लिखते हुए भाषा को बहुत आसान करके, भावनाओं को बहुत साफ करके और दुनिया को बहुत सुरक्षित बनाकर उन्हें छोटा नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कि कहानी में कुछ ऐसा भी रहे जिसे वे अपने अनुभव से पूरा करें।

हिंदी बाल-साहित्य में अलग-अलग प्रकाशन संस्थानों ने जिस तरह बच्चों की किताबों, चित्रों, भाषा और कल्पना के लिए जमीन तैयार की है, उससे मेरा अपना रचनात्मक संसार भी अछूता नहीं है। उनके काम ने यह संभव किया कि हम बच्चों की किताब को केवल पाठ्य सामग्री न मानें। लेकिन किसी भी साहित्यिक परंपरा के भीतर अगली किताब को अपने प्रश्न लेकर आना ही होता है। मेरे प्रश्न अलग थे। मैं पूछ रहा था— आज का बच्चा किस तरह की दुनिया में रह रहा है? उसके आसपास कौन लोग हैं? वह किन जीवों के साथ यह दुनिया साझा करता है? वह किन पूर्वाग्रहों को विरासत में पा रहा है? उसकी अपनी इच्छाएँ क्या हैं? और उसकी कल्पना कितनी दूर तक जा सकती है? ‘छरबिंदा’ शायद इन सवालों के मेरे अपने उत्तरों की किताब है। यह किसी परंपरा को खारिज करने की कोशिश नहीं है। यह उस परंपरा के भीतर अपनी आवाज़ खोजने की कोशिश है।

मैंने कहानियाँ लिख दी हैं। अब वे मेरी नहीं रहीं। अब वे उन नव पाठकों की हैं जो उन्हें पढ़ते हुए अपने भीतर कोई ऐसी जगह खोज ले, जिसके बारे में उसे खुद भी पहले पता न था। ऐसा मेरा विश्वास है।

किताब – छरबिन्दा

लेखक – नवनीत नीरव

चित्रकार – निखिल खत्री

मूल्य – 249 रुपये

प्रकाशक – अनबाउंड स्क्रिप्ट, नई दिल्ली

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