
वह गणित का एक सवाल हल कर रही थी:
5 + 0 = ?
उत्तर देने से पहले वह कुछ देर गहराई से सोचती रही। फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ बोली—”6″।
उसका उत्तर सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। मैं जानना चाहता था कि इस उत्तर के पीछे आखिर उसकी सोच क्या है। इसलिए मैंने उससे पूछा, “तुम्हें 6 वाला उत्तर कैसे मिला?”
उसने अपनी प्यारी-सी आवाज़ में समझाया—
“सर, शून्य का मतलब तो ‘कुछ नहीं’ होता है। और जहाँ कुछ नहीं होता, वहाँ भी कुछ तो होता ही है। अब जोड़ का निशान लगा है, तो कुछ तो जोड़ना ही पड़ेगा। इसलिए 1 जोड़ दिया, तो 6 आ गया।”
सच कहूँ तो यह तर्क और यह अवधारणा मेरे लिए बिल्कुल नई थी।
गलत उत्तर में भी एक व्यवस्थित सोच दिखी
ध्यान से देखें तो उसका उत्तर भले ही गलत था, लेकिन उसकी सोच बेतरतीब नहीं थी। उसने ‘जोड़’ को एक ऐसी क्रिया के रूप में समझा था, जिसमें कुछ न कुछ बढ़ना ज़रूरी है। और ‘शून्य’ को उसने ‘कुछ भी नहीं’ मानने के बजाय ‘कम-से-कम कुछ’ के रूप में देखा। यानी उसके पास अपना एक नियम था, जिसे उसने पूरी ईमानदारी से लागू किया। अगर मैं उसके जवाब को गलत उत्तर मानकर आगे बढ़ जाता, तो उसकी इस सोच तक कभी पहुँच ही नहीं पाता।
बच्चों के उत्तर केवल सही या गलत नहीं होते; वे उनके सोचने की प्रक्रिया की एक झलक होते हैं। कई बार यही झलक हम शिक्षकों को भी सीखने और अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने का अवसर भी देती है।
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