Site icon एजुकेशन मिरर

स्कूल स्टोरीः वह डरती थी, मगर मन की करती थी

शिक्षा जीवन भर चलती रहती है।


एक स्कूल में पढ़ने जाने वाली एक लड़की हमेशा चुप व डरी-सहमी सी रहती थी। स्कूल के बाकी बच्चे अगर उसे मारते या परेशान करते तो वह केवल रोती थी। स्कूल के अधिकांश अध्यापकों को लगता था कि वह बोल नहीं सकती है। वह रोज़ प्रार्थना की लाइन से अलग खड़ी होती थी, जहाँ से वह सारे बच्चों को पंक्ति में खड़े होते और प्रातःकालीन सभा में शामिल होते देखती.

उसे कक्षा में बैठने की बजाय पट्टी लेकर बाहर घूमना अच्छा लगता था। मैं राजस्थान के एक छोटे से गाँव के  उस स्कूल में रोज़ पहली-दूसरी कक्षा को पढ़ाने के लिए जाता था। इस दौरान मैं यह जानने की कोशिश कर रहा था कि बच्चे आख़िर सीखते कैसे हैं? उस समय मैं गाँधी फेलोशिप के विलेज इमर्सन के दौरान एक-डेढ़ महीने के लिए उसी गांव में रहता था। इस दौरान स्कूल के बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए गाँव के अलग-अलग समुदाय के बच्चों के घर पर अभिभावकों से मिलने के लिए जाना होता था। ताकि अभिभावकों से संवाद हो सके और स्कूल को लेकर वे क्या सोचते हैं पता चल सके।

‘माया नहीं, मोनिका’

एक दिन स्कूल में चुप रहने वाली लड़की के बारे में जानने के लिए, मैं उसके घर गया। जब मैं उसके घर पहुंचा तो वह गीली मिट्टी के सुंदर गोले बना रही थी। उसने मुझे देखते ही पहचान लिया। मैं उसकी दादी से उसके बारे में बात करने लगा। लेकिन वह अपने काम में मगन थी। बातों ही बातों में उसकी दादी ने बताया कि उसका नाम मोनिका है। यानि सारा स्कूल जिसे माया के नाम से बुलाता था, वह माया नहीं मोनिक है। यह मुझे उस दिन दादी जी से मिलने के बाद पता चला। उस स्कूल में कई सारी बच्चियों का नाम माया था। इसलिए गुरु जी लोगों ने शायद सोचा कि इसका नाम भी माया ही होगा। एक कॉमन नाम। लेकिन वह बच्ची बाकी बच्चों से जरा हटकर थी। अगर उसे किसी निर्देश को मानने का मन नहीं होता था, तो वह नहीं मानती थी।

मोनिका डरती जरूर थी। लेकिन वह वही करती थी, जो उसका मन करता था। धीरे-धीरे उसने स्कूल में बाकी बच्चों के साथ घुलना-मिलना शुरु किया। जब मैं स्कूल में बच्चों के साथ बालगीत करता था, तो वह शुरूआती दिनों में दरवाज़े के पास खड़ी होकर बाकी बच्चों को बालगीत करते हुए टुकुर-टकुर देखा करती थी। धीरे-धीरे वह भी बाकी बच्चों के साथ शामिल होने लगी और उसके मन का डर धीरे-धीरे दूर होने लगा।

इसका असर यह हुआ कि वह अब बाकी बच्चों से भी बात करने लगी। अपनी बात रखने लगी। अगर कोई उसे मारता तो मेरे पास या जो भी शिक्षक-शिक्षिका उस स्कूल में पढ़ा रहे होते उनसे शिकायत करती। एक समय तो वह बातों की बजाय पट्टी से जवाब भी देने लगी तो मैनें समझ लिया कि वह जीवन जीने की कला सीख रही है। अगर कोई उसे मारता तो वह भी पट्टी घुमाकर मारती थी। इसके कारण उसको परेशान करने वाले बच्चे अब उससे सलीके से पेश आने लगे।

ख़ामोशी के बोल पड़ने की ख़ुशी
 
कुछ दिनों में धीरे-धीरे वह कक्षा में बाकी बच्चों के साथ कहानी सुनने और पढ़ने बैठने लगी। कुछ लिखने का अभ्यास करने लगी। उसने बालगीत गाना भी शुरू कर दिया। हम कह सकते हैं कि स्कूल के माध्यम उसके व्यवहार का सामाजीकरण हो रहा था। अब वह अध्यापकों का कहना भी मानने लगी थी। प्रार्थना से बाहर खड़ी होने वाली मोनिका अब लाइन में सबसे आगे खड़ी होती थी। दोपहर के एमडीएम के समय अपनी प्लेट लेकर खाना खाती और रेती से साफ़ करके पानी से धोती। कक्षा में जब उसका बैठने का मन नहीं होता था तो वह बाहर की ओर भागती थी। उसके साथ-साथ कक्षा के बाकी बच्चे भी बाहर की ओर भागते थे। उसकी धमाचौकड़ी खुशी देने वाली थी। एक ख़ामोशी के बोल पड़ने की ख़ुशी।

बच्चों में आत्मविश्वास से आता है बदलाव
अब वह ख़ामोश माया से बोलने और जवाब देने वाली मोनिका हो गई थी। गाँव से वापस आने के पहले मोनिका के दादा-दादी और उसके चाचा से बात हुई। उन्होनें बताया कि अब तो मोनिका बोलती भी है। लेकिन वह अपने मन की मालिक है। जब मन होता है तभी आंक माड़ती (यानि लिखती) है। जब मन होता है तो खेलने चली जाती है। अब वह बाहर जाने से डरती नहीं है। अपनी दादी के साथ अब वह गाँव में घूमने भी जाती है। उसके व्यवहार में होने वाले बदलाव को देखकर घर के लोग काफी खुश थे। गाँव में रहने और लगातार स्कूल जाने के कारण मैं मोनिका को बाकी बच्चों का सामना करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित कर पाया। ऐसे प्रोत्साहन के अभाव में न जाने कितनी मोनिका जैसी लड़कियां भययुक्त माहौल व डर के कारण भीड़ में ‘माया’ बनकर खो जाती हैं।

स्कूल आने वाले बच्चों को प्रोत्साहित करने और उनके अध्यापकों के साथ निरंतर संवाद करने की कोशिश माता-पिता को करनी चाहिए। लेकिन गाँव और शहरों में घरेलू कामों में व्यस्तता के कारण परिवार के लोग पीटएम ( अध्याप और अभिभावक बैठक) में शामिल नहीं हो पाते।  इस काम को औपचारिकता के दायरों को तोड़कर भी किया जा सकता है। जब भी मौका मिले तो शिक्षक अभिभावकों से मिल सकते हैं या अभिभावक अपने बच्चों के स्कूल आ सकते हैं।  आखिर में सबसे जरूरी बात कि बच्चों पर भरोसे और प्रोत्साहन से उनकी झिझक तोड़ने में मदद मिलती है। एक ख़ामोशी को बोलने का कारण मिलता है और बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है। इसलिए शिक्षक और बच्चों के बीच संवाद का यह सिलसिला जारी रहना चाहिए।

(आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर फ़ॉलो कर सकते हैं। वीडियो कंटेंट व स्टोरी के लिए एजुकेशन मिरर के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें।)

Exit mobile version