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राजस्थान में 2 जुलाई से स्कूल की असेंबली के बाद बच्चों को मिलेगा दूध

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राजस्थान में 19 जून से लंबी छुट्टियों के बाद से स्कूल खुल गये थे। राजस्थान सरकार द्वारा दो जुलाई से पूरे राज्य के राजकीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और मदरसों में मिड डे मील योजना के अंतर्गत ‘अन्नपूर्णा दूध योजना’ को लागू किया जा रहा है।

इसके तहत पहली से पाँचवीं कक्षा तक के बच्चों को 150 एमएल दूध मिलेगा। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 5.25 रुपये और शहरी क्षेत्रों के लिए 6 रूपये का प्रावधान किया गया है। वहीं छठी से आठवीं तक के बच्चों को 200 एमएल दूध दिया जायेगा, जिसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 7 रुपये और शहरी क्षेत्रों वाले स्कूलों के लिए 8 रुपये के हिसाब से भुगतान किया जायेगा।

मौसम और माँग के अनुसार दूध के मूल्य बदलते रहते हैं, इसका भी ध्यान इस योजना में रखा जा रहा है। शहरी क्षेत्रों के लिए दूध का मूल्य 40 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 35 रुपये तय किया गया। इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बर्तन खरीद के लिए 2500 रुपये दिये जाएंगे, ताकि हर विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति के अनुसार दूध गरम करने के लिए स्टील के बर्तन, टंकी, जग और स्टील के गिलास इत्यादि की खरीद हो सके, इसकी जिम्मेदारी विद्यालय प्रबंधन समिति की होगी। यह समिति दूध की उपलब्धता भी सुनिश्चित करेगी।

अन्नपूर्णा दूध योजना का मक़सद क्या है?

इस योजना का प्रमुख लक्ष्य है कि सरकारी विद्यालयों में बच्चों का नामांकन बढ़े, उपस्थिति में वृद्धि हो, ड्रॉप ऑउट में कमी आए और इसके साथ ही बच्चों के पोषण का स्तर बेहतर हो। दूध के जरिये उनको प्रमुख पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दृष्टि से इस योजना को काफी अहम माना जा रहा है।

दूध की गुणवत्ता की जाँच भी होगी और शहरी क्षेत्रों में सरस डेयरी से दूध खरीदने के निर्देश दिये गये हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की दुग्ध समितियों से दूध खरीदने को तरजीह देने की बात कही गई है।

वहीं जिन क्षेत्रों में ग़ैर-सरकारी संस्था द्वारा मिड डे मील पहुंचाया जा रहा है, वहां दूध के वितरण की जिम्मेदारी भी संस्था की होगी। इसके लिए कुल और हेल्पर की मदद ली जायेगी, जिनको मिड डे मील बनाने के लिए एक नियमित राशि का भुगतान प्रतिमाह किया जाता है।

योजना के क्रियान्वयन की व्यावहारिक दिक्कतें क्या हैं?

सबसे पहली परेशानी बच्चों की उपस्थिति से पहले उस संख्या का पता लगाना है, जिसके लिए दूध की खरीद की जानी है। डेयरी से लेने वाली स्थिति में इसका समाधान किया जा सकता है, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में समस्या होगी। बच्चों की संख्या कम होने और दूध बचने की स्थिति में बचे हुए दूध का क्या होगा? क्या उसका दही जमाया जायेगा, या फिर अन्य तरीके से इस्तेमाल किया जायेगा, ऐसे कई नये सवाल योजना के क्रियान्वयन के बाद सामने होंगे।

शिक्षकों के सामने सुबह की असेंबली के बाद तीन दिनों तक नियमित अंतराल पर दूध वितरण की जिम्मेदारी होगी, इससे उनका ध्यान सुबह की तैयारी और बाकी व्यवस्थाओं से हटेगा। जो बच्चे दूध नहीं पीना चाहते, उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था होगी। जो छोटे बच्चे अपने बड़े भाई-बहन के साथ विद्यालय आ जाते हैं, क्या उनको भी दूध की खुराक मिलेगी, या फिर उनको आँगनबाड़ी भेजने जैसी बात होगी। इस योजना को लागू करने के दौरान कई दिशा-निर्देश भी जारी किये गये हैं जैसे दूध बाँटने से पहले सुनिश्चित करें कि दूध का तापमान कम हो, दूध को छानकर इस्तेमाल में ले, अगर दूध फटे तो दूसरी एजेंसी से तत्काल दूध खरीदा जाये।

सरकारी विद्यालयों में मिड डे मील के कारण पढ़ाई प्रभावित होने की बात पहले भी होती रही है, इस अतिरिक्त जिम्मेदारी के बाद की प्रतिक्रिया और परिस्थितियों को जानने के लिए हमें थोड़ा इंतज़ार करनना होगा। योजना के इरादे नेक हैं, पर क्रियान्वयन को सुगम बनाने के तौर-तरीकों पर विचार होना बहुत जरूरी है, ताकि पढ़ाई-लिखाई के माहौल को बनाये रखने पर जो फोकस राजस्थान में बना है, उससे शिक्षक समुदाय और अभिभावकों का ध्यान न बँटने पाए।

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