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ऐसी भाषा में हो पढ़ाई, जिसे बच्चे समझते हों

बच्चे को किस माध्यम में पढ़ाया जाये? भाषा में प्राथमिक शिक्षा के विमर्श का एक पहलू इस सवाल से जुड़ा हुआ है। ऐसे विमर्श में बाज़ार की भाषा मीडियम के रूप में एक मार्केट बना रही है। इसके कारण बहुत से बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ना पड़ रहा है। जबकि उनके घर की भाषा हिंदी या कुछ और है। इसके कारण वे एक स्थिति का सामना करते हैं जिसमें वे पढ़ाये जाने वाली विषय सामग्री (कंटेंट) को समझ नहीं पाते, क्योंकि उनकी पढ़ाई एक ऐसी भाषा में हो रही है, जिसे वे नहीं समझते। इसी बात के मद्देनजर पेरू में द्विभाषी अंतर-सांस्कृतिक शिक्षा देने की शुरुआत की गई है। भारत की भाषाई विविधता के संदर्भ में यह विचार ग़ौर करने लायक है।

बच्चे की भाषा में हो पढ़ाई, मीडियम और मैसेज की लड़ाई, भारत में प्राथमिक शिक्षाभाषाविज्ञानी और शिक्षाविद बच्चों को ऐसी भाषा में पढ़ाने के विचार का समर्थन करते हैं जो बच्चे आसानी से समझते हों। वे मानते हैं कि बच्चा जब स्कूल में आता है तो अपने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से काफी कुछ सीखकर आता है। इस सीखने में उसके घर की भाषा भी शामिल होती है। इसलिए बच्चों को शुरुआती कक्षाओं में उनकी भाषा में ही पढ़ाना चाहिए।

इससे बच्चों का शिक्षण एक ऐसी भाषा में होना सुनिश्चित किया जा सकेगा जिसके साथ वे सहज होंगे। यानि सुनकर समझने वाले स्तर तक उनका परिचय इस भाषा से होगा। यह तस्वीर उसी तथ्य की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती है, “बच्चों को उसी भाषा में पढ़ाया जाना जिसे वे समझते हैं।”

समझने वाली भाषा आखिर कब तक?

यहां एक तथ्य पर ध्यान देना जरूरी है कि बच्चा अपने लंबे जीवनकाल में अन्य भाषाओं और संस्कृतियों के संपर्क में भी आयेगा। इसलिए हमें उसे अन्य भाषाओं को सीखने के लिए तैयार करना जरूरी है। जिसकी जरूरत उन्हें भविष्य में होगी। उदाहरण के तौर पर हिंदी, अंग्रेजी इत्यादि। इसके अभाव में बच्चों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना होता है कि क्योंकि उनके शिक्षक बच्चों को क्षेत्रीय भाषाओं में समझाते हैं और उनकी किताबें हिंदी या अंग्रेजी में होती हैं। अंग्रेजी पढ़ाने वाली स्थिति तो और भी ख़तरनाक होती है बच्चे को हर शब्द का हिंदी में अनुवाद करके पढ़ना होता है। चेयर मतलब कुर्सी। ऐसी स्थिति में एक बच्चे को कई तरह की चुनौती का सामना करना होता है और वह उस भाषा में अपनी रुचि खो देता है।

बच्चों को सही तरीके से पढ़ना सिखाना भी जरूरी है। पढ़ने को समझ के साथ जोड़कर देखने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। उनको उदाहरणों के माध्यम से भाषा का इस्तेमाल करने की कला से अवगत कराना चाहिए। मसलन समझ का पढ़ने के साथ वेसा ही रिश्ता है जैसा सुनने और समझने का है। यानी दोनों साथ-साथ चलने वाली प्रक्रियाएं हैं।

कुछ जरूरी बातें

इसके साथ ही बच्चे की परवरिश इस तरीके से होनी चाहिए ताकि वह अन्य संस्कृतियों के साथ संवाद और संपर्क को लेकर सहज हो। इस सहजता का आधार अन्य भाषाओं की जानकारी, अन्य संस्कृतियों को समझने में सामान्य अभिरुचि का विकास ही होगा। इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा। यह कहते हुए एक बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि बच्चे केवल स्कूल में नहीं सीखता। वह टेलीविज़न से भी सीखता है। अख़बारों में छपने वाले समाचारों और अपने आसपास के लोगों की उसके बारे में दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं से भी अपने मन में एक धारणा बनाता है।

ये धारणाएं सही भी हो सकती है और पूर्वाग्रह से ओतप्रोत भी। ऐसे में जरूरी है कि एक बच्चे को समय के साथ तथ्यों का विश्लेषण करना। चीज़ों को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखना। अपने अनुभवों को बाकी लोगों के विचारों से मिलाकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रशिक्षण धीरे-धीरे दिया जाना चाहिए। ताकि वह आँख मूंदकर चीज़ों के प्रभाव में न आये। किसी तथ्य को सर्वकालिक मानकर उससे चिपका भी न रहे। समय के साथ वह गतिशील रहे। अपने विचारों को समय के साथ अपडेट करता रहे। विरोधी विचारों के साथ संवाद करता रहे। जिन विचारों का वह हिमायती है उसके पक्ष में अपने तर्कों को मजबूत करते हुए आगे बढ़े। क्योंकि वर्तमान समय में तथ्यों के ऊपर अफवाहें हावी हैं। ऐसे में विचारों का ऑपरेशन करने और सही तथ्यों तक पहुंचने वाली विचार प्रक्रिया से बच्चों का अवगत होना जरूरी है। यह काम रोज़मर्रा का काम है।

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