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रिपोर्टः शिक्षा क्षेत्र के लिए कैसा रहा साल 2016?

education-mirrorएजुकेशन मिरर की शुरूआत साल 2015 में हुई थी। मकसद था कि शिक्षा और मीडिया के बीच एक पुल बने जिस पर रोज़मर्रा की रूटीन से जुड़ी निगेटिव खबरों की जगह ऐसी कहानियां हों जो ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ी हों। एक ऐसा प्लेटफॉर्म बने जहाँ ऐसे सरकारी स्कूलों में अच्छा करने वाले शिक्षकों की कहानियां पढ़ने को मिले।

ताकि ऐसे शिक्षकों को अपना काम करने के लिए ऊर्जा और प्रोत्साहन मिले। उनको लगे कि उनके काम का संवेदनशील होकर आकलन किया जा रहा है। शिक्षक साथियों को सहज भाषा में ऐसे आलेख पढ़ने को मिले जिसमें स्थितियों में बेहतरी और बदलाव के सूत्र भी मिल रहे हैं। इसके साथ ही आम लोगों की शिक्षा से जुड़े मुद्दों में रुचि पैदा की जा सके।

एजुकेशन मिरर की कहानी @ साल 2016

एजुकेशन मिरर पर ऐसे बच्चों की कहानियां हैं जो भारत के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। छोटे-मोटे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। जिनकी ज़िंदगी सुविधाओं और अपेक्षाओं के बोझ से मुक्त है। ये बच्चे सहयोग की भावना में यकीन करते हैं। अपने गाँव के माहौल से बाहर निकलना चाहते हैं। अपने मन के सपनों को साकार करना चाहते हैं। जो परीक्षाओं से डरते हैं। अपनी रणनीति से पढ़ते हैं। शिक्षकों की हर बात पर भरोसा करते हैं। उनके कहे पर अमल की कोशिश करते हैं या फिर साफ मना कर देते हैं कि सर हमसे नहीं हो पाएगा। हम ऐसा नहीं कर सकते।

एजुकेशन मिरर पर निजी स्कूल के शिक्षकों की चुनौतियों को भी सामने लाने की कोशिश हो रही है। ताकि उनकी समस्याओं से लोग वाकिफ हो सकें कि वे कैसे इतने कम पैसे में काम कर रहे हैं जिससे केवल महीने भर की सब्जी और दाल-रोटी का जुगाड़ हो सकता है। हालांकि ऐसे निजी स्कूल भी हैं जो बहुत अच्छे हैं। मगर क्या वहां सारे बच्चे सीख रहे हैं? क्या वहां पढ़ने वाले सभी बच्चों के अभिभावक स्कूल के अलावा ट्युशन फीस देने में सक्षम हैं? क्या ऐसी महंगी शिक्षा भारत के ग़रीब तबके और आदिवासी अंचल में रहने वाले छात्रों के लिए भी मुमकिन है? ऐसे सवालों पर भी रौशनी डालने का प्रयास आने वाले साल में भी जारी रहेगा।

एजुकेशन मिरर का सबसे ख़ास लक्ष्य है शिक्षा के क्षेत्र में युवाओं को लिखने के लिए प्रेरित करना, उनकी प्रतिभा से लोगों को परिचित कराना है। शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षक प्रशिक्षकों के लिए आसान भाषा में पठन सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास जारी है। इस पर लिखे आलेखों में कोशिश होती है कि हर  लेख में ऐसे विचार मौजूद हों जो सीधे क्लासरूम में लागू किए जा सकते हों। जैसे कक्षा में बच्चों की भागीदारी कैसे बढ़ाएं, बच्चों को भाषा कैसे सिखाएं, बच्चों से संवाद कैसे करें, शिक्षकों को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, भविष्य की चुनौतियों के लिए शिक्षक खुद को कैसे तैयार करें, शिक्षा मनोविज्ञान की किन बुनियादी बातों का स्कूल में ध्यान रखना जरूरी है। ऐसे मुद्दों पर हमारे संवाद का सिलसिला सतत बना हुआ है।

इस साल एजुकेशन मिरर की हिट्स पिछले साल (2015) की तुलना में  7,000 से बढ़कर 1,50,000 के लगभग हो गई है। विज़िटर्स की संख्या 50,000 से भी ज्यादा है। इस साल अबतक 210 पोस्ट प्रकाशित हुई हैं। एजुकेशन मिरर के पाठकों और इसके लिए लिखने वाले दोस्तों का तहे दिल से शुक्रिया। आपके सहयोग और प्रोत्साहन के कारण ही एजुकेशन मिरर इस मुकाम पर है।

हमारा लक्ष्य पूर्वाग्रहों के जालों को साफ करना है

हेलसिंकी विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर हेलेन कैंटेल

हैलसिंकी विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग की प्रोफ़ेसर हैनेल कैंटेल के साथ शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करते हुए।

एजुकेशन मिरर का उद्देश्य ऐसे जालों को साफ करना भी है जो शिक्षा के क्षेत्र में रौशनी को दाखिल होने से रोकते हैं। तालीम की रौशनी जिन जालों को साफ करने का सबक देती है, उसकी मौजूदगी को और सघन करते हैं। ऐसे मुद्दों पर भी लिखना और शिक्षकों से बात करना हुआ है।

अफवाहों से परे सच कहने की अदा सीख रहा हूँ। ऐसे रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहा हूँ जो नया है। नई चुनौतियों से भरा है। नई संभावनाओं से भरा है। नित-नए परिवर्तनों से गुलज़ार है। मगर खुशी है कि एजुकेशन मिरर के दोस्तों की जड़े ज़मीन में बड़ी गहराई से जुड़ी हैं।

साल 2017 में क्या होगा?

इसकी शुरूआत से अबतक के सफर में क़दम-क़दम पर साथी रहे दोस्तों की बहुमूल्य सलाह समय-समय पर मिलती रही है। आने वाले दिनों में बहुत कुछ नया होगा। नई शिक्षा नीति आएगी, नो डिटेंशन पॉलिसी पर फैसला होगा, किताबों में बदलाव की कहानियां लिखी जाएंगी, एकल विद्यालयों का मुद्दा ज्यों का त्यों बना रहेगा, बहुत से बच्चे दसवीं-बारहवीं में फेल होकर हमेशा के लिए शिक्षा के बाहर हो जाएंगे। इन स्यह सच्चाइयों से अलग कई चमकदार कहानियां भी होंगी जैसे पहली-दूसरी कक्षा में पढ़ना सीख लेने वाले बच्चे अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं का सामना करेंगे। उनके शिक्षक उनको प्रेरित करेंगे।

ऐसे बच्चों के बीच में दोस्ती का ऐसा रिश्ता रोपने की कोशिश करनी चाहिए जो उनको लाइफ-टाइम फ्रेंडशिप वाले रिश्ते में कुछ यों जोड़े कि वे हर मुश्किल में एक-दूसरे के साथ खड़े नज़र आएं। एक-दूसरे का हौसला बढ़ाएं। हम अपनी ज़िंदगी में बड़ी मुश्किल से ऐसा कर पाते हैं, मगर आदिवासी अंचल में ऐसा सिस्टम पहले से बना हआ है। जिसे बस प्रेरित करने और सही दिशा देने की जरूरत है।

शिक्षा के क्षेत्र में ‘दंगल’ जारी है

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भविष्य में कुछ करने का सपना संजोती लड़किया करियर के बारे में विशेषज्ञों से परामर्श करने लेने की तैयारी कर रही हैं।

लड़कियों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए और उनके आत्मविश्वास को सपोर्ट करने की जरूरत आने वाले सालों में भी बनी रहेगी। इस साल के आखिर में आई फिल्म ‘दंगल’ इसी उम्मीद का प्रतिनिधित्व करती है कि हमें लड़कियों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उनके साथ खड़ा होना चाहिए। उनके सफर में हौसला बढ़ाना चाहिए ताकि वे अपनी मज़िलों तक पहुंचने के सपने को साकार कर सकें।

युवाओं के मुद्दे पर बहुत कुछ लिखने की जरूरत है। आने वाले साल में यह सिलसिला थोड़ा रफ्तार पकड़ेगा।

शिक्षा क्षेत्र के लिए कैसा रहा साल 2016?

इसी साल राजस्थान में पांचवीं कक्षा में भी बोर्ड परीक्षाओं की शुरूआत हुई। पिछले साल (2015-16) आठवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षाओं की कई सालों बाद वापसी हुई थी। इसी साल पहली कक्षा में प्रवेश की उम्र 6 से घटाकर 5 साल कर दी गई। राजस्थान समेत विभिन्न राज्यों में बालवाड़ी के ऊपर काफी ध्यान दिया जा रहा है, यह एक उम्मीद की रौशनी सरीखा है कि आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलने की राह में है। तो आइए इस बदलाव में अपना योदगान दें।

जम्मू-कश्मीर राज्य में स्कूलों में आग लगाने की खबरें भी चर्चा में रहीं। बिना पाठ्यक्रम पूरा किए बोर्ड की परीक्षाएं हुईं। इसके साथ ही नौवीं और 11वीं में पढ़ने वाले छात्रों को सीधे अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया गया ताकि उनका साल खराब न हो। इस मुद्दे पर पूरे देश में काफी चर्चा हुई। कश्मीर में लोगों के लिए बच्चों की पढ़ाई बहुत मायने रखती है, इस बात की झलक स्थानीय स्तर पर बच्चों की पढ़ाई को लेकर चलाए गए सामुदायिक कक्षाओं में दिखी।

शिक्षा के क्षेत्र में बहुत से बदलावों की भूमिका इस साल बनी जैसे नई शिक्षा नीति की रूपरेखा तैयार हुई। जो अगले साल हमारे सामने होगी। ऐसी भी चर्चा हो रही है कि निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की तरफ से कोशिश जारी हैं। स्वच्छ भारत अभियान में विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों की भागीदारी को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है कि सरकार अपने योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी छात्रों पर कैसे डाल सकती है?

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