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सरकारी स्कूल से बच्चों का नाम क्यों कटा रहे हैं अभिभावक ?

education mirror, primary education in indiaएक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे की माँ अपने बेटे का दाखिला निजी स्कूल में कराना चाहती हैं। वह भी केजी में ताकि उनका बच्चा भी अंग्रेजी में पढ़-बोल सके। यह बच्चा अभी दूसरी क्लास में पढ़ रहा है। यानि अब वह फिर से पढ़ाई की उल्टी गिनती शुरू करेगा। पहले पहली में पढ़ाई, फिर केजी में एडमीशन।

गाँव और आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति बार-बार दिखाई देती है जब सरकारी स्कूल में बच्चे कुछ समय पढ़ने के लिए आते हैं। जब वे स्कूल जाने लगते हैं और वहां के माहौल में सामान्य हो जाते हैं तो उनके अभिभावक बच्चों का एडमीशन निजी स्कूलों में पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में करवा देते हैं।

आंगनबाड़ी जैसे हैं सरकारी स्कूल?

कभी-कभी इसकी सूचना स्कूल के लोगों को बाकी बच्चों से मिलती है जो बताते हैं कि फलां बच्चा तो उस स्कूल में जा रहा है। स्कूल के बाकायदा टीसी कटवाने वाली स्थिति कभी-कभार ही दिखाई देती है। इससे पता चलता है कि सरकारी स्कूलों को लोग ‘आंगनबाड़ी’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। क्योंकि गाँव की वास्तविक आंगनबाड़ी उतनी बेहतर स्थिति में नहीं है कि बच्चों की पूर्व-प्राथमिक शिक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा कर सके।

निजी स्कूलों के अस्तित्व के कारण काफी छोटे बच्चे भी गाड़ियों में बैठकर, पीठ पर बैग लादे स्कूल जाते हैं। इस दृश्य का असर बाकी लोगों के मन पर भी पड़ता है। वे अपने बच्चों को भी निजी स्कूलों के नर्सरी व एलकेजी-यूकेजी में प्रवेश दिला देते हैं। मगर स्कूल की महंगी फीस को लगातार भरते रहना सभी परिवारों के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में इन बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है।

महंगी फीस की मार

ऐसे बच्चों की पढ़ाई छूटने प्रमुख वजह आर्थिक ही है क्योंकि अभिभावकों की महत्वाकांक्षा काफी ऊंची है। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा भी नामी स्कूल में पढ़ने जाए। मगर आर्थिक मजबूरियों के कारण यह सपना टूट जाता है। ऐसे बच्चों के माता-पिता सरकारी स्कूल में छह साल से छोटे बच्चों को भी प्रवेश के लिए दबाव डालते हैं।

शिक्षा दार्शनिक, जॉन डिवी के विचार

जॉन डिवी का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो स्कूल छोड़ने के बाद भी काम आए।

ऐसे में शिक्षक अभिभावकों को समझाते हैं कि पहली कक्षा में 6 साल की उम्र के बच्चे का ही प्रवेश होता है, ऐसे बच्चे को आप आंगनबाड़ी में भेजिए। या फिर एक-दो घंटे के लिए स्कूल भेज दीजिए और फिर घर ले जाइए। मगर उसका नाम मत लिखवाइए क्योंकि कम उम्र के बच्चों के सीखने की रफ्तार कम होती है और वे क्लास में अन्य बच्चों से सीखने के मामले में पीछे छूट जाते हैं।

इस बात को जो अभिभावक समझ पाते हैं, वे शिक्षकों की बात पर अमल करते हैं। बाकियों की जिद होती है कि हमारे बच्चे का प्रवेश कर लीजिए और कई बार ऐसा भी होता है कि शिक्षक अभिभावकों और अधिकारियों के दोहरे दबाव में बच्चों का एडमीशन कर लेते हैं।

आखिर में यही कह सकते हैं कि निजी स्कूल सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ जगहों पर वे अपने मकसद में कामयाब हो गए हैं। मगर बहुत से क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां सरकारी स्कूलों की स्थिति काफी मजबूत हैं। वे निजी स्कूलों को बराबर की टक्कर दे रहे हैं।

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2 Comments
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Anonymous

I think they have get free education and so that there is no any value of free education for them. They think that the thing that is free is not as good as highly payable.

ankit

nice sir

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