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शिक्षक इंटरव्यु सिरीज़ः ‘बच्चों को एक ऐसा इंसान बनता देखना चाहता हूं जो अच्छे नागरिक हों’

भारत के शिक्षक, मैं भी शिक्षक हूँ, मेरी कहानी

यह तस्वीर दिल्ली के एक स्कूल में 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली रोहिणी ने बनाई है। जिनका सपना भविष्य में शिक्षक बनने का है।

एजुकेशन मिरर की ‘शिक्षक इंटरव्यु सिरीज़’ का सिलसिला जारी है। इसका उद्देश्य शिक्षकों के संघर्ष, जिजीविषा, नेतृत्व, जूझने और सीखने की ऐसी कहानियों को सामने लाना है जो सच में प्रेरित करने वाली हैं। ऐसी कहानियां जो शिक्षण के पेशे के प्रति नई उम्मीद जगाती हैं। अपने-अपने क्षेत्र में कुछ नया करने और अपने परिवेश के अनुसार समस्याओं का समाधान खोजते शिक्षकों की कहानियों तक पहुंचने का पुल है एजुकेशन मिरर। आज के दूसरे इंटरव्यु की सबसे ख़ास बात है कि इसे दसवीं कक्षा की छात्रा रिया चंद ने किया है। रिया उत्तराखंड के नानकमत्ता पब्लिक स्कूल में पढ़ती हैं।

रियाः अपना परिचय दीजिए। आपका बचपन कहाँ बीता और उन दिनों को आप कैसे याद करते हैं? आज के बच्चों के बचपन और अपने बचपन के दिनों में आप क्या बड़ा अंतर महसूस करते हैं?

जवाब – मेरा नाम डॉ. कमलेश अटवाल है। जैसा कि आप जानती हैं, अपनी स्कूली शिक्षा उत्तराखंड के एक राजकीय इंटर कॉलेज से पूरी करने के बाद मैंने बरेली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। ग्रेजुएशन के बाद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से मैंने MA, Mphil और PhD की। वर्तमान समय में मैं नानकमत्ता पब्लिक स्कूल से बतौर एक शिक्षक व अकैडमिक को-ऑर्डिनेटर जुड़ा हूं। मैं सामाजिक विज्ञान का अध्यापक हूं और मेरी रुचि अपनी सीखी हुई चीज़ें दूसरों तक पहुंचाना है। बचपन की बात करूं तो, मेरा बचपन उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में ही बीता।

सच कहूं तो मेरी बचपन की यादें काफ़ी धुंधली हैं। ज़्यादा समय खेलने में बिताया करता था। आज के बच्चों के बचपन और मेरे बचपन में एक बड़ा अंतर है कि उस समय हमारे पास ज़्यादा आज़ादी थी। न कोई स्मार्टफ़ोन थे, खेलने में ही दिन बिताते थे। लेकिन आजकल के बच्चों की ज़िन्दगियां बंधी हुई हैं। पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए ज़्यादा ही सैंसिटिव हो गए हैं। कई बार तो ऐसा भी हुआ है, पास के फ़ील्ड में जगह न होने की वजह से हम सभी दोस्त, तुम्हारे गांव के प्राथमिक स्कूल में खेलने आया करते थे। लेकिन आजकल बच्चे खेलने में कम रुचि लेते हैं।

रियाः आपके बचपन के दिनों में पाठ्य पुस्तकों के अलावा किस तरह की सामग्री आपको पढ़ने के लिए मिलती थी? इसके सामने आज की जनरेशन के बच्चों को किस तरह के अवसर मिल रहे हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- तुम और मैं ऐसे परिवेश से हैं जहाँ लोगों में पढ़ने की संस्कृति बहुत कम है। टीचर बैकग्राउंड से होने के बाद भी मेरे घर में सिर्फ़ एक धार्मिक किताब ही हुआ करती थी। लेकिन मुझे पढ़ने का बहुत शौक था। उन दिनों जिसने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया, वो थी कॉमिक्स। अक्सर मैं सभी घरवालों से छुपकर कॉमिक्स पढ़ा करता था। शायद यही एक बड़ी वजह है, जिसके कारण मैं कहानी सुना और बना पाता हूँ।

आजकल की जनरेशन वास्तव में हमसे कई आगे है। काफ़ी बच्चों के पास ख़ुद की लाइब्रेरी भी होती है। जिनके पास नहीं भी है उन्हें स्कूल से किताबें मिल ही जाती हैं। हमारा, स्कूल में बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करने का यही कारण है कि हम उनमें पढ़ने की संस्कृति ला सकें। अगर सभी ऐसे ही पढ़ते रहेंगे तो उन्हें पता ही नहीं चलेगा, कब उनके व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव आ जाए।

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रियाः अक्सर कहा जाता है कि हमारा प्रिय विषय वही होता है, जिसे हमारे प्रिय शिक्षक या फेवरेट टीचर पढ़ा रहे होते हैं। इस विचार को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे? क्या आपने भी यह अपने छात्र या शिक्षक जीवन में अनुभव किया है?

डॉ. कमलेश अटवाल- तुम्हारी इस बात को दूसरी तरह से भी कहा जा सकता है। अगर कोई शिक्षक किसी विषय को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से पढ़ा रहे हैं तब भी वह शिक्षक हमारे फेवरेट बन जाते हैं। अगर मैं अपने छात्र जीवन की बात करूं, तो तब मुझे कोई ऐसे शिक्षक मिले ही नहीं जिनकी वजह से कोई विषय मेरा फेवरेट बन गया हो। जितने प्रभावशाली ढंग से विज्ञान पढ़ाया जा सकता है, वैसे हम कभी पढ़ ही नहीं पाए या हमें पढ़ाया ही नहीं गया। इसी कारण मेरी साइंस और मैथ्स में रुचि ही नहीं रही। मेरा झुकाव कहानियों की ओर बढ़ने लगा। कहानी पढ़ना और सुनाना बहुत पसंद था मुझे। शिक्षक जीवन में तो मैं ये सब देख ही रहा हूं। बच्चे उस क्लास में ज़्यादा इंटरेस्टेड होते हैं, जहां टीचर नए तरीकों और प्रभावशाली ढंग से पढ़ाते हैं।

क्षेत्र की खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था मुझे खींच लाई

रियाः आपके मन में शिक्षक बनने का विचार कब आया? क्या इस विचार के पीछे किसी शिक्षक की प्रेरणा थी या कोई और वजह आपको इस ओर खींच लाई?

डॉ. कमलेश अटवालः पहले से मेरा सपना एक शिक्षक बनने का तो नहीं था। मैं बचपन से ही जर्नलिस्ट (पत्रकार) बनना चाहता था। जेएनयू में जब इतने बेहतरीन प्रोफ़ेसर्स से मुलाकात हुई और उनसे बहुत कुछ सीखा, तो मन में आया कि मुझे प्रोफेसर बनना है। जब मैंने अपनी पढ़ाई की तो लगा मेरे पास सभी से शेयर करने के लिए बहुत कुछ है। जो मैंने सीखा है, जाना है वो मुझे यहाँ के लोगों और बच्चों को भी सिखाना है। बस यहीं से नानकमत्ता पब्लिक स्कूल का आइडिया आया। सबने मिलकर ये शुरूआत की और इसी कारण मैं भी टीचिंग प्रोफेशन से जुड़ गया। किसी टीचर की प्रेरणा तो नहीं रही, लेकिन हमारे क्षेत्र की खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था मुझे इस ओर खींच लाई।

रियाः क्या-क्या सपने और विचार आपके मन में आते थे कि मैं शिक्षक बनकर क्या-क्या करूंगा?

डॉ. कमलेश अटवाल- उन दिनों मन में बहुत से सपने थे। सोचता था की कहानी सुनाते-सुनाते पढ़ाऊंगा, जो खुद सीखा है अपने बच्चों को भी सिखाऊंगा और उन्हें सिर्फ़ कोर्स की शिक्षा मात्र न देकर, एक व्यापक पृष्ठभूमि उनके सामने रखूंगा। छात्र-छात्राओं का शिक्षक न बनकर उनके साथी की तरह उनके साथ सीखूंगा और सिखाऊंगा।

रियाः बतौर एक शिक्षक आपके क्या सपने हैं? आप अपने बाकी साथियों से क्या अलग करना चाहते हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- सपने ये हैं कि हमारे छात्र-छात्राएं 21वीं शताब्दी की दुनिया के अनुसार खुद को तैयार कर सकें, एक ऐसे नागरिक बनें जो तर्कसंगत हों, समाज को राह दिखाएं और जो भी करियर वह अपने लिए चुनें उसमें ईमानदारी से काम करें। बस यही हैं, ऐसे कोई खास सपने नहीं हैं। मैं अपने शिक्षक साथियों से कुछ अलग नहीं करना चाहता, बल्कि यह चाहता हूं कि उनके साथ मिलकर एक ऐसा स्पेस बना पाऊं, जहां बच्चे अपनी पसंद का काम कर सकें। मुझे किसी से अलग नहीं, बल्कि सबके साथ मिलकर ही काम करना है

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कमलेश अटवाल जी को फोटोग्राफी का भी काफी शौक है। यह तस्वीर उन्होंने क्लिक की है।

रियाः आपके अनुसार शिक्षा के क्या-क्या उद्देश्य हो सकते हैं? शिक्षा किसी बच्चे को जीवन के लिए कैसे तैयार करती है?

डॉ. कमलेश अटवाल- मेरे अनुसार शिक्षा का उद्देश्य भविष्य के नागरिकों को तैयार करना है जो तर्कशील हो, मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण हो, अपने आसपास के नागरिक समाज के प्रति विशेषकर हाशिए के समुदाय के प्रति, प्रकृति और पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदनशील होने के साथ-साथ 21वीं शताब्दी में जीवन उपार्जन करने के लिए ज़रूरी कौशल भी रखते हों। मुझे लगता है शिक्षा एक बृहद दृष्टिकोण और विश्लेषण करने की क्षमता देती है।

शिक्षा, जीवन में आने वाली अलग-अलग तरह की चुनौतियों और समस्याओं को सुलझाने में मददगार दृष्टिकोण विकसित करने में मददगार साबित हो सकती है। एक समावेशी शिक्षा प्रणाली, भविष्य के नागरिकों में कौशल के विकास करने के साथ-साथ उनमें सहनशीलता, जटिल परिस्थितियों में सामंजस्य बैठाने की मानसिक क्षमता, समाज के साथ-साथ स्वयं से संवाद करने की क्षमता को भी विकसित करती है। मुझे लगता है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य परिस्थितियों से सामंजस्य करते हुए व्यक्ति को खुश रहना और विपरीत परिस्थितियों में मूल्यों से समझौता न करना सिखाना भी है।

‘शिक्षक अपने छात्रों को सिखाता भी है और उनसे सीखता भी है’

रियाः आपके अनुसार एक शिक्षक होता कौन है? उसके क्या दायित्व होते हैं? क्या आप मानते हैं कि शिक्षक अपने छात्र छात्राओं के पथ प्रदर्शक होते हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- मेरे अनुसार एक शिक्षक वह शख़्स है, जो अपनी सीखी हुई बातें अपने छात्र-छात्राओं से साझा करे और उन्हें सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सपोर्ट दे। सबसे ज़रूरी है कि शिक्षक अपने शिक्षार्थियों के सामने बहुत सारे विकल्प रखे। सीखने के भी और करियर में आगे बढ़ने के भी। शिक्षक के यही दायित्व हैं कि वो बच्चों को जितना हो सके उतना बेहतर सिखाए और उन्हें समझे। मुझे लगता है एक शिक्षक पथ प्रदर्शक नहीं हो सकता, बल्कि अपने छात्र-छात्राओं का सहकर्मी या साथी होता है। जीवन के सफ़र में अपने छात्र-छात्राओं को सिखाता भी है और उनके साथ सीखते हुए नए रास्ते एक्सप्लोर करता है।

रियाः आपको अपने छात्र-छात्राओं की कौन सी बातें या काम संतुष्ट, खुश व प्रेरित करते हैं और कौन से दुखी?

डॉ. कमलेश अटवाल- जब हमारे बच्चे स्कूल में या घर में ज़िम्मेदारी लेते हैं और निर्णय लेने में ख़ुद भागीदारी करते हैं तो ये देखकर बहुत खुशी होती है। छात्र-छात्राओं का रिफ़्लैक्शन और मूल्यांकन हमें सिखाने वाला होता है, तो हमें भी प्रेरित करता है। दुखी ये बात करती है कि बच्चों को सीखने के लिए इतना स्पेस देने के बावजूद भी बच्चे कभी-कभी इंगेज ही नहीं होना चाहते हैं।

रियाः बच्चों को क्लासरूम में इंगेज रखने के लिए आप क्या रणनीति अपनाते हैं? आप किस पैमाने पर यह मापते हैं कि बच्चे आपकी क्लास में इंट्रस्टेड हैं या नहीं?

डॉ. कमलेश अटवाल- हां, ये सबसे बड़ा चैलेंज है कि कैसे पूरी क्लास को एक टॉपिक पर इंगेज किया जाए। इसका तरीका यह है कि बात उनके संदर्भ से शुरू की जाए, कहानी के माध्यम से आगे बढ़े और वर्तमान में घट रही घटनाओं से अपनी बात को जोड़ा जाए। मेरा प्रयास रहता है कि दिन की शुरुआत सीधे पाठ्यक्रम से ना करके, अपने परिवेश, व्यक्तिगत अनुभवों या समसामयिक चीज़ों से की जाए। इससे बच्चे आसानी से जुड़ पाते हैं। जब आप एक टीचर के रूप में क्लास में होते हैं, तो बच्चों के हाव-भाव, उनका प्रश्न पूछना, आदि बता देते हैं कि उनकी भागीदारी क्लास में हो पा रही है या नहीं।

रियाः कहा जाता है कि बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं। उनकी इस जिज्ञासा को आप क्लासरूम में किस तरह अभिव्यक्ति होने और चर्चा में शामिल होने का अवसर देते हैं? आप कभी उस बच्चे से परेशान हुए हैं जो लगातार सवाल पूछता है या काफ़ी जिज्ञासु होता है?

डॉ. कमलेश अटवाल- हां, मैं मानता हूं कि बच्चे बहुत जिज्ञासु होते हैं। मेरी यही कोशिश रहती है कि सभी के बीच से काफ़ी सवाल निकल कर आएं और कभी भी सवाल करने वाले को हतोत्साहित न किया जाए। कई बार ऐसा भी हुआ है कि किसी बच्चे के सवाल का उत्तर देते-देते हम एक नए टॉपिक पर ही बात करने लग जाते और पाठ में आगे बढ़ते हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि प्रश्न पाठ्यक्रम का ही हिस्सा हो। प्रश्न पूछने की इस आदत से, सभी लोग काफ़ी कुछ नया भी सीख लेते हैं और एक नए हॉरिज़न या क्षेत्र को भी एक्सप्लोर कर लेते हैं। जहां तक मुझे याद है, ऐसा तो कभी नहीं हुआ की मैं किसी ऐसे बच्चे से परेशान हुआ जो काफ़ी सवाल पूछता है या जिज्ञासु होता है। मुझे भी बच्चों के सवालों के जवाब देना बहुत अच्छा लगता है। ज़रूरी नहीं है कि हमेशा मेरे पास जवाब हो, लेकिन कोशिश ज़रूर करता हूं कि बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा सवाल पूछें और मैं उनके जवाब दे सकूं।

रियाः बच्चों को लेकर कौन सी नई बातें आपको बतौर शिक्षक काम करते हुए पता चलीं, जो पहले से ध्यान में नहीं थीं? बच्चों को समझने के लिए आप किस तरह के विचारों का सहारा लेते हैं? (जैसे बच्चे कमज़ोर होते हैं, तेज़ होते हैं। सभी बच्चे एक जैसे नहीं होते इत्यादि?)

डॉ. कमलेश अटवाल- बतौर शिक्षक काम करते हुए एक बात मुझे पता चली कि बच्चे हमारे साथी या सहभागी हैं, ना कि लाभार्थी या हमसे कोई लाभ पाने वाले। शायद सबसे बड़ी समस्या बच्चे को बच्चा समझना है। मुझे लगता है हमें बच्चों की भावनाओं और बढ़ती ज़रूरतों को समझने की ज़्यादा ज़रूरत है। हमें समझने की ज़रूरत है कि सभी बच्चों की भावनाओं, बैकग्राउंड, सामाजिक पृष्ठभूमि, आदि को एक ही साथ डील भी करना है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें सपोर्ट भी करना है।

दूसरी बात यह सीखी कि वो बच्चे नहीं हैं, बल्कि आपके ही साथी हैं। जब हम यह बात समझ जाएंगे तो बहुत ही प्रभावशाली रिज़ल्ट देखने को मिलेंगे। जो बच्चे क्लास रूम में काफ़ी अच्छा करते हैं, उनका कहीं ना कहीं हमसे बाकी साथियों के मुकाबले अच्छा कनेक्शन बन गया है। इसी कारण वे स्कूल स्पेस को ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से यूज़ कर पाते हैं। हां, यह बात सच है कि सभी बच्चे एक जैसे नहीं होते। यहां तक कि एक मम्मी-पापा के बच्चे भी एक जैसे नहीं होते। मैं इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हूं कि बच्चों में विविधता होती है और होनी भी चाहिए।

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रियाः शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांत और व्यवहार में आपने कैसे सामंजस्य स्थापित किया? भावी शिक्षकों के लिए आप क्या सुझाव देंगे?

डॉ. कमलेश अटवाल-  शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांत और व्यवहार में सामंजस्य स्थापित करना काफ़ी जटिल व कठिन प्रक्रिया है। पिछले 7 साल से लगातार अध्यापन करने के बावजूद, मैं अब भी इसे सीख ही रहा हूं। बच्चों की मानसिक दशा, सामाजिक पृष्ठभूमि, भाषाई व सांस्कृतिक बाधाओं को समझ पाने के स्तर पर हम सभी शिक्षक साथी कोशिश कर रहे हैं। इस मनोविज्ञान को समझने में काफ़ी चैलेंज आ रहे हैं। लेकिन अगर स्पेस डेमोक्रेटिक या लोकतांत्रिक हो तो सबका समाधान निकाला जा सकता है। एक और बात ज़रूरी है कि सभी को सुना जाए; बच्चों को, शिक्षकों को और अभिभावकों को भी। अगर हम ये सब करने में सफल रहे, तो बच्चों का नज़रिया भी समझ सकते हैं।

‘परीक्षा और नंबर की कहानी’

रियाः स्कूलों में होने वाली परीक्षा को आप किस नज़र से देखते हैं? क्या स्कूलों में परीक्षा के तरीके में बदलाव होना चाहिए? न सिर्फ़ परीक्षा, क्या आप हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से संतुष्ट हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- कहीं सुना था कि परीक्षा एक आवश्यक बुराई है। स्कूल में परीक्षा के सिस्टम को इतने करीब से देखने के बाद समझ आया कि यह ऐसा ही प्रयास है जैसे जंगल के सभी जानवरों को कह दिया जाए कि पेड़ में चढ़ जाओ। परीक्षा व्यवस्था की जो भी परेशानियां हैं, उसका ये परिणाम हुआ है कि हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली परीक्षा के अगल-बगल घूम रही है। इसके कारण बच्चों में रचनात्मकता और नई चीज़ें करने की रुचि कम होती जा रही है। जब परीक्षा को ही सब कुछ मान लिया जाता है तो लर्निंग स्पेस सिर्फ़ परीक्षा तक सीमित हो जाता है। मुझे लगता है बच्चों के नैसर्गिक विकास, रचनात्मकता और प्रभावशाली शैक्षिक स्पेस बनाने में परीक्षा ही सबसे बड़ी बाधा है। मैं वर्तमान शिक्षा प्रणाली से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं। यह निश्चित ही अलोकतांत्रिक है और पूर्वाग्रहों से ग्रसित है। स्थानीय स्थिति के हिसाब से शिक्षा में परिवर्तन होना चाहिए और एक शिक्षक का अपना विज़न होना ज़रूरी है।

रियाः नंबरों के भूत का जो आतंक हर बच्चे और अभिभावक पर हावी है, एक शिक्षक के पढ़ाने के तरीके, योजना और काम को कैसे प्रभावित करता है? आपने व्यक्तिगत तौर पर इसे कैसे अनुभव किया है?

डॉ. कमलेश अटवाल- नंबरों का भूत तो इतना सवार है कि पेरेंट्स बच्चों की पूरी सीखने की प्रक्रिया को सिर्फ़ कागज में चढ़े नंबरों से ही आंकते हैं। वो यह कहते हैं कि सर बच्चे के इस सब्जेक्ट में पहली बार 10 मार्क्स आए थे, इस बार 9 क्यों आए? अभिभावक अपने साथ रह रहे बच्चे की विकास यात्रा के सबसे बड़े गवाह बनने के बावजूद भी, इस बात से अनभिज्ञ हो जाते हैं कि उस बच्चे की सीखने की प्रक्रिया कैसी चल रही है। सिर्फ़ दो-तीन घंटे की परीक्षा के पैमाने पर वह सब कुछ तय कर देते हैं, जो बहुत ही दुखदायी है। स्कूल जो नए प्रयोग करना चाहता है, सीखने-सिखाने के नए तरीके खोजना चाहता है उसमें यह सबसे बड़ी बाधा है।

गाइड्स का पढ़ाई पर क्या असर हो रहा है?

रियाःअभी तीसरी कक्षा से बच्चों के लिए गाइड्स आ रही हैं? इसको एक शिक्षक के रूप में आप कैसे देखते हैं? क्या इनका असर क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई और बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ा है?

डॉ. कमलेश अटवाल- जब आप एक ही प्रश्न या फॉर्मेट पर पूरा सीखना-सिखाना केंद्रित कर देते हैं, तो सीखने की इतनी व्यापक प्रक्रिया बहुत ही संकुचित हो जाती है। निश्चित रूप से यह आगे जाकर उस तरह की विचारधारा को बढ़ावा देती है, जिसमें कहा जाता है कि एक ही तरह के उत्तर या समाधान सही हैं। हर बच्चे का उसकी सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि के अनुसार अलग-अलग समाधान या उत्तर हो सकता है। बच्चे ख़ुद करके सीखें और अपनी पृष्ठभूमि के हिसाब से चीज़ों को समझें और अलग-अलग उत्तर दें। अगर इसकी जगह हम प्रश्न के उत्तर गाइड बुक से देंगे, तो सीखने की प्रक्रिया पूरी तरह मैकेनाइज़्ड हो जाएगी और सीखने का कोई मतलब ही नहीं रहेगा। इस प्रवृत्ति का क्लासरूम की पढ़ाई और बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सभी एक ही तरह का काम करते हैं और यहीं से भेड़ चाल वाला सिस्टम शुरू हो जाता है। ना टीचर को और ना ही किसी बच्चे को कुछ नया सोचने की ज़रूरत पड़ती है। रचनात्मकता और नवाचार के लिए कोई जगह शेष नहीं रह जाती।

रियाः क्या क्लासरूम में होने वाले संवाद और चर्चा की जगह कोई पासबुक ले सकती है? इसको लेकर आप क्या सोचते हैं? लगातार संवाद और चर्चा किस प्रकार एक बच्चे के व्यक्तिव को प्रभावित करती हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- हम ये कहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य भविष्य के नागरिकों को तैयार करना और उन्हें परेशानियों से लड़ने के काबिल बनाना है। भविष्य में काफ़ी परेशानियां आएंगी, लेकिन उनका समाधान कोई पासबुक तो नहीं बता सकती। निरंतर बातचीत और संवाद पहला ऐसा कदम है जो हमें परिस्थिति के अनुकूल प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करता है। संवाद की जगह पासबुक या गाइड कभी नहीं ले सकती। लगातार संवाद और चर्चा से बच्चे बाकियों के सामने अपनी बात रखना सीखते हैं। जब सभी बच्चों के विचार आपस में मिलते है, तो वे बहुत कुछ नया सीख जाते हैं।

पढ़ाने की बेहतर रणनीति’

रियाः एक शिक्षक के रूप में आपकी क्लास में पढ़ाने की क्या प्राथमिकता रहती हैं? आप किस प्रकार अपने बच्चों को किताब से बाहर ले जाने की कोशिश करते हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- क्लास में मेरी यही कोशिश रहती है कि मैं न सिर्फ़  पाठ्यक्रम का पढ़ाऊं, बल्कि अपने बच्चों को नई चीज़ें भी बताऊं। मैं अपने छात्र-छात्राओं को समसामयिक मुद्दों के बारे में बताना व पढ़ाना ज़रूरी समझता हूं। इससे बच्चे सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि किताब में पढ़ी बातों को अपनी असल ज़िंदगी से जोड़ने में कामयाब होते हैं। मुझे लगता है बच्चों का इंट्रेस्ट पैदा करने के लिए, पाठ के बीच में एक शिक्षक को अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा करने चाहिए।

हमेशा सख़्त माहौल भी सीखने की प्रक्रिया में अड़चन डाल सकता है। माहौल हल्का करने के लिए बीच में थोड़ा हंसी मज़ाक होना भी ज़रूरी है। जेएनयू में हमें कोई भी टॉपिक पढ़ाने से पहले या तो आर्टिकल पढ़ाए जाते थे, या मूवी दिखाई जाती थी। इससे हमें टॉपिक समझने में बहुत आसानी होती थी। यही तरीका मैं अपनी क्लास में भी इस्तेमाल करता हूं। पाठ शुरू करने से पहले प्रतिष्ठित अख़बारों या जर्नल में छपे आर्टिकल बच्चों को पढ़ाता हूं, उसके बाद उसे पाठ से जोड़ने की कोशिश करता हूं। इस तरीके से छात्र-छात्राएं उस टॉपिक पर काफ़ी इंट्रेस्ट लेते हैं। किसी टॉपिक को अच्छे से समझने में फिल्में देखना भी काफ़ी मददगार साबित होता है। स्कूली दिनों में लगभग हर संडे को स्कूल में फिल्म दिखाई जाती थी। इस तरह से बच्चे मज़े-मज़े में बहुत कुछ सीख लेते हैं।

रियाः शिक्षा के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी को लेकर आपके क्या ज़मीनी अनुभव हैं? वर्तमान में इसकी वास्तविक पहुंच कितने बच्चों तक है? (सबसे अच्छे अनुभव ऑनलाइन क्लासेस के रहे होंगे। इस संदर्भ में भी कुछ बताइए।)

डॉ. कमलेश अटवाल- बहुत सारे लोगों ने कहा है आप आपदा को अवसर के रूप में लें और उसी हिसाब से लोग टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं। इस समय में ई-लर्निंग एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है और रेडियो या कम्युनिटी रेडियो की मदद से भी लोगों या छात्र-छात्राओं तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन हमें समझना होगा कि शिक्षा की असमानता का व्यक्तियों की आर्थिक असमानता से सीधा संबंध है। जहां तक हम टेक्नोलॉजी, स्मार्टफोन या डिजिटल डिवाइसेस की बात करते हैं, तो अपने आप यह भी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत से तय होता है। इसलिए वर्तमान में जब हम टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, तो बहुत बड़ी आबादी इससे दूर हो जाती है क्योंकि उनके पास ये संसाधन उपलब्ध हैं ही नहीं।

दूसरा, मेरा मानना है कि टेक्नोलॉजी एक साध्य है, वह साधन नहीं है। बच्चे सामूहिकता से सीखते हैं, स्कूल के उस वातावरण से सीखते हैं। मेरा यह स्पष्ट मानना है कि बच्चे स्कूल में टीचर के पढ़ाने से ज़्यादा, उस माहौल और अपने साथियों से सीखते हैं। लेकिन इससे बिल्कुल उलट टेक्नॉलॉजी आपको एकांतवास में ले जाती है।

ठीक है, बदलती दुनिया में टेक्नोलॉजी बहुत चीज़ें आसान कर रही है। हम दुनिया के बेहतरीन टीचर से वेबीनार, यूट्यूब, फेसबुक, आदि के माध्यम से जुड़े रहे हैं। हमारे छात्र-छात्राओं ने भी बहुत बेहतरीन काम किया है, इस लॉकडाउन के दौरान जश्न ए बचपन से जुड़कर जो वो आम दिनों में नहीं कर सकते थे। लेकिन इसके दुष्परिणाम भी देखे गए हैं। वो अपने दोस्तों से नहीं मिल पा रहे हैं और जो बातें वह सिर्फ़ अपने क्लासमेट्स से कर सकते थे वो नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन एक सामाजिक प्राणी होने के नाते इंसान तो अपनी बात शेयर करना चाहता है, इस कारण वे एक अलग तरह के तनाव में हैं। हमारे स्कूल में भी काफ़ी बच्चे हैं जिनकी टेक्नोलॉजी तक पहुंच नहीं है। इसी वजह से वह सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से काफ़ी दूर हो गए हैं। सामाजिक और आर्थिक दोनों तरीके से देखकर मुझे लगता है टेक्नोलॉजी शिक्षा की परेशानियों को नहीं सुलझा सकती है।

रियाः छोटा शहर होने के कारण नानकमत्ता में निश्चित ही कम लोग हैं, उन्हें नई चीज़ें सीखने का कम एक्सपोज़र मिल पाता है। क्या आपका कोई ऐसा प्लान है जिससे न सिर्फ़ आपके स्कूल के बच्चों को, बल्कि उन सभी बच्चों को भी कुछ नया सीखने के समान अवसर मिलें जिन्हें अच्छी शिक्षा न मिल पाई हो? (बच्चे ही तो आने वाला भविष्य हैं ना, अगर उन्हें अवसर मिल गए तो हम आसानी से एक उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।)

डॉ. कमलेश अटवाल- रिया बहुत खूब। मैं आपसे सहमत हूं, एक्सपोज़र सीखने-सिखाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हम पिछले कुछ समय से इस महत्वपूर्ण कारक पर काम कर रहे हैं। जिसके तहत हम कोशिश करते हैं कि अलग-अलग तरह के लोगों से हमारे छात्र छात्राएं मिल सकें। इस क्रम में पालमपुर से Mathplay के भारत श्रेष्ठ, विज्ञान खोजशाला के आशुतोष उपाध्याय जी, दिल्ली से स्टोरी टेलिंग पर काम करने वाली ओमजा यादव के सहयोग से कुछ एक प्रयास करें हैं। इस साल हमारे विद्यालय का “टीच फॉर इंडिया” समुदाय से एक जुड़ाव हुआ है। उम्मीद है एक्सपोज़र के मामले में यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत होगी। इस साल हमारा प्रयास था कि अलग-अलग विषय विशेषज्ञों या कला, साहित्य के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को विद्यालय में बुलाएंगे और सब ने अपने वादे भी किए थे, लेकिन वर्तमान संकट के कारण यह सफ़ल ना हो पाया।

उम्मीद है भविष्य में हम इस तरह का इकोसिस्टम बना पाएंगे जिसमें विशेषज्ञ अलग-अलग विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक हमारे लर्निंग इकोसिस्टम का हिस्सा बन सकें। इस तरफ़ हम एक योजना के तहत काम कर रहे हैं। नानकमत्ता पब्लिक स्कूल भविष्य में एक प्रोग्राम प्रारंभ करने की कोशिश कर रहा है, जिसके तहत हमारे फेलो (fellow) जिनको यहां सिखाया जाएगा वह नज़दीक के सरकारी स्कूलों में भी पढ़ाने जाएंगे। दूसरा प्लान हमारा यह है कि एक मोबाइल लाइब्रेरी हो, जिसे हर रविवार हमारे स्कूल के कुछ बच्चे उनके अपने गांव में और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे। इस तरह न सिर्फ़ हमारे स्कूल के बच्चों को, बल्कि बाकी सभी बच्चों को भी सीखने के समान अवसर मिलेंगे।

रियाः भाषा शिक्षण को लेकर क्या चुनौतियां शिक्षक साथियों के सामने हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- इस वैश्वीकरण के समय में हम जिस क्षेत्र और समाज में रह रहे हैं, यह बात व्यापकता से फैला दी गई है कि अगर आप अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा ले रहे हैं तो वह ज़्यादा प्रभावशाली है। इस क्षेत्र में लोगों की भाषा या तो हिंदी है या फ़िर उनकी अपनी भाषा, अंग्रेजी उनकी तीसरी भाषा है। किसी बच्चे की मातृ जबान कुमाऊँनी है, पंजाबी है, बंगाली है, या फ़िर थरुवाटी है। इसी कारण स्कूल में भाषा व्यवस्था कृत्रिम सी होती है और बच्चों को सीखने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए हमने स्कूल में प्रयास किया है कि हिंदी, जो कि सारे समुदाय आसानी से समझते हैं, का इस्तेमाल स्कूल में किया जाए। हिंदी से हम फ़िर धीरे-धीरे तीसरी भाषा अंग्रेजी की ओर बढ़ रहे हैं।

रियाः परिवेश के आधार पर कौन सी ऐसी चीज़ें हैं जो आपको अपने शिक्षण के दौरान बड़ी चुनौतियां लगती हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- हमारे स्कूल में ज़्यादातर ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। उनमें से जो जनजातीय समुदाय के बच्चे हैं वह नैसर्गिक रूप से स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं और उन्हें क्लासरूम और स्कूल के ढांचे में ढ़ाल पाना सबसे बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे एक अलग तरह की स्वतंत्रता में रहते हैं, लेकिन स्कूल में आप चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी वैसी स्वतंत्रता उन्हें नहीं दे सकते। तो यह बड़ा मुश्किल होता है कि ग्रामीण परिवेश के हिसाब से हम किस तरह स्कूल में ऐसा ढांचा बना सकें, जिससे बच्चों को घर और स्कूल दो परिवेशों में द्वंद ना दिखाई दे।

दीवार पत्रिका से किताबों के प्रति बढ़ रहा है लगाव

रियाः आजकल बच्चे वास्तविक से ज़्यादा वर्चुअल दुनिया में रहना पसंद करते हैं। इस कारण वे किताबों से दूर होते ही जा रहे हैं। तो आप बच्चों में पढ़ने की आदत और किताबों से लगाव विकसित करने के लिए अपने विद्यालय स्तर पर क्या प्रयास कर रहे हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- इसका एक प्रयास दीवार पत्रिका और स्कूल का अख़बार “The Explorer” है। शायद इस क्षेत्र का पहला हमारा ऐसा स्कूल है जिसका मासिक अख़बार निकलता है, लेकिन कोविड-19 कारण इस पर असर पड़ा है। जब बच्चे अपनी या अपने साथियों की रचनाएं दीवार पत्रिका या अख़बार में छपते हुए देखते हैं, तो उनमें लिखने की एक चाहत बढ़ती है। अच्छा लिखने के लिए उन्हें अच्छा पढ़ना भी होता है। इसके लिए हमने ओपन लाइब्रेरी का प्रयास किया है जिसमें हमारे ही छात्र-छात्राएं अपने साथियों को लाइब्रेरी से बुक्स देते हैं।

fb_img_15890797167922531931530687215802.jpgकभी तो ऐसा भी हुआ है कि हमने एक दिन में 100 से ज्यादा बच्चों को बुक्स पढ़ने के लिए दी हों। नेशनल बुक ट्रस्ट या एकलव्य प्रकाशन की किताबें बच्चे पढ़ते हैं और उनमें पढ़ने की संस्कृति बढ़ रही है। पढ़ने की संस्कृति बढ़ाने के लिए हम समाचार पर भी बहुत फोकस करते हैं। हम न सिर्फ़ हिंदी और अंग्रेजी न्यूज़ हैडलाइन बच्चों के साथ शेयर करते हैं, बल्कि रोज़ मॉर्निंग असेंबली में इंट्रोड्यूस कराते हैं, बच्चों से लिखाते हैं और उन्हें टास्क देते हैं कि घर से आप अलग-अलग विषयों की न्यूज़ छांटकर लाइए। इस तरह बच्चे अख़बार पढ़ने पर मजबूर होते हैं।

रियाः बतौर शिक्षक आपकी पसंदीदा किताबें कौन-कौन सी हैं? आप इन दिनों पढ़ने के लिए कितना समय निकाल पाते हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- मेरी पृष्ठभूमि के मुताबिक मेरी रुचि उन किताबों में ज़्यादा है जो राजनीतिक और विश्व इतिहास से संबंधित होती हैं। पिछले कुछ समय में शिक्षा के क्षेत्र में लिखी गई किताबों के प्रति भी रुझान बढ़ रहा है। अरुंधति रॉय की God of Small Things, धर्मवीर भारती कि लिखी ‘गुनाहों का देवता’, कमलेश्वर की लिखी किताब ‘कितने पाकिस्तान’ और जॉर्ज ऑरवेल की ‘1984’ ऐसी किताबें हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं। इसके अलावा मुझे राजनीति शास्त्र में रजनी कोठारी और रामचंद्र गुहा का काम बहुत पसंद आता है। अभी जो मैंने किताब पढ़ी, जिसने मुझे बहुत सोचने समझने पर मजबूर किया, वो है साहित्यकार और शिक्षक महेश पुनेठा जी की किताब “शिक्षा के सवाल”। लेकिन आजकल बच्चों के साथ ही इतना व्यस्त रहता हूं कि ख़ुद पढ़ने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।

रियाः एक शिक्षक के रूप में खुद को अपडेट रखने के लिए आप किन-किन माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं? (जैसे वेबसाइट्स, पत्रिका इत्यादि, नाम शेयर करें।)

डॉ. कमलेश अटवाल- क्योंकि मैं एक सामाजिक विज्ञान का शिक्षक हूं, तो मुझे अलग-अलग मुद्दों पर अपनी समझ और पृष्ठभूमि बनाने के लिए इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, द वायर, आदि वेबसाइट्स की मदद लेनी पड़ती है। उसके अलावा शैक्षिक पत्रिकाएं जैसे कुछ समय से शैक्षिक दखल, वेब पोर्टल Education Mirror, एकलव्य के प्रकाशन आदि पढ़ना पसंद करता हूं।

रियाः शिक्षक समुदाय को लेकर आपके स्थानीय परिवेश में किस तरह की टिप्पणियां आपको सुनने के लिए मिलती हैं? कौन सी ऐसी बातें हैं जो आपको एक शिक्षक के रूप में प्रोत्साहित करती हैं?

डॉ. कमलेश अटवाल- हर पेशे के बारे में समाज का अपना दृष्टिकोण है और वो निश्चित रूप से रहता ही है। यह भी सच है कि हमारे यहां शिक्षक के पेशे में सम्मान तो बहुत है, लेकिन सिर्फ़ सम्मान ही है। मुझे लगता है इस पेशे में एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए आर्थिक ज़रूरतें या सपोर्ट सिस्टम सबसे कम या अंडरपेड है। जब हमसे बड़े या दुगनी उम्र के अभिभावक हमें आकर बताते हैं कि किस तरह स्कूल की भागीदारी उनके बच्चों में सकारात्मक परिवर्तन ला पा रही है, तो यह बात सबसे ज़्यादा प्रोत्साहित करती है। कभी-कभी इस तरह की कहानियां आंखें नम भी कर देती हैं।

रियाः आप अपने बच्चों को कैसा इंसान बनता देखना चाहते हैं? क्या आप उनके डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस आदि बनने से संतुष्ट हो जाएंगे? आपकी नज़र में एक कामयाब इंसान कौन है?

डॉ. कमलेश अटवाल- मेरा ऐसा कोई सपना नहीं है कि मेरे बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या आईईएस बनें। मैं बस अपने बच्चों को एक ऐसा इंसान बनता देखना चाहता हूं जो अच्छे नागरिक हों, नागरिक मूल्यों को समझें, अपने वातावरण या प्रकृति के प्रति सहज हों और अपने आसपास के हर समुदाय के लिए संवेदनशील हों।

kamlesh-nमैं बस यही देखना चाहूंगा कि वे जहां कहीं भी रहें, जैसी भी परिस्थितियां हों उनमें खुश रहें और विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सीखें और समाज,परिवार और समुदाय को लेकर उनमें एक बृहद दृष्टिकोण विकसित हो। मुझे लगता है कामयाब इंसान वो नहीं जो खूब पैसे कमाए या जिसका कोई रुतबा हो। एक कामयाब इंसान तो वो है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीना और खुश रहना सीखे, सभी का सम्मान करे, ईमानदार और दृढ़ निश्चयी हो और जो अपने स्वभाव से लोगों का दिल जीत ले।

(रिया चंद नानकमत्ता पब्लिक स्कूल में 10वीं कक्षा में अध्ययनरत हैं। वह अपनी स्कूल की दीवार पत्रिका के सम्पादक मंडल से जुड़ी हैं। अपने विद्यालय के अन्य विद्यार्थियों के साथ मिलकर एक मासिक अखबार भी निकालती हैं। शिक्षक इंटरव्यु सिरीज़ के लिए यह उनका पहला इंटरव्यु है।)

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4 Comments on शिक्षक इंटरव्यु सिरीज़ः ‘बच्चों को एक ऐसा इंसान बनता देखना चाहता हूं जो अच्छे नागरिक हों’

  1. Savita Prathmesh // July 8, 2020 at 1:19 pm //

    ” शिक्षा एक बृहद दृष्टिकोण और विश्लेषण करने की क्षमता देती है.” डा.कमलेश अटवाल के अनुसार शिक्षा का यह अर्थ सचमुच अर्थ दे गया संपूर्ण साक्षात्कार को.
    निश्चित ही शिक्षा का यही अर्थ नीतिनिर्माताओं,शिक्षकों और माता-पिता,अभिभावकों को ग्रहण करना चाहिए.
    तभी समाज का आगे की सोचेगा और बढ़ेगा.
    नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के संचालक डा.कमलेश अटवाल से रिया की बातचीत ने शिक्षा,शिक्षक और शाला से संबंधित बहुत से पहलूओं को उजागर किया और मुझे यक़ीन है कि चूंकि डा.अटवाल के कुशल हाथों में शाला संचालन की बागडोर है तो शाला को उसका लाभ भी मिल रहा होगा.इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रिया का आत्मविश्वास है जिसने
    सभी प्रश्नों को न सिर्फ अच्छे से पूछा ही बल्कि प्रतिप्रश्न भी किए.
    संपूर्ण साक्षात्कार में बहुत सी बातें हैं जिन पर शिक्षक और शालाएं अगर ध्यान दें तो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था जिस पर डा.कमलेश अटवाल का असंतोष था काफी हद तक संतोषजनक स्थिति में पहुंच सकती है.
    एजुकेशन मिरर पर शिक्षकों से साक्षात्कार का यह सिलसिला निश्चित ही सराहनीय प्रयास है.देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षकों का प्रतिनिधित्व हो रहा है अच्छा लग रहा है.
    आपसे अनुरोध है नॉर्थ ईस्ट और दक्षिण के शिक्षकों को भी इस सीरिज़ में शामिल करें क्योंकि उनके विषय में जानकारी सीमित है.
    पुनश्च आपका आभार जो मेहनत कर नए-नए शिक्षक साथियों से मुलाकात करा रहे हैं.

  2. Bhaskar Choudhury // July 7, 2020 at 5:02 pm //

    रिया के प्रश्न चकित करते हैं। यहाँ जितने तर्कसंगत और महत्वपूर्ण प्रश्न हैंं उतनी ही सहजता और ईमानदारी से दिए गए उत्तर भी। कमलेश जी जेएनयू से निकलकर ज़रा सी कोशिश से किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बन सकते थे पर उन्होंने स्कूल को चुना जो सचमुच बहुत ही अच्छी और बेहद ज़रूरी बात है। जिस तरह स्वयं उन्हें और उनके जैसे असंख्य बच्चे हैं जिन्हें पढ़ाने या शिक्षा देनें वाले शिक्षकों के स्तर पर बहुत सारे सवाल खड़े किये जा सकते हैं तो इसकी बहुत बड़ी वजह अच्छे, समझदार और लगातार सीखने सिखाने को तैयार रहने वाले लोगों का स्कूली शिक्षक न बनना या इसकी बजाए “प्रोफेसरी”और अन्य कथित बड़े एवं “सिक्योर्ड” करियर की ओर मुड़ जाना है… आज ज़रूरत है अधिक से अधिक संख्या में कमलेश जी जैसे शिक्षक और जैसा कि उन्होंने कहा उतना ही ज़रूरी है कि शिक्षक अंडर पेड न हों… दिनों बाद इतने अच्छे संवाद को पढ़कर बहुत खुशी हुई। रिया को ढेर सारी शुभकामनाएँँ और आशीष। डॉ कमलेश जी को बधाई दिल से और साधुवाद।

  3. Dr. Khurshid hassan // July 7, 2020 at 2:10 pm //

    एक छात्रा द्वारा उठाये गये प्रश्न ..उद्देश्यपरक हैं , वर्तमान समय की आवश्यकताओं को उठाते हैं साथ ही उनका महत्व समझाते हैं …बहुत अच्छा लेख …! ! !

  4. Durga thakre // July 7, 2020 at 11:22 am //

    Intresting lekh
    बच्चों के बीच बच्चे बनकर सीखना बहुत खूब ।

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