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शिक्षा विमर्शः जब सवालों से संवाद होता है, तो जवाब के सिलसिले निकलते हैं

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सरकारी स्कूलों की स्थिति में बदलाव की प्रतिबद्धता को साकार करते हैं दिल्ली सरकार के प्रयास। 

अगर हम जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो हमें बड़े सपने देखने चाहिए। यह बात जितनी जीवन के बारे में सच है, उतनी ही शिक्षा क्षेत्र के बारे में सच है। इस क्षेत्र में भी सपनों के बीज बोने और उनके अंकुरित होता देखने की चाह रखने वाले शिक्षकों की जरूरत है।

इसके अभाव में हम उन्हीं विचारों की कैद में जूझते रहेंगे जो कहते हैं, “पहली कक्षा में आने वाले बच्चे छोटे होते हैं। छोटे बच्चे तो किताब नहीं पकड़ पाते, पढ़ना कैसे सीख लेंगे। हम तो तीसरी कक्षा से बच्चों को पढ़ना सिखाते हैं। बच्चे नासमझ होते हैं, उनके हाथ में महंगी किताबें देने का कोई फ़ायदा नहीं है, वे किताब फाड़ देंगे।”

बच्चों के प्रति अविश्वास का भाव कहाँ से आता है?

बच्चों के प्रति अविश्वास का यह भाव कहां से आता है? बच्चों से रोबोट जैसे अनुशासन की अपेक्षा रखने की जिद कहाँ से आती है? बच्चों के सीखने की क्षमता पर संदेह की बुनियाद के निर्माण को सालों-साल मजबूत बनाये रखने वाली सोच को पोषण कहाँ से मिल रहा है, क्या इस विचार को कमज़ोर करने वाले वैकल्पिक विचारों में लोगों को प्रभावित करने की सामर्थ्य हैं भी या नहीं। ऐसे विचारों के साथ रूबरू होना हमें आगे ले जाता है, उस यथास्थिति को तोड़ने का हौसला देता है।

अगर हम वास्तव में कोई समाधान चाहते हैं तो हमारे पास सही सवाल होने चाहिए। जबतक हमारे सवाल साफ़ नहीं होते, हम किसी जवाब तक पहुंचने की कार्य योजना नहीं बना पाते हैं। उदाहरण के तौर पर मेरे मन में यह जानने की बड़ी गहरी इच्छा थी कि बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं? पूरी प्रक्रिया किस मोड़ से होकर गुजरती है। क्या बच्चे सच में ख़ुद से सीखते हैं? या फिर उनके सीखने की प्रक्रिया को सुगम बनाने और सहयोग करने में शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इन सवालों से रूबरू होने की यात्रा मुझे राजस्थान के आदिवासी अंचल के स्कूलों की तरफ ले गई।

मैं पहली जुलाई 2015 को राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में शिक्षकों के साथ बैठकर मिड डे मील खाते हुए, शिक्षा के क्षेत्र की तस्वीर बदलने वाले सवालों, उसके संभावित जवाबों पर चर्चा कर रहा था। यह पूरी कहानी आपने सिलसिलेवार ढंग से एजुकेशन मिरर पर पढ़ी है। वे दिन एजुकेशन मिरर के बचपन के दिन थे, जब एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने का सपना आकार ले रहा था जहाँ ज़मीनी मुद्दों और शिक्षकों के प्रयासों को सच्चाई के साथ रेखांकित किया जा सके।  एक सवाल के साथ संवाद की ताक़त का अंदाजा आप लगा सकते हैं। उस सवाल को जीने का सफ़र जीवन में ख़ुशी और सफलता की अनगिनत कहानियों को साथ लेकर आता है। क्या आपके पास है, ऐसे किसी सपने को जीने और उसको साकार करने की कहानी तो साझा करिए एजुकेशन मिरर के साथ। 

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