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बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने का ‘सबसे सही तरीका’ क्या है?

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दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर रमाकान्त अग्निहोत्री ने हाल ही में एक परिचर्चा के दौरान कहा, “अगर हम भाषा शिक्षण की सही समझ के साथ काम करें तो बच्चे लिखना-पढ़ना वैसे ही सीख जाएंगे, जैसे वे सुनना और बोलना सीख जाते हैं।

हमें बच्चों के साथ संदर्भित संवाद, संदर्भित बातचीत, कविता, कहानी और चित्र का इस्तेमाल करें तो इससे बच्चों को पढ़ना सीखने में मदद मिलती है।” उन्होंने कहा कि केवल वर्णों की जगह संवाद, एक पूरे पाठ और एक चित्र को महत्व देने की जरूरत है ताकि अर्थ निर्माण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जा सके।

अकेले शब्द का कोई अर्थ नहीं होता

उन्होंने कहा कि अकेले शब्द का कोई अर्थ नहीं होता है, जबतक कि हम उसको किसी संवाद, कविता, कहानी या पाठ में इस्तेमाल नहीं करते हैं। संवाद तभी होता है या होती है, जब कोई बात किसी ख़ास संदर्भ में कही जाती है। जबतक संवाद सार्थक नहीं होगा, वह समझ का आधार नहीं बनेगा।

हमें बच्चों के साथ संवाद करके, उनके समझ का आधार तैयार करना चाहिए। बच्चे, सतत संवाद की प्रक्रिया में ध्वनि, शब्द व वाक्य की संरचना को एक से डेढ़ साल के भीतर आत्मसात कर लेते हैं। एक साल का बच्चा हज़ार तरह की ध्वनियों का रिहर्सल कर लेता है।

लगभग साल भर में बच्चे सुनना-बोलना सीख लेते हैं

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भाषा शिक्षण में संदर्भित संवाद और बातचीत का सकारात्मक असर पड़ता है।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “लगभग चार साल की बच्ची सुनी हुई कहानी को वापस अपने शब्दों में सुना देती है। तीन साल के होते-होते बच्चे पूरी कहानियां सुनाने लगते हैं, ऐसे में अभिभावक कहते हैं कि हमारा बच्चा तो चुप ही नहीं रहता। तीन साल में बच्चे तो लगभग आधे समय यानि डेढ़ साल सोते रहते हैं। 5-6 महीने बाकी नहाने-धोने, खाने इत्यादि जैसे काम में चले जाते हैं। हम भी बच्चों के साथ तुतलाकर बात करते हैं, तो ऐसे में लगभग एक साल में ही बच्चा अपने आसपास के परिवेश में सुनते-सुनते और अवलोकन से बोलना सीख जाता है। इस विश्लेषण का निष्कर्ष यही है कि हमें बच्चों के सीखने की क्षमता का अनादर नहीं करना चाहिए।”

क्या हमें बच्चों को वर्ण सिखाने की जरूरत है?

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भाषा शिक्षण के लिए दीवारों पर बना एक चित्र।

‘भाषा शिक्षण में ध्वनि-वर्ण संबंध पर ध्यान देने की बिल्कुल जरूरत नहीं है’ हमें ऐसा नहीं समझना चाहिए। ख़ासतौर पर हिंदी भाषा की लिपि सिखाने के संदर्भ में जो अधिकांश बच्चों के लिए दूसरी भाषा है, उसके शिक्षण के लिए ध्वनि-वर्ण संबंध के बारे में भी बताने की जरूरत पड़ती है। अंग्रेजी में वर्ण-ध्वनि संबंध सिखाने या केवल वर्ण पर फोकस करने से बाधा होती है। वहीं देवनागरी में वर्ण व ध्वनि का संबंध ज्यादा सीधा है, इसलिए इसको सिखाने-बताने से नुकसान नहीं है। लेकिन हमें केवल वर्ण पर निर्भरता से बचना चाहिए।

इसके साथ ही साथ बालगीत, कहानी, शब्दों के खेल, लाइब्रेरी के जरिये विभिन्न तरह की पाठ्य सामग्री से रूबरू होने का अवसर भी देना चाहिए। अगर यह सारी चीज़ें समानांतर होती रहें तो बच्चे को पढ़ना-लिखना सीखने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही साथ बच्चे को समझ के साथ पढ़ने या पढ़ने की प्रक्रिया में अर्थ निर्माण में भी काफी मदद मिलेगी।

हिंदी में मात्राओं के शिक्षण पर भी ध्यान देना होती है जबकि अंग्रेजी में मात्रा शिक्षण जैसी समस्या का सामना बच्चों को नहीं करना पड़ता है। फोनिक्स और होल लैंग्वेज अप्रोच के साथ होने वाले काम में देखा गया कि दोनों ही तरीकों के लगभग 50 फीसदी के आसपास ही बच्चे सीख पा रहे हैं, शेष बच्चे समझ के साथ पढ़ना-लिखना सीखने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए भाषा शिक्षण के तरीके में दोनों तरह की विधियों को अपनाने का प्रयास हो रहा है ताकि सीखने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा बच्चों की भागीदारी हासिल की जा सके।

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बन्धु कुशावर्ती

बहुत ज़रूरी और महत्व का विवरण।

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