‘बड़े स्केल का समाधान, बड़े स्केल की समस्या भी खड़ी करता है’
ज़मीनी सच्चाई है अलग
शिक्षण-अधिगम की निरंतरता है जरूरी
आखिर में एक ग़ौर करने की बात कि अगर परंपरागत तरीके से भी निरंतरता के साथ बच्चों को पढ़ाया जाए और उनको अभ्यास करने के पर्याप्त मौके दिअए जाएं तो भी बच्चे पढ़ना सीख जाते हैं। यह भी 100 फीसदी सच है। इस तरीके से सीखने के बाद पेश आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर अलग से बात की जा सकती है। यहाँ बस केवल इतना संकेत करना है कि छोटे बच्चों के साथ काम करने के लिए निरंतरता बेहद जरूरी है। अगर शिक्षण कार्य की निरंतरता नहीं है तो पढ़ाने की तरीका चाहें वर्ण पद्धति वाला हो, शब्द पद्धति वाला हो, संतुलित भाषा पद्धति वाला हो या समग्र भाषा पद्धति वाला हो, बच्चों के सीखने पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप भी अपने विचार और अनुभव साझा कर सकते हैं।
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