धैर्य के साथ सतत प्रयास है जरूरी
ऊपर जिन सारी चीज़ें का जिक्र है, उनके होने के बाद भी एक चीज़ अगर न हो तो बाकी सारी चीज़ों व संसाधनों के होने के बावजूद काम करने में दिक्कत पेश आती है वह है धैर्य का अभाव। इसलिए भाषा की कक्षा में काम करने के लिए एक शिक्षक का धैर्य के साथ काम करना बेहद जरूरी है, क्योंकि हर बच्चे के सीखने की रफ्तार अलग-अलग होती है। हर बच्चे के सीखने का तरीका अलग होता है। हर भौगोलिक क्षेत्र व विद्यालय के हिसाब से छात्रों की जरूरतें अलग होती हैं। इसी के अनुसार एक शिक्षक को अपनी रणनीति का चुनाव करना होता है, पुरानी रणनीति में बदलाव करना होता है। इसीलिए धैर्य के साथ सतत प्रयास करने की जरूरत एक शिक्षक के सामने होती है।
इसके साथ ही स्थानीय परिवेश और अभिभावकों का बच्चों के प्रति नज़रिया क्या है और वे विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों में कितनी हिस्सेदारी रखते हैं, इसका भी असर एक बच्चे के भाषा सीखने, भाषा का इस्तेमाल करने के अवसर और पढ़ने की निरंतरता को बनाये रखने पर असर पड़ता है।
एक उदाहरण
एक सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे को बारहखड़ी व मात्राओं का ज्ञान था। वह सभी अक्षरों को पहचान लेता था। लेकिन शब्दों को शब्द की तरह डिकोडिंग में उसे काफी प्रयास करना पड़ रहा था। इसलिए पढ़ने की प्रक्रिया उसके लिए काफी नीरस और उबाऊ लग रही थी। जब भी किसी किताब को पढ़ने की बात होती, वह पानी और पेशाब का बहाना बनाकर कक्षा से बाहर जाने की कोशिश करता। कहानी की किताबों को पढ़ने में भी उसे बहुत ज्यादा आनंद नहीं आ रहा था। उसके लिए एक स्थान पर धैर्य के साथ बैठना और पढ़ने का अभ्यास करना कठिन बात लग रही थी।
एक-दूसरे को सिखाने का प्रयास करते बच्चे।
शिक्षक ने बच्चे की परेशानी को समझते हुए, कहानी की किताबों के माध्यम से पढ़ने का अभ्यास करने का अवसर दिया। उसके साथ बैठे और शब्द को शब्द की तरह से पढ़ने और अनुमान लगाने वाले कौशल का इस्तेमाल करने पर जोर दिया। मात्राओं को पहचानकर शब्दों को पढ़ने का प्रयास करने हेतु प्रोत्साहित किया, क्योंकि बारहखड़ी से किसी मात्रा लगे हुए अक्षर को पढ़ना, फिर पूरे शब्द को पढ़ना बच्चे के लिए बेहद उबाने वाली और मुश्किल प्रक्रिया लग रही थी। इस तरह के कई दिनों के सपोर्ट के बाद, बच्चे को प्रवाह के साथ पढ़ने में मदद मिली। उस बच्चे को कक्षा के अन्य बच्चों के साथ एक ही किताब के किसी पाठ को पढ़ने का अवसर भी दिया गया ताकि व अन्य बच्चों से भी पढ़ने के कौशल की बारीकियां सीख और समझ सके। इस अभ्यास का धैर्य बच्चों में भी एक शिक्षक को विकसित करना पड़ता है ताकि वे पढ़ने का अभ्यास करते हुए, पढ़ने की आदत के विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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