पिछली पोस्ट में हमनें ‘चिंतन’ के बारे में पढ़ा कि चिंतन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम या आप किसी समस्या का समाधान करते हैं। इस पोस्ट में चिंतन के प्रकार के बारे में पढ़ेंगे।
मनोविज्ञान में मूल रूप से चिंतन के दो प्रकार है स्वलि चिंतन (Autistic Thinking) और यथार्थवादी चिंतन (Realistic Thinking)। यथार्थवादी चिंतन को भी तीन श्रेणियों (अभिसारी, सर्जनात्मक और आलोचनात्मक) में बांटकर इसका अध्ययन किया जाता है।
स्वलि चिंतन
ऐसा चिंतन जिसमें व्यक्ति अपने काल्पनिक विचारों व इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है उसे स्वलि चिंतन कहते हैं। जैसे स्वपन(Dream), स्वपनचित्र (fantasy)। जैसे अगर कोई छात्र कहता है कि वह बड़ा होकर कार खरीदेगा। जिसमें वह पूरे परिवार के साथ घूमने जाएगा। पूरी दुनिया की सैर करेगा। तो इस तरह का चिंतन निःसंदेह स्वलि चिंतन का उदाहरण होगा।
इस तरह के चिंतन में कल्पना तत्व की प्रधानता होता है। आइंस्टीन अपने एक कथन में कहते हैं, “कल्पना, ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।” इससे कल्पना के महत्व को समझा जा सकता है।
यथार्थवादी चिंतन
ऐसा चिंतन जिसका संबंध यथार्थ जीवन से होता है और जिससे किसी समस्या के समाधान में मदद मिलती है यथार्थवादी चिंतन कहते हैं। जैसे अगर किसी छात्र के एक सेमेस्टर में कम नंबर आए। तो उसे फिक्र होती है कि अगले सेमेस्टर में अच्छा नंबर लेकर आए और वह इसके लिए योजना बनाकर तैयारी करता है ताकि भविष्य में होने वाली परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सके तो यह यथार्थवादी चिंतन का उदाहरण होगा।
इसके लिए उनके मन में ढेर सारे विकल्प आते हैं जैसे पढ़ते समय उस बच्चे पर ज्यादा ध्यान देना, उसे किसी किताब को पढ़कर सुनाना ताकि उसे पढ़ने का वास्तविक अनुभव मिल सके। अगर उसे किसी मात्रा को पढ़ने में दिक्कत हो रही है तो उसपर काम करना।
इस तरह का चिंतन यथार्थवादी चिंतन का उदाहरण है जिससे हम किसी समस्या का समाधान करते हैं। यथार्थवादी चिंतन को भी तीन भागों में बांटा गया है
1.अभिसारी चिंतन
2सर्जनात्मक चिंतन
3.आलोचनात्मक चिंतन
अगली पोस्ट में यथार्थवादी चिंतन की विस्तार में पड़ताल करते हैं।

