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स्वतंत्र चिंतन में सक्षम बनाये शिक्षाः बर्ट्रेंड रसेल

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बर्ट्रेंड रसेल का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य एक विद्यार्थी को स्वतंत्र चिंतन में सक्षम बनाना होना चाहिए।

दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य शिक्षार्थी में वैज्ञानिक चिन्तन का विकास मानते थे, जिससे वह अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर स्वतंत्र चिंतन कर सके। साम्यवादी व्यवस्था के आर्थिक उद्देश्यों से सहमत होते हुए भी रसेल इसी कारण से उसकी प्रक्रिया से सहमत नहीं हो पाये क्योंकि उसमें स्वतंत्र चिंतन और विचार-विमर्श का दमन किया जाता है।

21वीं शताब्दी के लोकतांत्रिक भारत के बारे में भी ये विचार ग़ौर करने लायक है। बदलते समय के साथ कुछ विचार अपनी प्रासंगिकता नहीं खोते, रसेल के ये विचार भी समसामयिक और प्रासंगिक हैं।

शिक्षा मतलब सूचना नहीं है

रसेल का विचार था कि अगर मानव-जाति को हिंसा और लोभ से मुक्त करना है- क्योंकि यही दो अधिकांश बुराइयों के मूल में हैं तो हमें अपने विशाल शिक्षण संस्थानों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों के ढांचे और शिक्षा प्रक्रिया में बुनियादी परिवर्तन करने होंगे।

क्रांति किसी हिंसक प्रक्रिया या क़ाग़जी क़ानूनों के जरिये नहीं लाई जा सकती। उसके लिए हमारी आदतों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति आवश्यक है और उसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम शिक्षा ही हो सकती है। बशर्ते कि हम शिक्षा को औपचारिक और सूचनात्मक ही न बना दें।

जिस तरह से मनुष्यों ने दूसरों को नियंत्रित करना सीखा है, उसी तरह व अपने को नियंत्रित करना सीख जाय तो दुनिया की अधिकांश सामाजिक समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। यह कार्य शिक्षा से हो सकता है। लेकिन तभी, जब हम केवल पाठ्यक्रम में ही नहीं, अपने पारिवारिक और सामाजिक वातावरण में भी इस संकल्प को वरीयता दें।

(नंदकिशोर आचार्य की लिखी पुस्तक आधुनिक विचार में प्रकाशित लेख ‘पूर्वाग्रहों से मुक्तिः बर्टेंड रसेल’ के अंश)

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