भारतः ‘बच्चों की शिक्षा से पहले स्वास्थ्य की चिंता जरूरी, हड़बड़ी में न खुलें स्कूल’

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पूरी दुनिया में कोविड-19 का असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ा है। इस असर से शिक्षा का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। शुरुआत में कोई जवाब न मिलने वाले स्थिति में पहले से चल रहे ‘ऑनलाइन क्लास’ व टेक्नोलॉजी आधारित अन्य विकल्पों जैसे रेडियो, टेलीविजन, ह्वाट्सऐप, यू-ट्यूब, गूगल डॉक्स व ऑडियो व पीडिएफ बुक्स का इस्तेमाल किया गया। शिक्षकों के सामने भी तकनीक को अपनाने और इस्तेमाल करने को लेकर एक झिझक है, हालांकि बीते दो महीनों में तकनीक के साथ इस्तेमाल को लेकर शिक्षक समुदाय का बेहद अच्छा परिचय हुआ है और वे गूगल मीट, माइक्रोसॉफ्ट टीम, ज़ूम जैसी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को लेकर सहज हुए हैं।

तकनीक को लेकर भारत के प्रख्यात शिक्षाविद और एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार की हाल ही में एक वेबिनार के दौरान की गई टिप्पणी गौर करने लायक है। जिसमें वे कहते हैं, तकनीक किसी समस्या का समाधान नहीं है। तकनीक स्वयं कई विषमताओं या विरोधाभाषों से ग्रस्त है। किसी भी टेक्नोलॉजी या यंत्र के इस्तेमाल में विषमता सदैव बनी रहती है। ‘ऑनलाइन शिक्षा’ शब्द का अगर विशेषण के रूप में इस्तेमाल हो रहा तो ठीक है। लेकिन संज्ञा के रूप में हो रहा है तो फिर खतरनाक है।”

मौजूदा स्थिति को तथ्यों के सहारे समझें

भारत में मार्च 2020 से लेकर 5 जून 2020 तक अब कोरोना संक्रमण के कुल मामले 2 लाख 16 हज़ार से ज्यादा हो गये हैं। वहीं कोरोना संक्रमण से लगभग 6,348 से लोगों की मौतें हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार तीन हफ़्तों में कोरोना संक्रमण के मामले दोगुने हो रहे हैं।

भारत में अभी भी रोज़ाना नये मामले भी बढ़ रहे हैं पहले से संक्रमित बड़े शहरों में और अब कोविड-19 का संक्रमण छोटे कस्बों, गाँवों की तरफ भी पहुंच रहा है जो एक बड़ी चिंता का कारण बन रहा है। भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय आपस में मिलकर कोविड-19 के बाद वाले हालात में स्कूलों को फिर से खोलने के संदर्भ में विस्तृत गाइडलाइंस तैयार कर रहे हैं। इसके आने के बाद स्थिति ज्यादा स्पष्ट होगी।”

इन स्थितियों व माहौल में जब स्कूल फिर खुलेंगे, तो हमारे सामने ऐसे बहुत से सवाल होंगे, जिनके जवाब शिक्षा विभाग, सरकार और विभिन्न संस्थाओं व अभिभावकों को स्थानीय स्तर पर मिलकर खोजना होगा। इसमें स्कूल के घंटे, बच्चों के आने का अंतराल, स्कूल में साफ-सफाई व सावधानी को लेकर नये सिरे से तैयारी जैसी बातें बेहद अहम होंगे। इसके लिए डिजिटल कंटेंट के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर कोविड को लेकर क्या स्थिति है, इसकी बेहद विश्वसनीय जानकारी की जरूरत होगी ताकि किसी तरीके की अफवाह को फैलने से रोका जा सके। पुलिस व प्रशासन को भी इस प्रक्रिया में संवेदनशील और सहयोगी रवैया अपनाने की जरूरत होगी, इस पक्ष का भी ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

क्या हम स्कूल खोलने को लेकर पूरी तरह तैयार हैं?

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लेकिन अभिभावकों व बच्चों के स्तर पर तकनीक को लेकर काफी विषम परिस्थितियां हैं। इस कारण से बच्चों को काफी मानसिक तनाव वाली स्थिति सामना करना पड़ रहा है। यह सारी स्थितियां अभी भी जारी हैं, कोविड-19 के बढ़ते मामलों ने भारत में अभिभावकों, शिक्षाविदों के साथ-साथ बच्चों की भी चिंताएं बढ़ा दी हैं कि हमारी पढ़ाई कैसे होगी? लेकिन जो अभी सबसे बड़ा सवाल हमारे सामने है, वह यह है कि क्या हम स्कूलों को खोलने को लेकर पूरी तरह तैयार हैं?

हमारे सामने 6 सबसे बड़े सवाल क्या हैं?

क्या भारत के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों के लिए हाथ धोने के लिए साबुन व पानी की व्यवस्था, निःशुल्क मास्क और सैनेटाइज़र की उपलब्धता सुनिश्ति हो गई है। इसके साथ ही साथ स्कूलों को सैनेटाइज़ करने के लिए मैकेनिज्म विकसित कर लिया गया है? यह एक बड़ा सवाल है क्योंकि कोरोना संक्रमण के दौरान सरकारी स्कूल ‘क्वारंटाइन सेंटर’ के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। वहीं डब्लूएचओ तो पहले ही कह चुका है कि कीटनाशक के छिड़काव से कोरोना के वायरस नष्ट नहीं होते हैं।

दूसरा बड़ा सवाल है कि हम स्कूल में बच्चों की बैठक व्यवस्था को लेकर क्या करेंगे? ऐसे स्कूल जहाँ पर कमरों की संख्या कम है और एक से ज्यादा कक्षाएं एक साथ बैठती हैं, वहां के लिए क्या विकल्प अपनाया जाएगा।

तीसरा सवाल है कि ऐसे स्कूल जहाँ पर बच्चों का नामांकन ज्यादा है जो सिंगल टीचर स्कूल हैं, आँकड़ों के मुताबिक़ ऐसे स्कूलों की संख्या पूरे भारत में लगभग एक लाख है वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक अपने सामने आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे करेंगे?

चौथा बड़ा सवाल है कि बच्चों को स्कूल हाइजीन व साफ-सफाई के मुद्दे पर कैसे जागरूक करेंगे? पाँचवां सवाल है कि जब सबको पता है कि कोविड-19 वायरस का संक्रमण संक्रमित व्यक्ति के छींकने या खांसी के बाद निकलने वाले सूक्ष्म बूदों के कणों से फैल सकता है या इनको छूने के बाद हाथों के स्पर्श के माध्यम भी से फैल सकता है। तो फिर सोशल डिस्टेंसिंग (फिजिकल डिस्टेंसिंग) कम से कम एक या दो मीटर की दूरी जरूरी है का पालन कैसे करेंगे?

छठां सवाल है कि अगर स्कूल में कभी कोई बच्चा संक्रमित होता है तो उससे अन्य बच्चों को कैसे दूर करेंगे?

अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं?

ऐसे माहौल में क्या अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मानसिक तौर पर तैयार हैं? क्या हमारे शिक्षक बच्चों को स्कूल में लाने और ले-जाने की व्यवस्थाओं से संतुष्ट हैं? शिक्षक समुदाय और अभिभावकों की राय स्कूलों को खोलने से पहले जरूर ली जानी चाहिए।

इसके साथ ही साथ बच्चों के साथ भी एक व्यापक सर्वेक्षण करके उनकी राय, डर और सहमति-असहमति को जानने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों की राय भी मायने रखती है, यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और सरकार को स्वीकार करना चाहिए। कोविड-19 के बाद की दुनिया पहले जैसी नहीं है। यह बात हमें बड़े अक्षरों में लिखकर कहीं टाँग देनी चाहिए, या मन में हमेशा याद रखनी चाहिए।

शिक्षकों और अभिभावकों की चिंताएं क्या हैं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, “कोरोना वायरस से ख़ुद को सुरक्षित रखने का सबसे जरूरी उपाय साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना है। जैसे हम अपने हाथों को समय-समय पर साबुन और पानी से धोते रहें। या फिर अल्कोहॉल बेस्ड सैनेटाइज़र का इस्तेमाल करें, इससे आपके हाथ पर मौजूद वायरस समाप्त हो जाएगा। अपनी आंखों को छूने से बचें, नाक और मुंह पर भी हाथ लगाने से बचें। क्योंकि इससे वायरस के शरीर में प्रवेश की आशंका बढ़ जाती है। छींकते या खांस समय टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करें या अपने हाथ को आगे कर कोहनी की ओट में छीकें या खांसें। इसके साथ ही साथ सोशल डिस्टेंसिंग के तहत एक-दूसरे से कम से कम एक या दो मीटर की दूरी पर रहने की सलाह भी दी गई है।” इन सुझावों का पालन स्कूलों को खुलने पर हो सके, यह सुनिश्चित करना कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए बेहद अहम है।

अगर किसी गाँव या कस्बे में कोविड के मामले की पुष्टि होती है और उस परिवार से कोई बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है तो क्या सारे बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय किये जाएंगे? शिक्षकों को इस स्थिति में क्या करना चाहिए, इसको लेकर सरकार या शिक्षा विभाग की तरफ से स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलने चाहिए। अगर किसी शिक्षक को कोविड-19 का संक्रमण होता है तो उस स्थिति में क्या होगा, क्योंकि इस वायरस का संक्रमण किसी को भी हो सकता है, क्या स्कूल को फिर से 14 दिन के लिए बंद किया जायेगा। बच्चों को 14-15 दिन के लिए घर में रहने के लिए कहा जायेगा। ये सारे सवाल हमारे सामने आने ही वाले हैं।

स्कूल या समुदाय स्तर पर सतर्कता की जरूरत क्यों है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस से संक्रमण के बाद इसके लक्षण सामने आने में पांच दिनों का समय लगता है लेकिन कुछ लोगों में इसके लक्षण दिखने में इससे ज़्यादा वक़्त भी लग सकता है। ऐसी स्थिति में अगर किसी बच्चे, शिक्षक, अभिभावक या समुदाय के किसी अन्य व्यक्ति में संक्रमण के लक्षण दिखते हैं तो क्या होगा? हमें बच्चों को बीमार होने या सर्दी-जुकाम या बुखार वाली स्थिति में लंबी छुट्टी देनी की भी तैयारी करनी होगी। शिक्षकों के स्वास्थ्य के रूटीन चेक-अप और आपात-चेक अप की प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से योजना का हिस्सा बनाना होगा।

इन सवालों का कोई तो जवाब हमारे पास पहले से होना चाहिए। स्कूलों को सैनेटाइज करने के लिए क्या संसाधन मिलेंगे और उसके लिए क्या वित्तीय प्रबंध होंगे, इसकी तत्काल व्यवस्था करनी होगी क्योंकि स्वास्थ्य की इमरजेंसी वाली परिस्थिति के साथ डील करने में हमारे स्कूली तंत्र को तैयार होने के लिए समय चाहिए और संसाधन भी।

क्या है शिक्षकों की राय?

“प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे काफी छोटे हैं, इस महामारी में बचाव को तरीकों का पालन स्कूल में संभव नहीं है। स्कूल आने के बाद बच्चों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना और शिक्षकों के लिए ऐसा करवा पाना बहुत मुश्किल होगा।”

“हम स्कूल में कितनी भी सावधानी पर बचाव कर लें, लेकिन ज़मीनी स्थितियों को देखते हुए सफल होना मुश्किल है। अगर ऐसे में एक बार संक्रमण फैला तो बुरा हाल हो जायेगा।”

“शिक्षा से पहले स्वास्थ्य जरूर है, जबतक इस वायरसक के संक्रमण का बेहतर उपचार या बचाव नहीं खोज लेते। बच्चों को स्कूल बुलाना, उनकी जान जोखिम में डालना है। जुलाई तक तो प्राथमिक विद्यालय किसी भी स्थिति में नहीं खुलना चाहिए।”

निष्कर्ष पढ़िए और लिखिए अपनी टिप्पणी

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि वर्तमान स्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्कूल खोलने का फैसला हड़बड़ी वाला होगा। बेहतर है कि सरकार और शिक्षा विभाग की तरफ से शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों से बातचीत करके ज़मीनी स्थिति को समझने का प्रयास किया जाये। आपसी सहयोग और सूचनाओं के आदान-प्रदान से ही इस संकट कालीन स्थिति का सामना किया जा सकता है, यह बात अबतक के अनुभवों से पूरी तरह साफ है।

इसलि बेहतर होगा कि जबतक स्कूल नहीं खुलते हैं तबतक रेडियो, टेलीविज़न व अन्य माध्यमों से बच्चों तक पहुंचने का प्रयास किया जाये। इस दौरान शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य व खुशी को ध्यान में रखते हुए बाल फिल्मों व अन्य कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जाये। इसके साथ ही साथ सीबीटी और एनबीटी की तरफ से पीडिएफ किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। पाठ्यपुस्तकों को भी पीडिएफ में उपलब्ध कराया जा सकता है।

इस समय का इस्तेमाल बच्चों का पढ़ाई से इतर अन्य जीवन कौशलों के विकास व सीखने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। परीक्षाओं का अतिरिक्त तनाव और दबाव किसी बच्चे पर न बने, चाहें वो किसी भी स्तर पर पढ़ रहे हों इसका ध्यान राज्य सरकारों व केंद्र सरकार को भी रखना चाहिए ताकि अनावश्यक तनाव का सामना छात्रों को न करना पड़े।

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(लेखक परिचयः वृजेश सिंह पिछले 8-9 सालों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। आपके पास गाँधी फेलोशिप, बीबीसी हिन्दी, रूम टू रीड इंडिया, स्टर एजुकेशन और टाटा ट्रस्ट्स जैसी संस्थाओं में ज़मीनी स्तर पर काम करने का अनुभव है। वर्तमान में एजुकेशन मिरर पर शिक्षा के क्षेत्र में लगातार लेखन और चिंतन आपकी रोज़ाना की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा है।)
(शिक्षा से संबंधित लेख, विश्लेषण और समसामयिक चर्चा के लिए आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें। अपनी स्टोरी/लेख भेजें Whatsapp: 9076578600 पर, Email: educationmirrors@gmail.com पर।)

3 Comments

  1. असहमति हो या सहमति संवाद जरूरी है। जब 10-12% लोगों तक ही तकनीक की पहुंच है तो फिर इसे एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करना सही नहीं है। प्रोफेसर कृष्ण कुमार एक गहरी बात कह रहे हैं कि तकनीक विषमता को बढ़ा देगी जो पहले से ही भारत के संदर्भ में मौजूद है। मैंने भी इस बात का जिक्र अपने ज़मीनी अनुभवों के संदर्भ में किया है, जहाँ टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बड़े करीब से देखा है। टेक्नोलॉजी के प्रभाव को संतुलित करने के लिए चले लाइब्रेरी प्रोग्राम से बच्चों को काफी फायदा हुआ। अगर हम सोचने, सही सवाल पूछने, विश्लेषण करने, ज्ञान का निर्माण करने, रिफ्लेक्शन करने व संवाद की प्रक्रिया को सक्रियता के साथ इस्तेमाल करें तो बहुत सारी चीज़ें बुनियादी रूप से बेहतर होंगी। टेक्नोलॉजी सहायक भूमिका में हो सकती है विकल्प नहीं। कृष्ण कुमार जी को पढ़िए, बहुत कुछ पता चलेगा। अगर कुछ किताबों की जानकारी चाहिए तो मेल या मैसेज कर दें एजुकेशन मिरर के नम्बर पर।

  2. नमस्कार बृजेश जी, आपका जूनियर हूँ किन्तु कुछ टिप्पणियों से बिल्कुल सहमत नही हूँ। ये सच है कि कृष्ण कुमार जी एक अनुभवी शिक्षा विद है लेकिन उनकी ये बात की तकनीक समाधान नही है ये सहमति के योग्य नही है। क्योंकि मानव जाति का विकास ही तकनीक के सहारे हुआ है , आज हमारा दुर्भाग्य है कि हम तकनीक को विशेषण के तौर पर ही लेते है संज्ञा के तौर पर नही। जबकि पश्चमी देशो ने 5 दशक पूर्व ही इसे संज्ञा बनाकर प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों तक विषयो के रूप में पहुँचाया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जी ने भी नागरिको से आवाहन किया था कि वे अपने बच्चों को STEM विषयों को पढ़ने समझने में मदद करे। मेरी एक राय है कि कृपया चीन का प्राथमिक बच्चों के लिए बनाया गया curriculam देखें।
    अनुपम पांडेय
    बैच 8 उदयपुर, गांधी फेलो

  3. बिल्कुल सही सर
    ऐसी स्थिति में देश में कोरोना संक्रमण की बीमारी बड़े पैमाने पर फैल सकती है। भारत सरकार के बस में भी नहीं रह जाएगा देश के सवा सौ करोड़ भाइयों बहनों और माताओं को सम्हालना। देश की जनसंख्या को देखते हुए जो राज्य सरकारों द्वारा जून जुलाई-अगस्त में परीक्षा आयोजित कराने की रणनीति बनाई जा रही है । उसको तत्काल रुप से रोका जाये। साथ ही सभी छात्र छात्राओं को एवं डीएड बीएड के विद्यार्थियों को जनरल प्रमोशन दिए जाने के सभी राज्य सरकारों को आदेश जारी करने हेतु निर्देशित किया जाये। ताकि छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ ना हो सके और देश में इस कोरोना कि महामारी को रोका जा सके ।

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