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सीखने का मामला ‘क्लासरूम’ तक कैसे सिमट गया?

सीखना क्लासरूम में ही होता है, भारत में यह विचार पश्चिमी देशों से आयात किया गया। इसका खंडन रवींद्र नाथ टैगोर ने विश्वभारती की संकल्पना के माध्यम से किया। पश्चिमी देशों ने भी इस विचार को समय के साथ ख़ारिज कर दिया। मगर भारत में यह विचार आज भी जीवंत रूप में, क्लासरूम से इतर सीखने की कल्पना करने वाले लोगों के सामने एक चुनौती के रूप में बार-बार आ खड़ा होता है।

सीखना सिर्फ़ क्लास में होता है?

किसी स्कूल में बस यह कहकर देखिए कि बच्चों को क्लास से बाहर ले जाना है। यह कहने का मतलब है कि बच्चे पढ़ाई और सीखने के अलावा ही कुछ और कर रहे होंगे, यह कुछ और खेलना भी हो सकता है। कहानी सुनना भी और उस पर चर्चा करना भी। जबकि एनसीएफ-2005 के दस्तावेज कहते हैं कि बच्चों के आसपास के परिवेश और संदर्भ व उसकी मातृभाषा से काटिए मत, इससे कटकर बच्चा अपना व्यक्तित्व खो देता है।

सीखना ‘भयमुक्त’ हो

कल एक स्कूल में बच्चों से बात हो रही थी कि किसान के बच्चे खेत में बीज बोना कैसे सीख जाता है? तो उनका जवाब था कि देखकर। इस देखने को बच्चों के अवलोकन व उस अवलोकन के क्रियान्वयन तक ले जाने की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। इस माहौल में बच्चा डरता है क्या, इस सवाल पर बच्चों का जवाब था कि नहीं। यानी सीखने और डर का रिश्ता उतना फिक्स नहीं है, जितना माना या विश्वास किया जाता है।

बच्चों से एक और बात हुई कि स्कूल में सिर्फ बच्चे ही सीखते हैं? तो उनका जवाब था कि हाँ। मैंने जवाब दिया कि ऐसा नहीं है। शिक्षक भी बच्चों से सीखते हैं। अगर यह बात सभी शिक्षकों में हो, यानी शिक्षक के भीतर सीखने की स्वाभाविक ललक हो तो वे बच्चों के जीवन में बदलाव लाने के साथ-साथ अपने जीवन भी बदलाव लाने में समर्थ होंगे। इसके साथ ही साथ वे अपने जीवन के ठहराव को गति देने की राह भी खोज लेंगे।

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