| स्कूल में पढ़ते बच्चे – स्केच शिवकुमार |
पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक केंद्रित शिक्षण के कारण गणित बच्चों के लिए डराने वाला विषय बन जाता है। इसके कारण प्राथमिक स्तर पर बच्चों को अनेक तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सबसे पहली बात उनको ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी का मौका नहीं मिलता।दूसरी बात उनको बीते सालों में पढ़े पाठों से जुड़ने का कोई सेतु नहीं मिलता। तीसरी बात अध्यापक को भी कोर्स पूरा करने की जल्दबाजी होती है। ताकि परीक्षाओं के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न पढ़ाए गए पाठ्यक्रम के दायरे के बाहर न जाएं।
आठवीं कक्षा में गणित का शिक्षण करवाने वाले अध्यापक कहते हैं कि वे चाहते हैं कि सारे बच्चों को एक-एक सवाल समझाएं। उसे हल करने की प्रक्रिया को विस्तार से समझाएं। लेकिन वे चाहते हुए भी फिर से नंबर सिस्टम की ओर नहीं लौट सकते, बच्चों को फिर से जोड़-बाकी-गुणा-भाग नहीं सिखा सकते। वह तो पिछली कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बच्चों को पढ़ाया जा चुका है। उसके दोहरान में समय देने पर पाठ्यक्रम अधूरा रह जाएगा। एक अध्यापक नें कहा कि बच्चों को अपने स्तर पर सीखने की कोशिश करनी चाहिए। पुराने नियमों को दोहराते रहना चाहिए। अध्यापक केवल रास्ता सुझा सकता है। हाथ पकड़कर चलना सिखाने का समय तो हमारे पास नहीं हैं। उनकी बात से समस्या के समाधान के कुछ सूत्र मिलते हैं।
लेकिन बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए अध्यापक को उनकी भावी समस्याओं के प्रति पहले से सतर्क रहना चाहिए। क्योंकि सालों से शिक्षण की प्रक्रिया के दौरान ऐसी समस्याओं की निरंतरता समाधान के प्रति उदासीनता को दिखाता है। जिसके कारणों की पड़ताल से कोई रास्ता मिल सकता है। लेकिन अभी गणित के डर की पड़ताल करने की जरूरत है। ताकि हम जान सकें कि गणित का डर से बच्चों को निडर कैसे बनाया जाय ? गणित के अनेक संप्रत्यय आपस में जुड़े होते हैं। जिसकी आवश्यकता सवालों को हल करते हुए, जीवन में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाते समय पड़ती है। इसलिए संप्रत्ययों के दोहरान और वर्तमान संप्रत्ययों को समझाने पर ध्यान देने की जरूरत है।
अब बात करते हैं गणित शिक्षण की प्रक्रिया को आसान और रुचिकर बनाने की। गणित और भाषा दोनों का बेहतर समन्वय प्राथमिक स्तर पर शिक्षण की प्रक्रिया को रोचक और आनंददायक बना सकता है। इसके लिए गणित पढ़ाते समय बच्चों को मूर्त से अमूर्त की ओर ले जाना चाहिए। सबसे पहले उनकी संख्याओं में दिलचस्पी बढ़ानी चाहिए। जीवन की व्यावहारिक स्थितियों में उसके उपयोग को स्पष्ट करते हुए, आगे बढ़ना चाहिए। इससे बच्चे को अरुचि वाली स्थिति से नहीं गुजरना पड़ेगा। वे पढ़ने के लिए उत्सुक होंगे। उनको गणित से भय नहीं लगेगा। वे गणित के शिक्षक, किताबों और शिक्षण प्रक्रिया से खौफ नहीं खाएंगे। अगर उनको कोई बात समझ में नहीं आती तो सवाल पूछने से नहीं घबराएंगे।
गणित में बच्चों को रटने की बजाय किसी संप्रत्यय को समझने पर जोर देना चाहिए। अगर हम बच्चे से कहें कि उसे पच्चीस तक का पहाड़ा याद करके आना है तो बच्चा हमारी बात सुनकर घबरा सकता है। अभी हाल ही में एक स्कूल से पंद्रह लड़कियां पहाड़ा सुनाने के भय से स्कूल से गायब थीं। भय के कारण स्कूल से पलायन की प्रवृत्ति को समझने की जरूरत है ताकि कोई उचित समाधान खोजा जा सके। हमें समझना होगा कि बच्चे भय का मूल कारण क्या है ? पहाड़ा न सुनाने पर मिलने वाली फटकार और उपेक्षा। लोगों के सामने अपने कमतर दिखने का भय । पहाड़ा न सुना पाने की स्थिति में मिलने वाला दंड या फिर कुछ और….। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में गलतियां स्वाभाविक हैं। यह बात भी बच्चों और अध्यापक दोनों के मन में साफ होनी चाहिए। इससे भी बच्चों के डर और अध्यापक के बच्चों से हमेशा सही जवाब देनें के पूर्वाग्रह में कमी आएगी। बच्चों को इस तरह के भयों से निजात दिलाने की जरूरत है। ताकि गणित की पढ़ाई उनके लिए आसान और रुचिकर बने। अगर वह आनंद न दे सके तो कम से कम सजा जैसी तो न प्रतीत हो।
अध्यापक को कोई भी विषय पढ़ाते समय बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखना चाहिए। इसकी जरूरत गणित के प्रति बच्चों का डर देखकर और बढ़ जाती है। इसके अलाव बच्चों के स्तर पर किसी विषयवस्तु को समझने में आने वाली दिक्कतों को स्पष्टता के साथ देखना-समझना जरूरी है। ताकि बच्चा जहां पर अटक रहा है, उसे वहां थोड़ी सी सहायता देकर खुद कोशिश करके आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके। क्योंकि गणित का मामला परिणाम से ज्यादा प्रक्रिया केंद्रित है। अगर एक बार बच्चा किसी प्रश्न को हल करने की सही प्रक्रिया सीखता है तो भविष्य में उस तरह के तमाम सवालों को हल करने की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिए छोटे-छोटे आधारभूत नियमों का दोहरान आवश्यकतानुसार गणित के शिक्षक को करना चाहिए। इससे बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में सहजता की वापसी हो सकेगी। सीखने की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले भय से उसे मुक्ति मिलेगी। वह गणित के डर से निडर बन पाएगा।

