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पहली क्लास में सिर्फ हिंदी पढ़ाई जाती है?

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पहली क्लास में पढ़ाते समय हर विषय के ऊपर ध्यान देना चाहिए।

पहली क्लास में कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते हैं? इसका जवाब होगा। हिंदी, गणित और अंग्रेजी अगर राजस्थान या हिंदी भाषी प्रदेशों की बात करें। दो कालांश लायब्रेरी के भी होने चाहिए। खेल का भी कालांश होना चाहिए। मगर इतनी सारी चीज़ें एक साथ होती कहां हैं?

सरकारी स्कूलों में तो आठवें कालांश से थोड़ा पहले पहली से आठवीं तक के बच्चों को एक साथ बैठाकर गिनती और पहाड़ा बुलवाने की परंपरा का अक्षरशः पालन होते हुए देखकर हँसी आती है। हैरानी होती है कि पिछले कुछ सालों में शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों, नवाचारों, सूक्ष्म नवाचारों और वैज्ञानिक शोधों से लाभ उठाने की कोई तत्परता नहीं दिखाई।

पहली क्लास के बच्चे

पहली क्लास के बच्चे किताबें क्या करेंगे? पहली क्लास के बच्चे पुस्तकालय में क्या करेंगे? पहली क्लास के बच्चों के ऊपर ही आपका इतना फोकस क्यों रहता है? पहली क्लास के बच्चे जो जानते हैं वो तो दूसरी क्लास के बच्चे भी नहीं जानते। पहली क्लास के बच्चे तो पढ़ने के मामले में पाँचवीं-छठीं क्लास को भी पीछे छोड़ रहे हैं।

मगर बाकी सारे मामलों में पहली क्लास के बच्चे कहां है? इस सवाल का जवाब उनके पास शायद नहीं है जो पहली क्लास की हिंदी पर ही काम कर रहे हैं। जबकि वास्तव में होना तो यह चाहिए कि हमें पता हो कि पहली क्लास या दूसरी क्लास या किसी भी क्लास के बच्चों का अलग-अलग विषयों में कैसा रुझान है? कैसा प्रदर्शन है? इससे हमें किसी बच्चे के सीखने की प्रगति के बारे में बहुत से रोचक तथ्यों के बारे में पता चलेगा।

हर विषय पर ध्यान दें

उदाहरण के दौर पर एक बच्ची जो भाषा के कालांश में बहुत रुचि से पढ़ती है। एक बार भाषा के शिक्षक ने उसे डांटा तो वह डर गई। इसके बाद से भाषा के शिक्षक ने बच्ची का ख्याल रखा कि उसको कोई काम करने के लिए मोटीवेट किया जाये। यह बच्ची स्वभाव से अंतर्मुखी है। उसके लिए शिक्षक का ऐसा व्यवहार प्रेरित करने वाला था।

मगर गणित के कालांश में यही बच्ची छोटे-छोटे सवाल नहीं कर पाती है। शिक्षक से डरती है। कोई सवाल पूछने पर रोने लगती है। अंग्रेजी विषय में बच्ची की प्रगति कैसी है, इसके बारे में मुझे सच में पता नहीं है। पहली क्लास में आने वाला हर शिक्षक सारे बच्चों को अपने विषय वाले नज़रिये से देखने की कोशिश करते होंगे। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बच्चों की प्रगति के ऊपर स्कूलों में बात करने की परंपरा नहीं है।

बच्चों को ट्रिक न सिखाएं

आखिर में एक बात बच्चों की पढ़ाई के बारे में बहुआयामी तरीके से सोचने-देखने और काम करने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर पहली-दूसरी क्लास में भाषा के साथ-साथ गणित के ऊपर भी ध्यान देना बेहद जरूरी है। इसके अभाव में बहुत सी अवधारणा संबंधी गलतियां होती हैं, जिसको समझ पाना एक बच्चे के लिए मुश्किल होता है।

जैसे बच्चे इकाई और दहाई का कांसेप्ट नहीं समझ पाते। वे एक से सौ तक लिख तो लेते हैं, किसी ट्रिक से। मगर अपने लिखे हुए को वे पढ़ नहीं पाते। ऐसा गलत तरीके से काम करने के कारण भी होता है। इस तरफ ध्यान दिलाने का आशय बस इतना ही है कि हम बच्चों के सीखने को अलग-अलग आयामों से देख पाएं। हर विषय के ऊपर ध्यान दिया जाये ताकि बच्चे को सही मायने में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

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