अपनी बकरियों को चराने के लिए ले जाते स्कूली बच्चे। राजस्थान में पशु पालन के कारण बहुत से बच्चों को अपनी पढ़ाई छोड़ पारिवारिक पेशे में हाथ बँटाना पड़ता है, जिसका असर उनकी पढ़ाई-लिखाई पर पड़ता है।
किसी स्कूल को देखने के इतने नज़रिये होते हैं कि सही-ग़लत का फ़ैसला करना मुश्किल हो जाये। ऐसी स्थिति को आप तब समझ पाते हैं जब स्कूल से जुड़े विभिन्न पक्षों को आप ग़ौर से सुनते हैं और उनकी बातों को महज बहाना बताकर खारिज नहीं करते।
एक स्कूल के प्रिंसिपल कहते हैं, “हमारा सिर्फ़ एक ही काम होना चाहिए बच्चों को पढ़ाना। उनकी प्रगति के बारे में सोचना। इसके अलावा बाकी सारे कामों का ढकोसला हम क्यों करते हैं? लोग कहते हैं कि जो बच्चे स्कूल से बाहर हैं, उनको स्कूल से जोड़ो। अगर हम ऐसा करते हैं तो उन बच्चों का नुकसान होता है जो स्कूल आ रहे हैं। ऐसी स्थिति की बार-बार पुनरावृत्ति से वे बच्चे भी स्कूल आना छोड़ देते हैं जो स्कूल आ रहे हैं।”
शिक्षा के सामने आजीविका का सवाल
गाँव की परिस्थिति के बारे में बताते हुए एक शिक्षक कहते हैं, “स्कूल में एक लड़की का नामांकन है। उसकी माँ स्कूल में खाना बनाती हैं। घर पर जानवर हैं जिसकी देखभाल के लिए उसे घर पर रुकना होता है। घर के बाकी सदस्य अन्य कामों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उसके स्कूल आने के लिए एक ही रास्ता है कि जानवरों को बेच दिया जाये। बताइए ऐसा रास्ता कितना सही होगा?”
आजीविका वाले सवाल का भला क्या जवाब हो सकता है। हाँ, एक पक्ष उनकी बात में ग़ौर करने लायक लगा कि लड़की जानवरों की देखभाल के लिए घर पर रुकती है, मगर लड़का स्कूल में पढ़ने आता है। यानी एक लड़की की पढ़ाई-लिखाई को लड़कों की पढ़ाई-लिखाई से कम करके देखा जा रहा है। यहां नज़रिये में बदलाव की बात हो सकती है, मगर परिवार का पारंपरिक पेशा और नियमित स्कूल वाली परिस्थिति में परिवार का पेशा ही ज्यादा महत्व पाता है। ऐसी परिस्थिति में लड़की का स्कूल आना सुनिश्चित करने के लिए क्या हो सकता है। सोचने वाली बात है, मगर सिर्फ़ बातों से ऐसा नहीं होगा यह तो साफ़ है।
एक स्कूल की विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्य कहते हैं, “हमारे गाँव में बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके 5-6 बच्चे हैं। मगर उनमें से सिर्फ़ एक ही बच्चा स्कूल आ रहा है। बाकी बच्चे दिनभर इधर-उधर घूमते रहते हैं। कोई उनको पूछने वाला नहीं है। इससे असली नुकसान तो हमारा ही है। अगर सारे बच्चे स्कूल आने लगें तो स्कूल में चार-पांच सौ बच्चों का नामांकन हो जाएगा।”
राजस्थान के आदिवासी इलाक़े में बहुत से परिवारों का पेशा पशु पालन है। खेती है। इसके कारण बच्चों पर अभिभावक ध्यान नहीं दे पाते। क्योंकि ऐसे पेशे को अकेले नहीं चलाया जा सकता है, ऐसे में बच्चे घर की देखभाल करते हैं। या माता-पिता के साथ खेत पर जाते हैं। या माता-पिता मजदूरी के लिए जाते हैं और बच्चे घर पर छोटे बच्चों की रखवाली करते हैं। एक शिक्षक बताते हैं, “बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जो अपनी मर्जी से स्कूल आते हैं। अगर वे स्कूल न आएं तो घर वालों को उनकी कोई फिक्र नहीं होती।
सिर्फ़ डायरी में दिखता है बदलाव
शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सी समस्याओं के बने रहने और बार-बार नये रूप में सामने आने का एक प्रमुख कारण है कि यहां बहुत सी समस्याओं का समाधान बुद्धि के स्तर पर करने का प्रयास किया जाता है। अगर ज़मीनी स्तर से समस्याओं का समाधान निकले तो शायद लोगों के बीच उसकी स्वीकार्यता ज़्यादा होगी। मगर वास्तविक स्थिति में तो चीज़ें ऊपर से आती हैं और कागजी कार्रवाई में उलझ कर रह जाती है। उसका असर शिक्षक की डायरी में भले नज़र आती हो मगर स्कूल में पढ़ाई का वास्तविक समय (टाइम ऑन टास्क) उससे बेहद कम होता है।
इसीलिए डायरी में नज़र आने वाली चीज़ें क्लास में दिखाई नहीं देतीं। शिक्षक एक सफल सेल्स पर्सन की तरह वही दिखा रहे हैं जो व्यवस्था में ऊपरी पायदान पर बैठे लोग देखना चाहते हैं। एक और उदाहण बेस्ट स्कूलों के चुनाव का ले सकते हैं। जो स्कूल वास्तव में बेहतर कर रहे हैं, या बेहतर करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं उसके अलावा जब बाकी स्कूलों का अंतिम चयन इस सूची के लिए होता है तो काम करने वाले लोगों को हताशा होती है कि फलां स्कूल का चयन क्यों किया गया। इसके लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिए ताकि बाकी स्कूलों को बेहतर करने के लिए मोटीवेशन मिल सके कि अमुख क्षेत्र में बेहतरी के बाद हम भी उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।
बदलाव की असली लड़ाई
शिक्षा के क्षेत्र में कोई बदलाव लाना और उसे स्थाई रूप से शिक्षक की रोज़मर्रा की दिनचर्या और उसकी जीवन शैली का हिस्सा बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। फील्ड की अपनी कहानियां होती हैं, जिसमें वास्तविक बदलाव के बहुत से फॉर्मुले मौजूद होते हैं।
मगर शिक्षा क्षेत्र की बिडंबना यही है कि लोग ज़मीनी अनुभवों और वास्तविकताओं की बजाय विदेशी शोधों को ज्यादा वरियता देते हैं। क्योंकि उसे बुद्धि के स्तर पर समझना और कुछ जगहों पर अप्लाई करके देखना भर होता है। उसमें किसी के सामने डेमो देने, उसको वह काम करने के लिए राजी करने, उसकी रोज़मर्रा की चुनौतियों से होने वाली निराशा से निकालने जैसी चुनौती तो नहीं होती।
बदलाव की असली लड़ाई तो फील्ड में लड़ी जा रही है, मगर शिक्षा क्षेत्र में बदलाव के इच्छुक बहुत से योद्धा तो दर्शकदीर्घा में बैठकर पूरी कहानी का लुफ़्त ले रहे हैं और पॉपकार्न का आनंद लेते हुए बड़ी गंभीर दार्शनिक मुद्रा में कह रहे हैं हमें तो बस टीचर्स से मतलब है, उनकी ट्रेनिंग से मतलब है, स्कूल के रोज़मर्रा वाले अनुभव तो बस परिपक्व होने की जरूरत हैं। उसके लिए भला अपनी क़ीमती ऊर्जा और संसाधन क्यों जाया किया जाये?

