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कक्षा अनुभव: जब एक बच्चे ने कहा, “काश ! मैं भी लड़की होता”

 

रक्षा  बंधन की छुट्टियों के बाद जब मैंने अपनी कक्षा का अवलोकन किया तो मुझे कुछ बदलाबदला सा लगा। इसके लिए मैंने सारी परिस्थिति को समझने की कोशिश की। वास्तव में मैंने अपनी कक्षा में सभी छात्रों को खाने की पैकेट बंद चीजें विद्यालय लाने के लिए मना किया हुआ है। इसका मुख्य कारण पैकेट बंद खाने की गुणवत्ता और उसमे मिले हुए रासयनिक पदार्थ, दोनों ही बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होते हैं। इसके साथ ही बच्चे अलगअलग आर्थिक पृष्ठभूमि वाले घरों से आते हैं इसलिए सभी दुकान से खरीद कर ऐसी चीज नहीं खा सकते तो उनके मन में एक दूसरे के प्रति जलन अथवा खुद के प्रति हीन भावना विकसित हो।

पैकेट बंद खाने से हुई एक रोचक गतिविधि की शुरुआत

लेकिन पिछले कुछ दिनों से मैं अधिकांश बच्चों (मुख्यतः लड़कियों) के बैग में पैकेट बंद खाने की चीजों की संख्या ज्यादा देख रहा हूं। कल मैंने उनसे इस बारे में बात की तो बच्चों ने बताया कि हमको रक्षाबंधन पर जो पैसे मिले हैं और उनसे ही खाने की ऐसी चीजें खरीद रहे हैं तब मैंने उनके साथ एक रोचक गतिविधि करने की योजना बनाई।मैंने उन सभी कहा कि आपको जहाँ से भी रक्षाबंधन वाले दिन पैसे मिले हैं, उन सभी पैसों को आप सूचीबद्ध कीजिए और उनमें से जो पैसे आपने खर्च कर दिए है उसका विवरण भी लिखिए, खर्च किये हुए पैसों को आपको जितने कुल पैसे मिले, उसमें से घटाइए और मुझे बताइए कि अब आपके पास कितने पैसे बचे हैं। जिन बच्चों ने पैसे खर्च नहीं किए हैं वह यह बताएंगे कि वह उन पैसों से क्याक्या खरीदना चाहते हैं? या वह उन पैसों को कहां खर्च करेंगे?

हमको तो पैसे नहीं मिले, हम क्या करें?

तभी लड़कों ने बोला कि सर हमको तो पैसे नहीं मिले हैं तो हम क्या करें? मैंने उनको बोला कि आप यह बताएंगे कि आपने रक्षाबंधन वाले दिन कहांकहां, कितने पैसे किसकिस को दिए? और जोड़कर यह भी बताएं की कुल कितने पैसे खर्च किए। यह गतिविधि बहुत ही रोचक रही और उससे भी ज्यादा रोचक रहे बच्चों के जवाब। कुछ छात्रों के जवाब मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ।

परोक्त गतिविधि पर चर्चा करने से पूर्व मैं आपको कुछ दिन पूर्व की घटना के बारे में बताना चाहूंगा कुछ दिन पूर्व एक गणित प्रशिक्षण के दौरान एक महाशय ने  यह बताया कि वह  अमुक  विद्यालय में गए वहां उन्होंने एक बच्चे को खड़ा किया और उससे प्रश्न पूछा उसके द्वारा जो उत्तर बताया गया था वह गलत था। उसके बाद उन्होंने बताया कि इस तरह की गलतियां उन्हें अन्य विद्यालयों में भी मिली और उसके बाद उन्होंने उस बच्चे और उसकी गलती पर काफी देर चर्चा भी की।

‘मूल्यांकन में किसी बच्चे को सार्वजनिक रूप से गलत कहना ठीक नहीं है’

प्रशिक्षण के दौरान मैंने यह बात रखी कि  बच्चों के मूल्यांकन का यह जो तरीका आप बता रहे है यह बहुत ही निर्मम है। जब आप (जो कि उस बच्चे के अध्यापक भी नहीं है) किसी बच्चे से सार्वजनिक रूप से प्रश्न पूछते हैं और आप उसको बताते है कि आपका उत्तर गलत है तो उसका मनोबल टूटता है साथ ही कक्षा में आमतौर पर बच्चे उसका गलत जवाब सुनकर हंसते हैं।

बच्चों के शैक्षणिक रूप से पिछड़ने  की प्रक्रिया में इसका भी एक योगदान है क्योंकि एक बार अगर बच्चे का मनोबल टूट गया तो वह कभी मुख्य धारा में शामिल होना ही नहीं चाहता हैना ही हो पता है। अक्सर कक्षाओ में जब हम किसी ऐसे बच्चे से सवाल पूछते है कि किसका अधिगम स्तर अन्य बच्चों के सापेक्ष कम है  तो उसके साथी बच्चे उसके उत्तर देने से पहले ही हँस देते हैं। प्रशिक्षण में मैंने कक्षाओ में  इस तरह के मूल्यांकन का विरोध दर्ज कराते हुए कहा कियह मूल्यांकन करने का सही तरीका नहीं है और मेरा तो यह मानना है कि प्राथमिक स्तर की कक्षाओ में हमको मूल्यांकन क्यों ही करना है?”

मूल्यांकन की बजाय सतत आकलन करें

तब वहां उपस्थित अन्य अध्यापकों ने कहा कि यदि हम उनका मूल्यांकन नहीं करेंगे। हम  कैसे जान पाएंगे कि उसे क्या नहीं आता है और हम उसे कैसे उपचारात्मक शिक्षण  दे पाएंगे? मैंने उत्तर दिया कि जिस कक्षा को हम पढ़ा रहे है उसका हमको अवलोकन करतेकरते ही आकलन करना होता है

आप यदि किसी कक्षा को कुछ दिन पढ़ाएंगे तो आपको स्वयं ही पता चल जाता है कि किस बच्चे को सीखने में कहाँ कठिनाई रही है। मेरा यह मानना है कि मुख्यत: छोटी कक्षाओं में मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं है। आप उनसे अधिक से अधिक बातचीत कीजिये और उनको बहुत सारी गतिविधियां कराएं।

आपको बच्चों के अधिगम स्तर का पता उनसे बातचीत के सत्रों के दौरान ही चल जायेगा।  बच्चों ने अपनेअपने विवरण को विस्तार से लिखा, इसका कुछ सैंपल आप नीचे देख सकते हैं। 

इकाई, दहाई और सैकड़ा के स्थानीय मान को समझने में सहयोग की जरूरत

उदाहरण-1) उपरोक्त गतिविधि के दौरान एक छात्रा ने उसको मिले पैसों का योग किया तो उसका योग ₹1200 रूपए आया वह मेरे पास आयी और बोली  कि सर मुझे तो केवल ₹600 मिले  थे पर मेरा जोड़ तो 1200 रहा है। मैंने उसकी कॉपी चेक करके पाया कि उसने इकाई, दहाई और सैकडा के नीचे इकाई, दहाई और सैकड़ा की संख्या नहीं लिखी जिस कारण उनके जोड़ का कुल मिले पैसों से अधिक रहा था। बच्चों के रोजमर्रा के अनुभव जब कक्षाकक्ष में आते हैं तो उनको खुद से सोचने समझने का अवसर मिलता है।

उदाहरण-2) एक छात्र ने 500 को 005 लिखा है, वह यह समझ पा रहा है की 500 में 5 और 0,0 होते हैं लेकिन लिखते समय वह 5, और 0 को सही स्थान पर नहीं लिखा पा रहा है अर्थात उसकी स्थानीय मान की समझ अभी मजबूत नहीं हुई है। छात्रों द्वारा अपने भाई बहनों के नाम लिखने में तथा वाक्य पूरा करने में भी वर्तनी संबंधी अशुद्धियां भी है।

बच्चों के ‘सामाजिक-भावनात्मक विकास’ के पहलू भी हैं महत्वपूर्ण

बच्चों के द्वारा खर्च का विवरण देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ लगभग सभी ने उसको मिले पैसे को अपने ऊपर खर्च किया है। अक्सर बच्चे ऐसा ही करते हैं लेकिन कुछ बच्चों ने यह पैसा अपने घर की जरूरत के हिसाब से खर्च करने का निर्णय लिया  है और वह पैसे अपने मातापिता को दे रखे हैं। जैसे एक बच्चे की आप खर्च का विवरण देखेंगे तो आप पाएंगे कि उसने पैसों को अपने भाई की कॉपी लाने के लिए खर्च किया है और भविष्य में भी है पैसा अपने भाई की कॉपी खरीदने पर ही और अपनी कॉपी पर खर्च करना चाहती है। कल को जब उसकी कॉपी भर जाएगी तो उसी पैसे से अपने लिए कॉपी खरीदेगी।

इसके अलावा एक बच्चे का खर्चा देखने पर आप पाएंगें कि वह अपने  पैसों को अपनी मम्मी के इलाज पर खर्च करना चाहती है। जो कि इलाज के पर्याप्त नहीं है लेकिन उसका भाव देखकर मुझे बहुत ही खुशी हुई कि बच्चा अपनी माँ के प्रति इतना संवेदनशील है।

इसके अलावा बहुत छोटीछोटी अमाउंट को उन्होंने अपने खाने पीने की चीजों पर खर्च किया है लगभग सभी बच्चों ने अपने पैसे बचा रखे हैं बहुत छोटी सी धनराशि होने के बावजूद भी उनका इतनी मितव्यता से खर्च करने की योजना बहुत ही प्रभावशाली है उसे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई।

मूल्यांकन की बजाय शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया का हिस्सा बने आकलन

इस पूरी गतिविधि के दौरान हम देख पा रहे हैं कि हमको बच्चों का आकलन करने के लिए किसी प्रकार के मौखिक अथवा लिखित प्रश्नपत्र की आवश्यकता नहीं है। हम उनके साथ गतिविधि में संलग्न होकर ही अवलोकन करने की प्रक्रिया में ही उनका आकलन कर सकते हैं साथ ही हम गतिविधि में उनके भावों को, संवेदनशीलता को, भाषा एवं  अन्य विषयों की समझ के बारे में भी जान पाते हैं। यहाँ  हम देख पा रहे हैं कि बच्चों को दुकान पर मिलने वाली सामानों का मूल्य, अपने कपड़ों का मूल्य और अन्य  सामान लगभग कितने रुपए का आएगा इस प्रकार की भी जानकारी है। हमको अवलोकन करते समय बच्चे के शैक्षणिक अधिगम एवं व्यवहारिक ज्ञान का पता चल रहा है

इस पूरी गतिविधि के दौरान एक बच्चे का कथन मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ  बहुत सालों बाद कक्षा में इस तरह की जवाब मुझे सुनने को मिला। अक्सर समाज में लड़कियों के साथ उनके घर से ही लैंगिक भेदभाव होता है जैसे कि लड़कियों के बर्थडे के दौरान केक नहीं काटे जाते हैं ऐसा लड़कियों ने मुझे कई बार बताया है। जबकि उनके  भाई के बर्थडे पर केक काटा जाता है। अधिकांशत: लडको को ही सामाजिक समारोह में ले जाया जाता है। परिवार में शादी होने पर लड़कियां काफी दिन विद्यालय नहीं आती क्योकि वह घर के कामों में हाथ बंटाती है लड़कियाँ जब अपने पास रक्षाबंधन पर मिले पैसों के बारे में बता रहीं थीं तो एक लड़के ने कहा, काश ! मैं भी लड़की होता , मुझे इतने सारे पैसे तो मिलते। ऐसा कहते समय वह शर्माते हुए बहुत जोर से हँसा और कक्षा के सभी बच्चे भी जोर से हँसे

किसी कारणवश ही सही कभी तो उनके मन में लड़की बनने का भी भाव आ रहा है। हमेशा से लड़कियां ही शायद “काश! मैं लड़का होती” जैसा भाव मन में लाती होंगी? अगली किसी कक्षा इस बारे में भी बच्चों से जरुर बात करूँगा और उनके विचार जानने की कोशिश करूंगा।

(आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक, एक्स और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।)

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