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बदलावःजागरूक हैं बच्चों के अभिभावक


बच्चों के अभिभावक -स्केच शिव कुमार

बच्चों के अभिभावक जान गए हैं कि बच्चा स्कूल जाए या न जाए। पास हो जाएगा। इस कारण से उसे परिवार के कामों से घर पर रोक लेते हैं। काम-धंधे के सिलसिले में बाहर भेजते हैं। घर पर अगर बच्चा रुकता है तो भी उससे पूछते नहीं कि स्कूल क्यों नहीं गए ?

अगर एक ही घर पर दो बच्चे सरकारी और निजी स्कूल में जाते हैं तो उनके देखरेख में फर्क दिखाई पड़ता है। निजी स्कूल में जाने वाले बच्चे की खोज खबर ली जाती है कि पढ़ाई कैसे चल रही है। सरकारी स्कूल के बारे में अभिभावकों का सामान्य मत है कि वहां पढ़ाई नहीं होती।

जब उनकी पहले से ऐसी धारणा बनी हो तो फिर बाकी की बातें तो गौड़ हो जाती हैं। एक खास बात कि घर पर बच्चों के बीच पढ़ाई-लिखाई से संबंधित कोई मेल-जोल नहीं होता है। वे अपने-अपने घरों में सिमटे रहते हैं। वे साथ में खेलते हैं। लेकिन पढ़ाई से जुड़ा कोई संवाद नहीं करते।

इसके साथ-साथ एक बात और कि बच्चे स्कूल में पढ़ाए गए पाठ को घर पर पलटकर नहीं देखते। घर पर कापी नहीं खोलते ताकि पिछले दिन क्या पढ़ा दोहरान करना सीख सकें। अगले दिन उनसे वही सवाल पाठ के बारे में पूछो तो वे भूल जाते हैं।

इसका एक कारण यहां का सांस्कृतिक परिवेश और रहन-सहन हो सकता है। दूसरा कारण पाठ्यपुस्तकों और कक्षा कक्ष की पढ़ाई का उनके रोजमर्रा के जीवन से कटा होना भी हो सकता है। 

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