Site icon Education Mirror

पढ़ना सीखने में कैसे मदद करती है ‘ध्वनि जागरूकता’?


ध्वनियों को पहचानना और ध्वनियों के आपस में मिलने से होने वाले बदलाव को समझ पाना ही ध्वनि जागरूकता है। इसमें किसी शब्द को आवाज़ों में तोड़ना और किसी शब्द की विभिन्न आवाज़ों को आपस में जोड़ने का कौशल शामिल है। पढ़ने के दौरान इसका कैसे इस्तेमाल होता है, वर्ण ज्ञान से इसका क्या रिश्ता होता है? आगे विस्तार से पढ़िए।
किसी पहचान को पुख्ता करने के लिए विपरीत चीज़ को सामने रखना पड़ता है। इस विचार का इस्तेमाल क्लासरूम टीचिंग के दौरान बहुत अच्छे से हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर अगर हम शिक्षकों के साथ वर्ण ज्ञान और ध्वनि जागरूकता के ऊपर बात करते हुए कहते हैं कि किसी वर्ण की आवाज़ से बच्चों को परिचित कराना ध्वनि जागरुकता है। जबकि उसी वर्ण के प्रतीक के साथ ध्वनि से रूबरू कराना वर्ण ज्ञान है। वर्ण ज्ञान में मात्राएं भी शामिल होती हैं। क्योंकि उनका भी प्रतीक होता है। उनकी भी ध्वनि होती है। बस एक अंतर होता है कि मात्राएं हमेशा किसी वर्ण के साथ ही इस्तेमाल की जाती हैं।

ध्वनि जागरूकता

अब आगे उनसे सवाल हो सकता है कि किसी वर्ण की ध्वनि के बारे में मौखिक रूप से बच्चों को बताना क्या है? ध्वनि जागरूकता या वर्ण ज्ञान। ऐसे सवाल से ध्वनि जागरूकता की पुख्ता समझ पर बात हो सकती है कि अगर यह गतिविधि मौखिक रूप से हो रही है। इसके लिए वर्ण के प्रतीक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। तो यह ध्वनि जागरूकता ही होगी।
अगर ध्वनि के साथ-साथ प्रतीक का इस्तेमाल भी किया जाता। उसे लिखने का तरीका भी बताया जाता। ध्वनि के साथ प्रतीक के संबंध को पुख्ता करने का प्रयास किया जाता तो उसे वर्ण ज्ञान वाली श्रेणी में रखते। ध्वनि जागरूकता का इस्तेमाल फोनिक्स अप्रोच से भाषा सिखाने के लिए किया जाता है। इस अप्रोच के अनुसार पढ़ने के दौरान बच्चा ध्वनियों को आपस में जोड़ता है और लिखने के दौरान उनको तोड़कर लिखता है। इसलिए किसी शब्द से ध्वनियों को अलग-अलग करके पहचानना जरूरी है। इसीलिए ध्वनि जागरूकता वाले कांसेप्ट में पहली आवाज़ पर काम होता है।

पढ़ने में कैसे मदद मिलती है?

पहली आवाज़ के साथ-साथ दूसरी आवाज़ व तीसरी आवाज़ की भी बात होती है। किसी शब्द में से ध्वनियों को तोड़ने पर भी काम होता है। उनको जोड़ने का भी अभ्यास कराया जाता है। इससे बच्चों को पढ़ने व लिखने के लिए जरूरी कौशल विकसित करने में मदद मिलती है। धीरे-धीरे बच्चा स्वाभाविक ढंग से शब्दों को पढ़ना सीख लेता है। इसके बाद डिकोडेबल की मदद से वाक्यों को पढ़ना सीख लेता है।
डिकोडेबल वह गद्यांश होता है जिसे उन्हीं वर्णों व मात्राओं का उपयोग करते हुए लिखा जाता है जिसे बच्चा आसानी से डिकोड कर सके। यानि शब्दों का उच्चारण कर सके। एक बच्चा जब धीरे-धीरे धाराप्रवाह पठन वाली स्थिति में आता है तो वह शब्दों के अर्थ भी पहचानने लगता है और किसी सामग्री को समझकर पढ़ने वाली स्थिति के लिए तैयार होता है।
Exit mobile version