अपने नये विद्यालय में ‘छुटकी उल्ली’ कहानी पर विविध तरह का कार्य करने के बाद मैंने बच्चों के बीच में जो नयी किताब रखने का विचार किया उसके प्रति भी मेरी एक सजगता थी। मैं किताबों के बृहद संसार से ऐसी किताब लेना चाहता था जो उन्हें पहली किताब से जोड़कर भी रखे और उस पहली किताब की स्मृति भी बनी रहे। तो मैंने अपने पुस्तक संग्रह से भूरी बाई द्वारा बनाई गई किताब “सो जा उल्लू” चुनी।
भूरी बाई की कहानी “सो जा उल्लू “
नए विद्यालय में लाइब्रेरी प्रैक्टिस के क्रम में लगभग तीसरे या चौथे दिन मैंने भूरी बाई द्वारा लिखित किताब “सो जा उल्लू “ प्रस्तुत की क्योंकि यह किताब मुझे बहुत प्रिय थी। इसका प्रमुख कारण किताब में बने हुए चित्र थे जो क्षेत्रीय भीली कला को प्रदर्शित करते थे। मुझे हमेशा लगता था कि ऐसे चित्र बच्चों को ज्यादा आकर्षित करते हैं और उन्हें यह महसूस होने लगता है कि ऐसे चित्र तो हम भी सहजता से बना लेंगे ।
इस कहानी में एक तारतम्यता थी। उल्लू सोने की कोशिश कर रहा था और उसको मधुमक्खी अपनी भिन-भिन से, गिलहरी बीज फोड़ते हुए उसकी आवाज से, कबूतर गुटर गू से, कौवा कांव-कांव से, हिरण अपने सींघ पेड़ पर रगड़ कर, तो कठफोड़वा खटखट चोंच मार कर आवाज़ करते रहते हैं जिससे दिन भर उल्लू सो नहीं पाता।
कहानी के चित्रों पर चर्चा
छुटकी उल्ली श्याम श्वेत चित्रों से सजी किताब थी जबकि ‘सो जा उल्लू’ कहानी के सभी चित्र बड़े ही रंग बिरंगे थे। इस प्रकार मुझे अपनी दो ही किताबों के माध्यम से बच्चों के बीच चित्रों पर चर्चा करने का मौका मिला।
मुझे यह अच्छी तरह से पता था कि मौलिक लेखन की शुरुआत चित्रों के बनाने से ही हो सकती है। जब बच्चे किताबों में चित्र देखते हैं तो वे बड़े खुश होते हैं परंतु कक्षा में अध्यापक की यह जिम्मेदारी होती है कि वह चित्रों में छिपे गहरे अर्थो और रहस्यों की परतों को बच्चों के बीच खोलें , उन पर चर्चा करें, चित्रों के महत्व पर बातचीत करें।
मैंने भी सरलता से दोनों किताबें दिखाते हुए बच्चों से यह जानना चाहा कि आखिर कौन सी किताब उन्हें देखने में ज्यादा सुंदर लगती है? सभी बच्चों का कारण सहित यही जवाब था कि सोजा उल्लू के चित्र बड़े सरल और मन को छूने वाले हैं।
कहानी की लेखिका और चित्रकार भूरी बाई से परिचय
इसी बहाने मैंने बच्चों का परिचय भूरी बाई से कराया। उनके बारे में बहुत सी बातें बताईं। भोपाल के भारत भवन में उनके द्वारा बनाए चित्रों के बारे में बताया। भूरी बाई को उनकी विशेष चित्रकला के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार भारत सरकार से प्राप्त हुआ था, यह भी बताया। इस प्रकार चित्रों पर चर्चा करते हुए बच्चों का परिचय चित्रकार के व्यक्तित्व से कराने का भी या एक बेहतरीन अवसर था। यही से हम बच्चों की लेखक और चित्रकार में जिज्ञासा पैदा कर सकते हैं ।
यह सजकता अध्यापक की है। यह सजकता उस समय ज्यादा आश्चर्य चकित करती है जब बच्चे कहानी को पढ़कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह किसने लिखी है अथवा चित्र देखकर यह पता लगा लेते हैं कि यह किस चित्रकार की शैली में बने हुए चित्र हैं।
अपनी कहानी गढ़ने की तैयारी
चूंकि पिछले विद्यालय में मैं कहानी लेखन का एक लंबा सफर तय करके आया था इसलिए मेरी यह गहरी इच्छा थी कि नए बच्चों के साथ भी कहानी लिखने का सफर कुछ नए तरीके से शुरू किया जाए। मैंने इसी कहानी के इर्द-गिर्द बच्चों से चर्चा करते हुए मुनिया के सो जाने के ऊपर कहानी लिखने की बात की।
मुनिया के सोने को लेकर बच्चे काफी चिंतित हुए , उसके सोने में कौन-कौन सी चीज बाधक हो सकती थी इस पर काफी विचार विमर्श हुआ और वह सभी प्वाइंट्स हमने श्यामपट्ट पर लिखे। फिर बच्चों को चित्र बनाने की जिम्मेदारी दी गई। क्योंकि चित्र बनाने का उनका यह प्रथम अभ्यास था तो मैंने उनको समझाया कि वह जिस भी तरीके से सोच समझ सकते हैं वैसे चित्र बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके पूर्व मैंने अपने पुराने बच्चों के बने कुछ चित्र इन बच्चों को दिखाएं जिससे उन्हें यह एहसास हो सके कि हिंदुस्तान के कोने कोने मे बैठे बच्चे किस तरह से चित्र बना रहे हैं।
समूह कार्य और हमारी पहली कहानी तैयार
बच्चों ने समूह में कार्य किया, चित्र बनाए और कहानी का ड्राफ्ट तैयार हुआ हम सभी इस बात पर अटके हुए थे कि मुनिया सोने की कोशिश करती रही तो फिर आखिर में कहानी में क्या होगा? तभी कक्षा के बीच में एक बच्चे ने कहा कि अगर मुनिया रात भर नहीं सो पाएगी तो स्कूल में आकर सो जाएगी। मुझे तो जैसे लगा कि क्या शानदार जवाब है और बस हमारी कहानी तैयार हो गई। चित्रों को बनाने में भी मैंने बच्चों की थोड़ी बहुत मदद की।
पिछली बार और अबकी बार में अंतर
पिछली बार इसी कहानी पर काम करते हुए हमने दीवार पर बहुत बड़े मांडने बनाए थे जिसमें दीवार को चिकनी मिट्टी से लीप कर उस पर गेरू, चूना, हल्दी, कोयला आदि के प्रयोग से चित्र बनाए थे और पूरी कहानी को विद्यालय की दीवार पर प्रदर्शित किया था। जबकि इस बार एकदम नई कहानी बनकर किताब को कक्षा में अलग तरीके से आगे बढ़ाया।
मुझे लगता है कि एक ही किताब में अलग-अलग काम करने की अनेक संभावनाएं होती हैं और हम अपनी लाइब्रेरी प्रैक्टिस के दौरान तमाम नयी नयी गतिविधियों को शामिल करते हुए काफी कुछ सीखते रहते हैं। इस सीखने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि हम किताबों और बच्चों के बीच अपना कार्य उत्साह पूर्वक जारी रखें।
(लेखक परिचय: जय शेखर जी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी विद्यालय में बतौर शिक्षक कार्य कर रहे हैं। पुस्तकालय, भाषा शिक्षण और बच्चों को दीवार पत्रिका ‘तितली’ के माध्यम से उनके रचनात्मक योगदान का सिलसिला सतत जारी है। उन्होंने इस लेख में उन्होंने अपने नये विद्यालय में बच्चों के साथ सहज होने और बच्चों के साथ पुस्तकालय के अनुभवों को जीवंत बनाने के प्रयास व अनुभवों को रेखांकित किया है।)
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