ग्राममंगल की स्थापन के पीछे शिक्षाविद गिजूभाई बधेका की ही प्रेरणा है।
महाराष्ट्र में पिछले 35 साल से पालघर जिले के डहाणू में ग्राममंगल संस्था शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही है। महान शिक्षाविद् गिजूभाई बधेका एवं बाल शिक्षाविद् पद्म विभूषण ताराबाई मोडक से प्रेरणा लेकर पद्मश्री अनुताई वाघ एवं प्रा. रमेश पानसे ने ग्राममंगल संस्था की स्थापन की। शिक्षा को सहज और सरल रूप देकर, उसे समाज के हर तबके तक पहुंचाने का कार्य यह संस्था कर रही है।
महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने में ग्राममंगल संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हम सभी इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि कोई भी काम खडा करने के लिये, कोई भी काम समाज के हर तबके तक पहुंचाने के लिये अच्छे नेतृत्व के साथ-साथ कड़ी मेहनत, लगन और निष्ठा से काम करने वाले कार्यकर्ताओं की जरुरत होती है। ऐसे कार्यकर्ताओं के अभाव में कोई भी नेतृत्व कभी उभर ही नही पायेगा। ऐसे कार्यकर्ताओ के बलबूते पर ही कोई भी संस्था सालों से काम कर सकती है।
ग्राममंगल में पिछले बीस साल से भी अधिक समय से काम करनेवाले लोग हैं। ऐसे ही लोग इस संस्था के स्तंभ हैं, जिनके भरोसे यह संस्था दुनिया बदलने की, व्यवस्था बदलने का जिम्मा उठा सकती है। अक्सर ये लोग काम करने मे व्यस्त रहते है। प्रसिद्धि से ज्यादा लगाव नही रखते।
ग्राममंगल संस्था में काम करने वाले श्याम दादा की कहानी
सच्चे दिल से, निर्मल-मन से यह लोग बस अपना काम करते रहते है। आज ‘एजुकेशन मिरर’ ग्राममंगल संस्था में पिछले 29 साल से काम करनेवाले एक ‘नेपथ्य से नेतृत्व करने वाले’ व्यक्तित्व के अनेक आयामों से आपको रूबरू कराने जा रही हैI जो इस देश के युवा कार्यकर्ताओ के लिये एक मिशाल हो सकते, उनका नाम है श्याम दादा।
अपने काम के प्रति लगन और दूसरों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहने की भावना श्याम दादा के स्वभाव का हिस्सा है।
वैसे श्याम दादा अपने नाम से कम और काम से ज्यादा पहचाने जाते हैं। महाराष्ट्र के पालघर जिले के डहाणू तहसील मे ऐना नामक गाँव मे रहने वाले श्याम दादा, ग्राममंगल संस्था के स्कूल और कैंपस व्यवस्थापक तौर पर काम करते है।
घने जंगलों से बसा हुआ यह गाँव आज भी भौतिक विकास से कोसों दूर है। हाल ही में गांव मे मेडिकल की पहली दुकान खुली है। इससे हम एक अंदाजा लगा सकते हैं की 20 साल पहले उसकी स्तिथि क्या रही होगी।
‘करके देखो’ इस बात ने जीना सिखा दिया
श्याम दादा कि परवरिश इसी गाँव मे हुई। शरीरिक विकलांगता के कारण बचपन में वे कोई काम करने या बाकी बच्चों के साथ खेलने से कतराते थे। एक पैर से विकलांग होने के बावजूद बचपन मे क्रिकेट खेलने में, अपने गाँव के स्कूल में मशहूर होने की कहानी जब वो ख़ुद अपने मुँह से सुनाते हैं तो उनके अंदर कूट-कूट कर भरा हुआ आत्मसम्मान साफ़-साफ़ नज़र आता है। ग्राममंगल संस्था के संस्थापक रमेश पानसे को वे अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। उनका कहना है, रमेश पानसे जी का ‘करके देखो’ इस वाक्यांश ने उनके जीवन को बदल डाला है।
यहाँ की शिक्षा पद्धति को समझने की चाह में आते हैं विज़िटर
ग्राममंगल के स्कूल और शिक्षा पद्धती को जानने, समझने के लिए दुनिया के विभिन्न कोने से अनेक मेहमान ग्राममंगल संस्था में विज़िट के लिए आते हैं। कैंपस व्यवस्थापक होने के नाते उनकी मेहमान नवाजी करने का महत्वपूर्ण जिम्मा सालों से अपने कंधों पर उठा रहे है। श्याम दादा कहते हैं कि इस संस्था विज़िट करने वाले लोग अक्सर समाज के अच्छे लोगो में से, सकारात्मक तरीके से जीनेवालों में से होते हैं। उनकी रहने-खाने की बढ़िया व्यवस्था करने का अवसर मिल रहा है, इससे बड़े सौभाग्य की बात और क्या हो सकती है? इन लोगों से मुझे आजतक बहुत कुछ सिखने को मिला है।
ग्राममंगल अपने कैंपस मे स्थानीय वनवासी बच्चों के लिये ‘मुक्त शाळा’ नामक स्कूल चलाती हैं। इस स्कूल मे आसपास के गाँवों सें लगभग 150 बच्चे पढने आते है। बच्चों को रोज दोपहर का भोजन परोसा जाता है। यह जिम्मेदारी श्याम दादा बखूबी निभाते हैं। सामाजिक संस्था होने का कारण बच्चों को दिये जाने वाले भोजन का खर्चा स्कूल को मिलने वाले फंड से ही करना पढता है। कम से कम खर्चे मे ज्यादा से ज्यादा अच्छा खाना देने का उनका प्रयास रहता है। खाना परोसने से लेकर बर्तन धोने तक के सभी काम श्याम दादा स्वयं करते हैं।
संवाद कौशल में प्रवीण हैं श्याम दादा
ग्राममंगल एक सामाजिक संस्था होने के नाते यहां संस्था के माध्यम से अनेक सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते है। इसके कारण, कई सारे जगह श्याम दादा को कार्यक्रम का समालोचन करना होता था, भीड के सामने खडे़ होकर अपनी बात रखनी पडती थी। इस तरह के अवसरों के कारण श्याम दादा के भाषण कौशल को उभार मिला।
पालघर जिला एक समुद्र तटीय क्षेत्र है।
कुछ साल पहले श्याम दादा के नेतृत्व मे ग्राममंगल संस्था ने डहाणू तहसील में लगभग 25 बालवाड़ी निर्माण का काम करवाया। ये सभी बालवाड़ी ग्राममंगल शिक्षा पद्धती के अनुसार चलाई जाती थी। इस दौरान श्याम दादा और उनके टीम ने हर गाँव में जाना, वहाँ के लोगों को शिक्षा का महत्व समझाना और बालवाड़ी के लिए गाँव वालों की अनुमति से जगह उपलब्ध करवाने और ज्यादा से ज्यादा बच्चे बालवाड़ी आएं, यह सुनिश्चित करना आदि कार्यों का जिम्मा उठाया था। इससे श्याम दादा की नई संस्था की शुरूआत करने का कौशल भी दिखाई देता है।
जब उनसे 29 साल से ग्राममंगल के साथ जुडे रहने का राज पूछा गया तो उन्होने कहा, “आज मै जो भी हूँ वह ग्राममंगल और उसके संस्थापक रमेश पानसे जी के कारण हूँ। इस संस्था ने और यहां के लोगो ने मुझे बहुत कुछ दिया है। रमेश पानसे जी ने तो मुझे आत्मसम्मान दिलाया जिसके कारण मै शरीर से विकलांग होने के बावजुद जिंदगी के साथ दो-दो हाथ करने के लिये आत्मविश्वास से खड़ा रहता हूँ। ग्राममंगल ने मुझे जीने का मकसद दिलाया, जिसके कारण आज ग्राममंगल मे आनेवाले सभी शिक्षाविद्, समाज सेवकों की तहे दिल से सेवा करने का मौका मिला। ग्राममंगल के कारण सामाजिक क्षेत्र मे मेरा सम्मान बढा है।”
क्या कहते हैं संस्थापक रमेशा पानसे
ग्राममंगल के संस्थापक सदस्य रमेश पानसे जी कहते हैं कि ऐसे कार्यकर्ताओ की वजह से ही आज ग्राममंगल शिक्षा के क्षेत्र मे अदभूत परिवर्तन ला पायी और देश के आखिरी इंसान तक पहुच पायी। ग्राममंगल का यह भाग्य है कि ऐसे कार्यकर्ता हमारे परिवार के एक सदस्य है। इस तरह एक कार्यकर्ता पिछले 29 साल से ग्राममंगल संस्था का कोई भी काम करने के लिये कभी भी खडे़ हो सकते है,खाना परोसने से लेकर स्टेज भर भाषण देने तक, बीमार लोगो को अस्पताल लेकर जाने से लेकर संस्था के हर एक कार्यकर्ता की हर एक समस्या अपनी समस्या समझकर सुलझाने तक के कामों को बडी लगन और निष्ठा से करने वाले श्याम दादा का व्यक्तित्व आज की युवा पीढ़ी के लिए निश्चित रूप से प्रेरणादायी है।
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