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कहानी से मिली सीख से आगे बढ़ना जरूरी है

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एक स्कूल में कई महीने बीत जाने के बाद भी बच्चे अक्षरों से अज़नबी की तरह पेश आते हैं। इस बात से हैरानी होती है। मगर कोई बात नहीं, बच्चे हैं बच्चों से भला क्या नाराज होना। हो सकता है कि शिक्षक बच्चों को नियमित न पढ़ा पाते हों।

हर स्कूल की अपनी परिस्थिति होती है। इस स्कूल में तो चार का स्टाफ़ है, आठवीं तक की क्लास है। प्रधानाध्यापक जी अपने काम में व्यस्त रहते हैं, शिक्षक के पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि घुमा दें और सारी क्लास में उनकी मौजूदगी हो जाए। सारे बच्चों को बराबर समय मिलने लगे। सबकी लर्निंग और ग्रोथ एक जैसी हो जाये। ऐसे में शिक्षक की स्थिति भी समझी जानी चाहिए।

इसी स्कूल में आज बच्चों को क्लास में एक कहानी सुनाई। कहानी का शीर्षक था बनी-ठनी। यह दो तितलियों की कहानी है जो बाज़ार में घूमने जाती हैं। कहानी पूरी होने के बाद जब सारे बच्चे अक्षरों को अपनी कॉपी में चित्रों की तरह उतार रहे थे। एक बच्ची बनी-ठनी की तस्वीर बना रही थी। शिक्षक ने कहा कि अरे! ये क्या बना रही हो तो मैंने जवाब दिया सर। अक्षर तो पहचान जाएंगे बच्चे कोई बात नहीं। अभी छोटी बच्ची कहानी की कल्पनाओं को चित्रों में साकार कर रही है, उसे टोकना अच्छी बात नहीं है।

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