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शिक्षा मनोविज्ञान में चिंतन क्या है?

शिक्षा मनोविज्ञान में चिंतन शब्द का उपयोग काफी प्रचलित है। चिंतन एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जो सभी प्राणियों में होती है। इसे वातावरण से मिलने वाली सूचनाओं का मानसिक जोड़-तोड़ या फिर किसी समस्या व समाधान के बीच की मध्यस्थ प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जो सही अनुक्रिया का चुनाव करने में मदद करती है।

चिंतन की परिभाषा

इसे प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं जा सकता है, केवल व्यवहार के माध्यम से ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है, इसलिए इसे एक अव्यक्त मानसिक प्रक्रिया कहा जाता है। कागन और हेमैन के अनुसार, “प्रतिमाओं, प्रतीकों, संप्रत्ययों, नियमों व अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक जोड़-तोड़ को चिंतन कहा जाता है।”

दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य शिक्षार्थी में वैज्ञानिक चिन्तन का विकास मानते थे, जिससे वह अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर स्वतंत्र चिंतन कर सके। इस नजरिए से भी शिक्षा में चिंतन का महत्व समझा जा सकता है। उपरोक्त परीक्षा से चिंतन के बारे में कुछ बातें स्पष्ट होती हैं जैसे चिंतन में प्रतीकों व संप्रत्ययों का इस्तेमाल होता है। यह एक मध्यस्थ प्रक्रिया है, जो किसी उद्दीपक के सामने आने पर सही अनुक्रिया के चुनाव की तरफ ले जाती है। यह प्रक्रिया समस्या समाधान के लिए काफी उपयोगी है।

समस्या समाधान की प्रक्रिया है चिंतन

चिंतन की प्रक्रिया उस समय शुरू होती है जब मनुष्य के सामने कोई ऐसी समस्या आती है, जिसका वह उसका समाधान करना चाहता है। समस्या का आशय यहां ऐसी परिस्थिति से है जिसमें किसी मनुष्य को स्पष्ट रास्ता नहीं मिलता है। उदाहरण के तौर पर विभिन्न स्कूलों में प्रभावशाली शिक्षण के बावजूद बच्चों के सीखने का स्तर कम होने के बाद शिक्षक प्रशिक्षक ने सोचना शुरू किया कि ऐसा क्यों हो रहा है? तो उसे कक्षाओं के अवलोकन के दौरान पता चला कि शिक्षक कुछ ही बच्चों के ऊपर ध्यान दे रहे हैं, इसी कारण से कुछ बच्चों का सीखना तो हो रहा है, मगर बाकी बच्चे सीखने के मामले में पीछे छूट जा रहा है।

इससे सोचने वाले शिक्षक प्रशिक्षक को एक रास्ता मिला कि बच्चों की भागीदारी को बढ़ाकर बच्चों के सीखने का स्तर बढ़ाया जा सकता है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

चिंतन में समस्या के विभिन्न पहलुओं को जो समाधान से पहले अलग-अलग होते हैं एक साथ संयोजित किया जाता है। जैसे उपरोक्त परिस्थिति में शिक्षक प्रशिक्षक ने बच्चों की भागीदारी वाले सवाल को क्लासरूम की बैठक व्यवस्था से भी जोड़कर देखा।

शिक्षक बच्चों के साथ आत्मीयता से बात करते हैं या सिर्फ यांत्रिक तरीके से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बच्चों की परेशानी को शिक्षक समझने की कोशिश कर रहे हैं या नहीं। ऐसे विभिन्न पहलुओं की पड़ताल शिक्षक प्रशिक्षक द्वारा की गई।

ऐसी परिस्थिति में शिक्षक प्रशिक्षक ने अन्य साथियों के साथ बात करके इस तथ्य को समझने का प्रयास किया कि क्या शिक्षक 4-5 बच्चों को पूरी क्लास समझ रहे हैं या फिर सारे बच्चों को भागीदारी दे रहे हैं, जो नहीं सीख पा रहे हैं उनकी भी भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं।

चिंतन लक्ष्य निर्देशित होता है

चिंतन में अतीत के अनुभवों का भी इस्तेमाल होता है। एक अनुभव के स्पष्ट होने से बाकी अनुभवों की स्पष्टता में मदद मिलती है। चिंतन में प्रयास और भूल वाली प्रक्रिया शामिल होती है। जब हम किसी समस्या पर विचार कर रहे होते हैं तो हमारे मन में भांति-भांति की अनुक्रियाएं एक के बाद एक आती हैं। इस प्रक्रिया में हम सही अनुक्रिया का चुनाव करते हैं। चिंतन पर अभिप्रेरणा (या मोटीवेशन) का भी असर होता है।

बचपन सवाल करता है..यही कारण है कि विटेकर ने कहा कि सभी चिंतन लक्ष्य की दिशा में निर्देशित होते हैं। चिंतन में भाषा का काफी महत्व होता है। कुछ लोग बोलकर सोचते हैं तो कुछ लोग ख़ामोशी के साथ सोचने के आदती होते हैं। बोलकर सोचने वाली स्थिति को मोनोलॉग या आंतरिक संभाषण कहते हैं।

चिंतन में भाषा के साथ प्रतीकों व प्रतिमाओं का भी उपयोग होता है। अंततः हम कह सकते हैं कि चिंतन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से हम किसी समस्या के समाधान तक पहुंचते हैं।

अगली पोस्ट में चर्चा होगी चिंतन के प्रकार और चिंतन के साधन की।

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