
1. साबित्रीबाई फुले ने ज्योतिराव के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। इस स्कूल में पढ़ाने की शुरूआत उन्होंने खुद की। उनके इस क़दम का उस समय काफी विरोध हुआ था, मगर उन्होंने दलित महिलाओं को शिक्षित करने के अपने सेवा कार्य से पीछे नहीं हटीं।
2. साबित्रीबाई फुले ने खुद शिक्षक की भूमिका निभाई। उस दौर में किसी महिला का शिक्षक होना बहुत बड़ी बात थी। किसी दलित महिला के लिए तो ऐसा करना बेहद महत्वपूर्ण और रेखांकित करने वाली बात थी। इसी क़दम ने उनको देश की पहली महिला शिक्षक बना दिया। उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में भी मनाते हैं।
3. साबित्रीबाई फुले शिक्षक होने के साथ-साथ नारीमुक्ति आंदोलन की पहली नेता भी थीं।
4. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने आत्महत्या करने के लिए जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया।
5. वे एक कवियत्री भी थीं। उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं…
“जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो.”
(एक मराठी कविता का हिंदी अनुवाद )
