- जब हम उसे अपने पूर्व अनुभव (संदर्भ) से जोड़ते हैं। इस तरह के पढ़े गए पाठ या फिर किसी वास्तविक जीवन अनुभव से तो फिर हम अर्थ का निर्माण करते हैं।
- जब हम खुद किसी कहानी के किसी पात्र से खुद को जोड़ते हैं
- जब हम उस सामग्री को पढ़ते हैं और उसके ऊपर सोचते हैं, इसके साथ ही साथ अपने सवालों को रेखांकित करते हैं। उनपर सोचते हैं। लेखक की पृष्ठभूमि और वह किसके लिए लिख रहा है इस बारे में सोचते हैं
- जब हम पढ़ी हुई सामग्री पर रिफलेक्शन करते हैं
- किसी से पढ़ी हुई सामग्री पर बात करते हैं, जिसने वह सामग्री पहले से पढ़ रखी है तो फिर अर्थ का निर्माण होता है।
- अर्थों की कई परते होती हैं। कई बार जो बात कही जा रही है वही अर्थ होता है। कई बार बात जो कही जा रही है, वह कहीं और संकेत करती है तो अलग-अलग तरह की सामग्री जिसे हिन्दी में अविधा, लक्षणा और व्यंजना कहते हैं उससे रूबरू होते हैं तो हम अपने शब्दों का अर्थ खोज पाते हैं। अपने भावों को व्यक्त करने के लिए सटीक वाक्यांश व पैराग्राफ का सृजन कर पाते हैं
- अर्थ निर्माण की प्रक्रिया स्व के अनुभव व रिफलेक्शन पर काफी हद तक निर्भर करती है कि हम किसी सामग्री में कितनी गहराई तक उतरकर उसे समझने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही साथ उसे अपने जीवन के अनुभवों से कैसे जोड़ पा रहे हैं।

