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शिक्षक डायरी: नये स्कूल में कैसे काम आए ‘लाइब्रेरी के पुराने अनुभव’?



लगभग 11 वर्षों तक एक प्राथमिक शाला में कार्य करते हुए लाइब्रेरी को सजीव बनाए रखने के सभी जरूरी प्रयास निरंतर किए। प्रतिवर्ष बहुत से बच्चे लाइब्रेरी गतिविधियों में सक्रिय प्रतिभाग करते हुए, सीखते हुए और अपने मन की बातें लिखते हुए आगे बढ़ते और सत्र पूर्ण होने पर विद्यालय से चले भी जाते। फिर नए बच्चों के साथ शुरुआत से ही काम करना होता । इस प्रकार लाइब्रेरी को नए-नए बच्चों के लिए तैयार करना एक चुनौती हमेशा बनी रहती थी।

गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुल गए थे । मैंने बहुत सी नई किताबें भी खरीदी थी और पढ़ भी ली थी।  सत्र शुरू होने से पूर्व मैंने लाइब्रेरी के लिए बहुत सी तैयारी कर ली थी। खास करके बहुत से कविता पोस्टर तैयार किए थे और अपने कक्ष को प्रिंट समृद्ध और आकर्षक बनाने की कोशिश कर रहा था। तभी मुझे सूचना मिली कि सरप्लस टीचर समायोजन ट्रांसफर खुल गए हैं। वरिष्ठ अध्यापक होने के कारण मुझे ही वहां से जाना था। भारी मन और बड़ी उहापोह के बीच मैंने भी फॉर्म भरा और एक नए विद्यालय में मेरा ट्रांसफर दो जुलाई को हो गया।

एक नयी शुरुआत

नया विद्यालय, नए परिवेश और नए बच्चों के बीच घुलने मिलने में मुझे बहुत समय नहीं लगा,  क्योंकि पीछे का एक बड़ा अनुभव मेरे साथ था, और काम करने की लगन ने बच्चों के साथ मेरी दोस्ती सहजता से करवा दी। मुझे अच्छी तरह पता था कि बाल मनोविज्ञान बाल गीतों, कविताओं और कहानियों से कैसे प्रेरित होता है ? यदि शुरुआत से ही पढ़ाई के बोझल तरीके को ही अपनाया होता तो शायद शुरू से ही बच्चों का  जुड़ाव नहीं हो पता। परंतु मैंने प्रथम कार्य दिवस से ही बच्चों के साथ कहानी और  गीतों के सत्र प्रारंभ किए। यहां तक की सवेरे की प्रार्थना सभा में भी कुछ बदलाव हुए।

पहली किताब “छुटकी उल्ली”

मैंने कक्षा चार और पांच में प्रतिदिन एक नई किताब प्रस्तुत करने का नियम बनाया और उन्हें कहानी सुनाना शुरू किया। छुटकी उल्ली से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा । छुटकी उल्ली ने उनके मन को कहानी सुनाने के लिए तैयार कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि यह उनकी ही कहानी है । कहानी में एक बच्चा अपनी माँ से संवाद ही तो कर रहा है। कितना माधुर्य है माँ और बेटी के इस संवाद में। मैंने पूरे हाव-भाव से कहानी पढ़ कर सुनायी।

मेरी हमेशा इच्छा होती है कि बच्चे अपने तरीके से अपनी शब्दावली का प्रयोग करते हुए कहानी कहें क्यूंकि जब ये नयी पीढ़ी कहानी कहना सीख लेगी तभी तो कहानियों में रुचि बनेगी और तभी तो नई कहानियाँ लिखी और पढ़ी जाएंगी। बच्चों ने स्वयं कहानी सुनाई,ये इस नए स्कूल के बच्चों का शायद पहला प्रयास भी था। मैं चाहता था कि बच्चे कहानियों में छिपा आनंद पाएं और कहानियाँ उनके जीवन, सोच ,समझ और बातचीत का हिस्सा बनें।

रोल प्ले की तैयारी

मैंने बच्चों को इसी कहानी को एक नाटक के रूप में खेलने के लिए कहा। उन्हें मेरा विचार अच्छा लगा। वे उत्सुक थे। अगले दिन मैं अपना जादुई झोला लेकर स्कूल पहुँचा जिसमें कई पोस्टर, रंगीन काग़ज़,कपड़ों की कतरने, ऊन, कैंची, गोंद आदि रहते थे। हमने सभी ने मिलकर 2 मास्क बनाए- एक उल्लू मां का और एक  उल्ली  बेटी का। मास्क वास्तव में बहुत अच्छे बने थे। कुछ आवश्यक निर्देश के साथ हमने कहानी को नाटक की तरह खेला। फिर स्वतंत्र रूप से बच्चों ने मास्क पहनकर कहानी का रोल प्ले  किया। यह बहुत ही मजेदार था।  क्रमबद्ध तरीके से हाव भाव के साथ कहानी सुनना या उसे खेल की तरह खेलना काफी रोमांचकारी और बच्चों के लिए उत्साह जनक था।

संवाद की शुरुआत और सवाल पूछना

मेरे लिए किताब के चयन का एक उद्देश्य तो कहानी कहने सुनने की शुरुआत तो था परंतु मुख्य उद्देश्य बच्चों को बातचीत के लिए तैयार करना,  उन्हें बोलने के अवसर देना और सवाल करना सिखाना था। अगले दिन मैंने पाठ्यक्रम अनुसार पढाई हो जाने के बाद बच्चों से पूछा कि इस कहानी में उल्ली अपनी माँ से प्रश्न करती है? आपने भी कभी अपनी माँ से प्रश्न किए होंगे? आप अपनी माँ से कैसे बातचीत करते हैं?

काफी प्रयास करने के भी कक्षा का सन्नाटा बरकरार रहा। मेरे लिए यह कोई असहज स्थिति नहीं थी क्यूंकि मैं ऐसी चुनौतियों के लिए अभ्यस्त हूँ। किसी भी नए समूह से आशा करना कि वे सोचने समझने के स्तर पर एक दम पहली बार में ही प्रतिक्रिया देंगे, उचित नहीं है क्यूंकि वास्तव में उन्हें पता ही नहीं होता कि उन्हें क्या कहना है। ऐसे में जो सूत्र सबसे काम का है वह यह कि चर्चा की शुरुआत हमे स्वयं (कक्षा अध्यापक को) करनी चाहिए।  जब हम अपने संस्मरण सुनाते हैं तब बच्चों का दिमाग सक्रिय होने लगता है और वे अपने जीवन में झाँकना शुरू करते हैं। तब उनकी भी कहानियाँ सदन में आने लगती हैं।

धीरे धीरे करके सबने अपने सवाल पूछे और एक नन्हा साथी अरविंद (कक्षा 5) उन्हें बोर्ड पर लिखता गया। बच्चों के बनाये सवालों में विविधता थी,  बच्चों के मुख पर चमक थी और मेरे मन में संतोष युक्त उत्साह।

(लेखक परिचय: जय शेखर जी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी विद्यालय में बतौर शिक्षक कार्य कर रहे हैं। पुस्तकालय, भाषा शिक्षण और बच्चों को दीवार पत्रिका ‘तितली’ के माध्यम से उनके रचनात्मक योगदान का सिलसिला सतत जारी है। उन्होंने इस लेख में उन्होंने अपने नये विद्यालय में बच्चों के साथ सहज होने और बच्चों के साथ पुस्तकालय के अनुभवों को जीवंत बनाने के प्रयास व अनुभवों को रेखांकित किया है।)

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