
किताब ‘बारह सौ की बाटी और अन्य किस्से’ को ‘चिल्ड्रन्स बुक ऑफ़ द ईयर’ पुरस्कार से सम्मानित हुए लगभग एक साल होने वाला है। लेकिन इसके किस्सों पर बातचीत थमी नहीं है और थमे भी क्यों, जब लेखक शिवनारायण गौर के साथ लगभग रोज़ यूँ ही घूमते-फिरते बातचीत चलती रहती है। हर बार उनके कुछ नए किस्से फूट पड़ते हैं। उन्हें क़रीब से जानने वाले जानते हैं कि लोगों के बीच सादगी से मुस्कराते रहना और अपने आसपास के लोगों को ध्यान से सुनना उनका एक सहज स्वभाव है। उनकी यही आदत इस किताब के हर किस्से में बोलती है।
इस लेख में
हम किसकी कहानियाँ पढ़ते हैं?
किसी व्यक्ति के बारे में पढ़ना हो, तो हम ज़्यादातर सफल या महान माने जाने वाले लोगों की कहानियाँ चुनते हैं। स्कूल के दिनों से हमें यही सिखाया भी जाता है। आम लोगों की कहानियाँ पढ़ने के बारे में न हमसे बात की जाती है, न हम ख़ुद इस पर सोचते हैं। जबकि अपने आसपास के लोगों को हम रोज़ देखते हैं। लेकिन क्या सचमुच उन्हें देखते हैं?
किसी की कोई ख़ास आदत, किसी चीज़ से उसका विशेष लगाव, किसी काम को करने का उसका अपना एक ख़ास ढंग, या उसकी कोई ऐसी बात जिसे देखकर हम कह उठते हैं, “ये भी क्या आदमी है!” ऐसी बातें अक्सर हमारी नज़र के सामने से यूँ ही गुज़र जाती हैं। ‘बारह सौ की बाटी और अन्य किस्से’ ऐसे ही लोगों और उनकी अपनी-अपनी धुन से हमारा परिचय कराती है।

किताब की भूमिका में लेखक निदा फ़ाज़ली के इस मशहूर पंक्तियों को याद करते हैं –
“हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो कई बार देखना…” – निदा फ़ाज़ली
यानि हर आदमी के भीतर दस-बीस आदमी होते हैं, इसलिए किसी को जानना हो तो उसे कई बार देखना चाहिए। शायद यही बात इस किताब को समझने का सबसे अच्छा सूत्र है। लेखक अपने आसपास के लोगों को केवल उनकी सामान्य पहचान से नहीं देखते। वे उन ख़ूबियों को पकड़ते हैं, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती हैं। वे लिखते हैं कि इन किस्सों के किरदारों ने अपनी मौलिकता पर लगाम लगाना नहीं सीखा। वे दूसरों की परवाह किए बिना अपने ढंग से जीने की कोशिश करते हैं।
जिज्ञासा बढ़ाते हैं कहानियों के शीर्षक
यही वजह है कि किस्सों के शीर्षक ही उत्सुकता जगा देते हैं: ‘गुड्डू भैया की साइकिल’, ‘सेठजी की चक्की’, ‘बारह सौ की बाटी’, ‘साइकिल वाले चाचा’, ‘गणेश मामा का वाद्य यंत्र’, ‘छपका दादा का सौ का नोट’, ‘महेश का साँप-प्रेम’, ‘सूर्यवंशी जी की घड़ी’ और ‘सोना जी की साइकिल’। इन नामों में ही व्यक्ति का किसी ख़ास चीज़, आदत या लगाव से रिश्ता झलकने लगता है। पाठक के मन में सवाल उठने के लिए इतना काफ़ी है कि आख़िर इन लोगों में ऐसा क्या है, जिस पर पूरा किस्सा लिखा गया? और यहीं से किताब की असली दुनिया खुलती है।
इन किस्सों की घटनाएँ बहुत बड़ी नहीं हैं। इनके पात्र हमारे आसपास रहने वाले लोग ही हैं। लेकिन लेखक की नज़र साधारण में छिपी असाधारणता को सामने ले आती है। किसी के लिए उसकी साइकिल सिर्फ़ साइकिल नहीं रह जाती। किसी की घड़ी केवल समय देखने की चीज़ नहीं रहती। और किसी चीज़ से किसी का लगाव ही उसके व्यक्तित्व को समझने का रास्ता बन जाता है।

लेखक इन पात्रों के पूरे जीवन की कहानी नहीं लिखते। वे उनके व्यक्तित्व की कुछ प्रमुख रेखाएँ खींचते हैं: उनकी आदत, उनकी धुन, उनका व्यवहार, उनकी बातचीत, उनकी पसंद या किसी चीज़ से उनका रिश्ता। इन्हीं कुछ रेखाओं से पाठक के मन में पात्र की पूरी छवि उभरने लगती है। छोटी-छोटी घटनाएँ केवल घटना सुनाने के लिए नहीं आतीं। वे धीरे-धीरे किरदार की परतें खोलती हैं। किरदार को इस तरह उभारने के ढंग से ही ये रचनाएँ किस्से और रेखाचित्र का सुंदर मेल बन जाती हैं।
हम कहानी के पात्रों पर हँस रहे हैं या इनके साथ?
किताब में लेखक का अपने पात्रों के प्रति नज़रिया भी बहुत अहम है। वे इन पात्रों के अनोखेपन को केवल मज़ाक का विषय नहीं बनाते, बल्कि उनके भीतर की मौलिकता को देखते हैं। कोई व्यक्ति दूसरों की नज़र में भले मज़ाक हो, लेकिन उसकी अपनी दुनिया है, अपनी पसंद है और अपने ढंग से जीने की इच्छा भी है। यही नज़र इन किस्सों को मज़ाक बनने से बचाती है।
इसलिए किताब को पढ़ते हुए बार-बार यह सवाल मन में उठता है कि हम इन लोगों पर हँस रहे हैं या इनके साथ हँस रहे हैं। दोनों में फ़र्क़ है। किसी का मज़ाक उड़ाना और उसकी अनोखी ख़ूबी को पहचानकर मुस्कराना, एक बात नहीं है। इन किस्सों में लेखक का नज़रिया साफ़ तौर पर दूसरी ओर जाता दिखाई देता है।

इस किताब का एक और मज़बूत पक्ष है अपने परिवेश से इसका गहरा जुड़ाव। लेखक को अपने पात्र खोजने के लिए किसी असाधारण जगह जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। भूमिका में भी साफ़ कहा गया है कि ये सभी किस्से हमारे आसपास के हैं। ये किस्से यह भी बताते हैं कि हमारे आसपास कुछ लोग पीढ़ियों से रहते हुए भी लगभग गुमनाम ही रह जाते हैं। उनका बस नाम भर होता है, उनकी कहानी कोई नहीं जानता।
किताब पढ़ने के बाद यह बात और ज़रूरी लगने लगती है। हो सकता है पाठक अपने आसपास के लोगों को थोड़ी अलग नज़र से देखने लगे। रोज़ मिलने वाला चायवाला, साइकिल से आने वाला कोई व्यक्ति, फेरीवाली, दुकान पर बैठी कोई बुज़ुर्ग, या किसी ख़ास आदत के लिए पहचाना जाने वाला कोई पड़ोसी, अचानक लगे कि इनके भीतर भी कोई कहानी है। इस अर्थ में यह किताब केवल किस्से नहीं सुनाती, किस्से देखने की नज़र भी देती है।
चित्रांकन और कहानियों का सुंदर समन्वय
नीलेश गेहलोत के बनाए चित्र इस अनुभव को और समृद्ध करते हैं। वे अपने चित्रांकन में पात्रों और उनके संसार को दृश्य रूप देते हैं और पाठक को किस्सों की दुनिया की कल्पना करने में मदद करते हैं। चित्रों की सहजता और उनमें दिखती आसपास की दुनिया, किस्सों के परिवेश से पूरी तरह मेल खाती है।
पढ़ते-पढ़ते एक बात समझ में आती है। किसी व्यक्ति को सचमुच जानने के लिए उसे एक नज़र देखना काफ़ी नहीं। उसे कई बार देखना पड़ता है। उसकी आदतों को, उसकी धुन को, उसकी छोटी-छोटी बातों को और अपने ढंग से जीने की उसकी कोशिश को।
‘बारह सौ की बाटी और अन्य किस्से’ इसी देखने की कला की किताब है। किस्सों के ज़रिए व्यक्तित्व को पकड़ने की, और व्यक्तित्व के ज़रिए अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा और क़रीब से देखने की किताब। हमारे आसपास कितने ऐसे लोग हैं, जिन्हें हम रोज़ देखते हैं, लेकिन अभी तक देखा नहीं है?
किताब: बारह सौ की बाटी और अन्य किस्से
लेखक: शिवनारायण गौर
चित्र: नीलेश गेहलोत
प्रकाशक: एकलव्य
(समीक्षक: कुँवर सिंह को किताबें पढ़ना और उन पर बातचीत करना पसंद है। वे एकलव्य के प्रकाशन कार्यक्रम में प्रसार-प्रचार टीम के सदस्य हैं और किताबों को पाठकों तक पहुँचाने का काम करते हैं। साथ ही वे एकलव्य के ‘लाइब्रेरी से दोस्ती’ कोर्स की टीम से भी जुड़े हैं। उनकी पुस्तक समीक्षाएँ ‘द बुक रिव्यू’ पत्रिका, उदंती.कॉम और एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन कविताएँ, ‘हमारी बात’, ‘समय’ और ‘सुना, फिर से’, ‘समकालीन जनमत’ पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं।)
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