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बच्चों की जरूरत, अभिभावक की अपेक्षा और शिक्षक के प्रयासों में तालमेल जरूरी- उषा छाबड़ा

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दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में कलात्मक चित्र बनाते बच्चे।

कई बच्चे अपनी कॉपी बड़ी करीने से संभालकर रखते हैं। उनकी कॉपी के पृष्ठ मुड़े नहीं होते , उनकी कॉपी में लिखे अक्षर सधे हुए होते हैं। हर काम बड़ी सफाई से किया होता है। कक्षा में होने वाली चर्चा और सुझावों के अनुसार अपेक्षित उत्तर भी लिखा होता है। सवालों के उत्तर पूरे लिखे होते हैं। होमवर्क और क्लासवर्क पूरा होता है।

 

बच्चों पर शुरू से ध्यान देना क्यों जरूरी है?

इसके विपरीत कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनकी कॉपियों का रख- रखाव अच्छा नहीं होता। उनके पृष्ठ मुड़े -तुड़े होते हैं। उनकी कॉपी में कभी हल्दी का दाग दिखता है, तो कभी कोई पन्ना भी बीच में से फटा नज़र आता है।

उनका होमवर्क काम सावधानी से नहीं किया होता। वे बार -बार गलती करते हैं , उसे काट देते हैं, फिर आगे लिखते हैं , फिर कोई शब्द काट देते हैं। उनके काम में स्थिरता और प्रवाह नहीं दिखता। ऐसे बच्चे बार-बार कोशिश करने के बाद भी शब्दों को गलत लिखते हैं। कई बार प्रयास करने के बाद, अधूरा काम ही जांचने के लिए दे देते हैं।

मेरे क्लास के अनुभव क्या कहते हैं?

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बच्चों को कहानी सुनाते हुए हिंदी भाषा की शिक्षिका उषा छाबड़ा जी।

ऊपर दिए गए दोनों तरह की कॉपियाँ अकसर सामने आती हैं। मैं अपनी कक्षा में लगभग १५ बच्चों की कापियां अच्छी श्रेणी में गिन सकती हूँ ,लगभग १० कॉपियाँ ठीक -ठाक हैं , बहुत अच्छी नहीं और बाकी कापियों का हाल खराब है। बच्चों की कापियों को देखकर ,जांचते समय कुछ बातें समझ में आती हैं कि बच्चे के घर का वातावरण क्या है? उसके ऊपर कितना ध्यान दिया जा रहा है ? गलती अगर बार- बार दोहराई जा रही है तो या तो बच्चे की समझ में नहीं आ रही या बच्चा लापरवाही कर रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि घर पर बच्चे की पढ़ाई में मदद करने वाला और ध्यान देने वाला कोई नहीं है।

घर पर बच्चों को समय दें अभिभावक

छोटी उम्र से ही हमें बच्चों को साफ-सफाई के बारे में बताना चाहिए, ताकि यह उनकी रोज़मर्रा की आदत में सहजता के साथ शामिल हो जाए। इसका असर तमाम बातों के साथ-साथ कॉपियों में भी दिखाई देगी। कई बच्चों की लिखने की गति कम है और इसलिए कक्षा में काम पूरा नहीं कर पाते। ऐसे बच्चों के अभिभावकों को चाहिए कि प्रतिदिन जब बच्चा जब घर जाए तो उसकी कॉपियाँ देखे, उसकी गलतियों को समझे और उनपर पर ध्यान दें। जो गलतियां छोटी कक्षाओं में नजरअंदाज की जाती हैं , बड़े होकर उन गलतियों की पुनरावृत्ति होती रहती है। जबतक कि कोई उसके बारे में टोके नहीं और सुधार का विकल्प न बताये पुरानी ग़लतियां ठीक नहीं हो पाती हैं।

बच्चों की जरूरत, अभिभावक की अपेक्षा और शिक्षक के प्रयासों में तालमेल जरूरी

कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चों को वर्णों और मात्राओं का सही ज्ञान बचपन में नहीं हो पाया इसलिए वे बड़े होकर भी कई छोटी छोटी गलतियां करते हैं और वही गलतियाँ बड़ा रूप ले लेती हैं। बच्चे से अगर यह उम्मीद की जाती है कि वह अच्छे अंक लाये , तो उसके लिए अभिभावक, छात्र और अध्यापिका के कार्य में तालमेल स्थापित करने की जरूरत है। किसी अध्यापिका का मार्गदर्शन तभी कारगर सिद्ध होगा, जब अभिभावक घर पर समय निकालकर अपने बच्चों पर ध्यान देंगें । घर पर अपने बच्चों के लिए समय निकालना बहुत ही आवश्यक है।

आखिर में यही कहना चाहती हूँ कि समय रहते बच्चों की मदद करें। उनको प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करें। उनके छोटी-छोटी सफलता वाले लम्हों को रेखांकित करें और आगे बढ़ने के लिए अभ्यास की निरंतरता को बनाये रखने का हौसला दें। कोई भी बड़ी सीढ़ी एक बार में नहीं चढ़ी जाती , उसके एक- एक पायदान पर चढ़ते हुए ही ऊँचाई वाली किसी मंज़िल पर पहुँचा जा सकता है।

(एजुकेशन मिरर के पाठकों के लिए यह पोस्ट दिल्ली के रोहिणी में हिंदी भाषा की शिक्षिका उषा छाबड़ा जी ने भी भेजी है। आप शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 21 सालों से काम कर रही हैं। बच्चों को कहानियां सुनाने और हिंदी भाषा के शिक्षण के रोचक और छात्रों के लिए उपयोगी बनाने के कई अभिनव प्रयास आपकी तरफ से हो रहे हैं। आपका ब्लॉग अनोखी पाठशालाआपके अनुभवों की कहानी कहता है।)

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