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बच्चों की दुनियाः शहरों से अपने घरों की तरफ पैदल लौटते मजदूरों को देखकर उठते सवाल क्या हैं?

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हमारे देश में लॉकडाउन के बढ़ने के बाद हज़ारों की तादाद में मज़दूर अपने बस दो पैरों के ही सहारे, मीलों दूर चलकर अपने घरों की ओर निकल पड़े हैं। हाँ, सच है ऐसा ही हो रहा है। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन घोषित होने के बाद लगभग सब काम ठप्प हो चुका है।

चंद महीनो के बच्चों से लेकर, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष सभी अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं। कोई और चारा भी कहाँ है इन लोगों के पास। न रोज़गार है, न अपना घर और न ही इतना पैसा, कि शहर में जरूरत की चीजें खरीदकर कुछ दिन या महीना भर खा-पी सकें और कमरे का किराया-भाड़ा दे सकें।

ये वही लोग हैं जिन्हें न सरकार की नीतियों का कोई फ़ायदा मिल पाता है और ना ही कोई विशेष नीतियाँ सिर्फ़ इन्हीं की मदद के लिए बनाई जाती हैं। हम सभी लोगों की ज़िंदगियों को अपने श्रम से बेहद आसान बनाने वाले ये मजदूर, आज ख़ुद बेबस, यूँ दर-दर भटक रहे हैं। दिल दहलाने वाली बात तो ये है कि बाकी लोग इनका दर्द समझने के बजाए, इन्हें ही घरों की तरफ लौटने के कारण कोस रहे हैं। उनकी परेशानियों को समझने के बजाए, उन्हें प्रताड़ित और शर्मिंदा किया जा रहा है।

‘क्या बच्चों की ज़िंदगी की कोई अहमियत नहीं है’

इस पूरी परिस्थिति में ऐसा लगता है कि सरकार अभी भी मौन है। कुछ नहीं बोलेंगे। यही नारा हो गया है आज के इस समय में। चाहे कुछ बहुत गलत ही क्यों न हो रहा हो, पर ना जी हम कुछ नहीं बोलेंगे। 16 लोग ट्रेन से दबकर मर जाते हैं, सरकार तब मौन, छोटे-छोटे बच्चे मीलों चलते हुए दम तोड़ देते हैं, सरकार तब भी मौन ही है। आख़िर सरकार सिर्फ़ क्रिकेटरों का प्रोत्साहन करने और मैच का स्कोर पूछने के लिए ही अपना मुँह खोलती है क्या? क्या जवानों का सरहद पर दम तोड़ना ही शहादत मानी जाती है?

क्या शहरों से घर की तरफ लौटते इन मजदूरों का कोई वजूद नहीं, जो चलते हुए ही अपनी ज़िंदगी की आख़िरी साँसें ले रहे हैं? क्या उन बच्चों की ज़िंदगियों की कोई अहमियत नहीं, जिन्हें अभी अपने घर पर रहकर खेलना चाहिए था, लेकिन टूटी हुई चप्पलों और तपती गर्मी में मिलों पैदल चल रहे हैं?

ज़्यादा हो गए ना मेरे सवाल। आजकल तो सवाल पूछना भी गुनाह हो गया है। जिसकी जबान से तर्कसंगत सवाल निकले, उसका खतरे में होना पक्का है। विरोध करना तो पुराने ज़माने की बात लगती है। आजकल कौन हिम्मत करना चाहेगा ऐसा विरोध करने की, जिसमें उनका चरित्र दाव पर लगा हो? अगर हिम्मत कर विरोध करना भी चाहा तो सफ़ूरा ज़रगार जैसा ही हस्र होगा उस इंसान का। कौन अपनी इज़्ज़त से खिलवाड़ करना चाहेगा भला? इससे अच्छा है न कुछ पढ़ो और न ही कोई टेंशन लो।

अभी ज़्यादातर लोग यही सोच रहे होंगे। उनका सोचना भी सही ही है। इस महामारी से ख़ुद को बचाना तो मुश्किल हो रखा है, औरों के हक़ के लिए क्या ख़ाक लड़ना चाहेगा कोई।

निराशा का अंधेरा छंटेगा और उम्मीद की रौशनी होगी

लेकिन कोई तो होगा जो दूसरों के बारे में भी सोचता होगा, जिसके अंदर बाकियों के लिए भी संवेदनाएं होंगी और थोड़ा सहज व निर्मल होगा। निश्चित ही होगा, होगा ही नहीं होंगे।

मुम्बई में अभिनेता सोनू सूद की तरफ से प्रवासी मजदूरों को निलने वाली मदद को रेखांकित करने के लिए सतीश आचार्य ने यह कार्टून बनाया है। इसे ट्विटर पर 34 हजार लोग पसंद कर चुके हैं।

हज़ारों असंवेदनशील लोगों की भीड़ में भी कई लोग ऐसे भी होंगे जो अपने साथियों के हक़ के लिए आवाज़ उठा रहे होंगे। उम्मीद है कि ये आवाज़ और बुलंद हो और सरकार को कुछ वाजिब और ज़रूरी फैसले लेने पर मजबूर कर दे।

जब भी निराशा ने अपनी कालिम फैलाई है, आशा की किरण ने रोशनी दिखाई है। उम्मीद है जल्द ही हम इस संकट से कुछ सीखकर उभरेंगे।

(रिया चंद नानकमत्ता पब्लिक स्कूल में 10वीं कक्षा में अध्ययनरत हैं। वह अपनी स्कूल की दीवार पत्रिका के सम्पादक मंडल से भी जुड़ी हैं)

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