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जश्न-ए-बचपनः पहेलियों की दुनिया को विस्तार देते बच्चे , क्या आप जानते हैं इनके जवाब?

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वर्तमान में जबकि देखा जा रहा है बच्चों को पढ़ाई के नाम पर फिर एक बार ऑनलाइन के बहाने व्यस्त रखने की कोशिशें हो रही है। तब जश्न-ए-बचपन व्हाट्सएप्प ग्रुप का निर्माण इस आशा के साथ किये गए है कि बच्चा दिन में थोड़े ही समय सही संगीत, सिनेमा, पेंटिंग, साहित्य और रंगमंच से जुड़ अपनी भीतर मौजूद रचनात्मकता को प्रकट करे। मजे-मजे में अपनी रुचि के अनुरूप कुछ मस्ती करते हुए सीख भी ले। इसमें साहित्य का पन्ना महेश पुनेठा, सिनेमा संजय जोशी, ओरेगामी सुदर्शन जुयाल, पेंटिंग सुरेश लाल और कल्लोल चक्रवर्ती, रंगमंच जहूर आलम और कपिल शर्मा मुख्य रूप से इससे जुड़े हुए हैं।

रचनात्मक शिक्षक मण्डल की स्कूली बच्चों के लिए एक शानदार पहल

साहित्य का पन्ना देख रहे महेश पुनेठा ने पिथोरागढ़ से यात्रा वृतांत पर बातचीत रखी। जिसे आप भी सुन सकते है। कल 16 अप्रैल को जाने माने फ़िल्म समीक्षक संजय जोशी दिल्ली से बच्चों की रुचियों को ध्यान में रख सिनेमा पर बातचीत रखेंगे। 17 अप्रैल को संगवारी दिल्ली के कपिल शर्मा बच्चों को रंगमंच की जानकारी देंगे। भविष्य में अनेकानेक अन्य एक्सपर्ट्स भी बच्चों से बातचीत करेंगे।

एक्सपर्ट्स द्वारा रखी गयी बातचीत पर बच्चे दिन भर अपनी सुविधानुसार बातचीत रखते है और एक्सपर्ट्स उनसे लगातार संवाद में रहते हैं। अबतक 50 से अधिक बच्चे इस अभियान से जुड़ चुके हैं। यदि आप भी अपने बच्चे को इस अभियान से जोड़ना चाहते है तो मोबाइल नम्बर 9536572514 पर व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर सकते हैं।

इसी कड़ी में बच्चों ने कविताओं के साथ-साथ पहेलियों के लेखन में भी प्रयास किया। आपके साथ साझा हैं, उनकी लिखी पहेलियां। अगर आपको इनका जवाब पता है तो लिखिए कमेंट बॉक्स में।

पहेलियों की दुनिया को विस्तार देते बच्चे

(1) कद का लंबा है,
पर मोटा नहीं।
पत्ते भी लंबे है,
पर पेड़ छोटा नहीं।
छाल इसकी है सफेद,
पत्तों में मोहक सी महक।
दूर देश से लाया गया कहीं,
है भारत इसका मूल नहीं। – कृति अटवाल

कविताः ‘जितनी जरूरत है, उतने में संतोष करो’

(2) हर कमरे में इसका वास,
दिखने में ना कुछ ख़ास।
हर घर में पाई जाती,
संख्या है, पैरों की आंठ।
घर इसका कतई मजबूत,
जहां-तहां ये घर बनती।
जटिल सा है घर इसका,
उसमे ही खाना फसाती। – कृति अटवाल

कविताः कहते जिसे लोग सोने की चिड़िया

(3) मेरा एक साथी!
यूँ क्यों घूरता है तू मुझे?
कभी निहारता ,कभी हँसाता,
जो मैं बोलूँ मान जाता चुप-चाप,
थकती नहीं क्या आँखे तेरी?
जो हमेशा रखता है खुली।
तेरा घर तो नुकीला और लंबा,
पर मेरे कमरे में चार चाँद तू लगा देता है।
प्रतिबिंबों की दुनिया समाए ,
अलग पर हमारे जैसा संसार लिए चलता है। -दीपिका(10th)

कविताः ऐसे कैसे दोस्त?

(4) ऊंची – नीची मेरी पीठ ,
ना मै ऊंट ,ना मैं बकरी,
खाई थी तुमने मेरी ककड़ी ,
खेले थे तुम मेरी बाड़ में,
भूल गए शहरों की आड़ में,
इतनी जल्दी ना भुलाओ,
चलो, अब मेरा नाम बताओ। -राधा पोखरिया

कविताः सुबह की ठंडी हवा और प्रकृति की मोहक सुंदरता

(6) लाल दाँत हैं इसके भयानक से,
पर किसीको न है कोई ख़तरा इससे।
दाँत ऐसे न दाँत जैसे,
न जाने ये हैं किसके जैसे।।
# रिया(10वीं)
– नानकमत्ता पब्लिक स्कूल

बच्चों की लिखी पहेलियां

(सभी बच्चे उत्तराखंड के नानकमत्ता पब्लिक स्कूल मे अध्ययनरत हैं। अपनी स्कूल की दीवार पत्रिका के सम्पादक मंडल से भी जुड़े हैं। अपने विद्यालय के अन्य विद्यार्थियों के साथ मिलकर एक मासिक अखबार भी निकालते हैं। जश्न-ए-बचपन की कोशिश है बच्चों की सृजनात्मकता को अभिव्यक्ति होने का अवसर मिले।)

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