आजकल हर तरफ सीबीएसई बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के ‘पेपर लीक’ की चर्चा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब छात्र-छात्राओं कोअभिभावकों के साथ छुट्टी का आनंद उठाना चाहिए, वे परीक्षा दोबारा देने को लेकर तनाव में क्यों हैं? अगर ‘पेपर लीक’ की खबरें पहले ही संज्ञान में आ गई थीं, तो अबतक का इंतज़ार क्यों किया गया।
31 मार्च को यह अफवाह उड़ी कि 12वीं का हिंदी विषय का पेपर भी लीक हो गया है, जबकि यह साल 2017 की पूरक परीक्षा का प्रश्न पत्र है।
‘पेपर लीक’ सीबीएसई बोर्ड का खण्डन
विश्वविद्यालयों में क्या हो रहा है?
इसके साथ ही देश के प्रतिष्ठित विद्यालयों को ‘ऑटोनामी या स्वायत्तता’ के नाम पर वित्तीय सहायता से वंचित करने और संस्थान के लिए वित्त और संसाधान खुद खोजने वाली परिस्थिति की भी चर्चा है।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर उच्च शिक्षा को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने से सरकार हाथ खींच रही है, तो उस पैसे का क्या किया जायेगा, जो इन संस्थानों को अबतक मिलता था। क्या उच्च शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा की भांति ही सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। या फिर अब संस्थान और छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के कर्जे और लोन के भरोसे ही छोड़ दिया जायेगा।

