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‘शिक्षकों की मृत्यु पर उठते सवाल, मुआवजे के नियमों में बदलाव की माँग’



कोविड-19 के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में स्कूल और कॉलेज बंद हैं।

वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण पूरे भारत में विभिन्न तरीकों के कर्फ़्यू व लॉकडाउन जैसे उपायों के माध्यम से वायरस के संक्रमण पर काबू पाने की कोशिश की जा रही है। दूसरी लहर की सबसे ख़ास बात तेज़ी से संक्रमण का प्रसार और उपचार में देरी के कारण बड़ी संख्या में होने वाली मौते हैं।

फरवरी-मार्च के आसपास लगा था कि स्थितियां तेज़ी से सामान्य हो रही हैं, स्कूलों का फिर से खुलने, शिक्षकों के आने व बच्चों के 50 फीसदी क्षमता के साथ विद्यालय में आने की घोषणा हुई। इस दौरान शिक्षक अपने-अपने विद्यालयों में बुनियादी तैयारियों में लगे हुए थे ताकि बच्चों के आने पर उनका जोरदार स्वागत कर सकें। लेकिन होली के ठीक पहले कोविड-19 के फिर से तेज़ी पकड़ने के कारण स्कूलों के खुलने व पठन-पाठन के सामान्य होने की उम्मीदों पर संशय के बादल मंडराने लगे।

संक्रमण के बढ़ते ख़तरे के बीच पंचायत चुनाव

संक्रमण के बढ़ते मामलों और बदले हुए हालात में शिक्षकों की ड्युटी कांटैक्ट ट्रैसिंग, कोरेंटीन सेंटर्स व अन्य कार्यों जैसे उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव ड्यूटी के प्रशिक्षण व तैयारियों में लगने लगी। हालांकि उत्तर प्रदेश में शिक्षकों ने कोविड-19 के बढ़ते मामलों के कारण चुनाव को स्थगित करने व बाद में करवाने की सोशल मीडिया व विभिन्न माध्यमों से अपील की और विभिन्न शिक्षकों संघों की तरफ से ऐसी बात कही गई। लेकिन हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश में चुनावों के संपन्न होने का हवाला देकर चुनावी तैयारियां जारी रहीं। चुनाव पूर्व होने वाले प्रशिक्षण के दौरान भी प्रशिक्षण देने वाले विभिन्न कर्मचारियों के साथ शिक्षकों के भी संक्रमित होने की ख़बरें आईं। लेकिन चुनावी ड्युटी की अनिवार्यता के कारण शिक्षकों ने इन प्रशिक्षणों में प्रतिभाग किया।

सोशल डिस्टेंसिंग व कोविड प्रोटोकाल की जो सैद्धांतिक तौर पर कागज़ों में दर्ज़ थी वह ज़मीन पर पूरी तरह नहीं उतर सकी। गाँवों में चुनावी तैयारियों के कारण माहौल बदला-बदला सा नजर आया। शहरों में रहने वाले लोग वोट देने और लॉकडाउन की आशंकाओं के बीच अपने गाँव और घरों की तरफ लौट रहे थे। इन हालातों के कारण चुनाव होने तक कोविड-19 के संक्रमण की खब़रें आने लगी। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स व प्राथमिक शिक्षक संघ की तरफ से जारी पत्र के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में अबतक 700 से ज्यादा शिक्षकों की मृत्यु कोविड-19 के संक्रमण के कारण हुई है। चुनावी ड्युटी के बाद बड़ी संख्या में शिक्षकों के संक्रमित होने की ख़बरें ट्विटर, फेसबुक व अन्य माध्यमों से शिक्षकों के बीच तेज़ी से साझा होने लगीं। शिक्षकों के परिवारजनों के संक्रमित होने और उससे उपजे हालात की रिपोर्ट्स मीडिया में नियमित अंतराल पर आती रहीं।

मतगणना टालने की मुहिम और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मतदान के अनुभवों व इसके बाद उपजे हालात की गंभीरता से परिचित होने के कारण शिक्षकों की तरफ से मतगणना को टालने की मुहिम शुरू की गई। इस मुहिम को विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स ने प्रकाशित किया। इसके कारणा मामाला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन आखिर में मतगणना को अनुमति मिल गई। मतगणना के दौरान और इसके पूर्व व बाद में विभिन्न जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग के व कोविड प्रोटोकाल की अवहेलना की तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे थे।

इससे सभी को एक अंदाज़ा हो गया था कि आने वाले समय में हालात काफी गंभीर होने वाले हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए होने वाली तैयारियां नाकाफी पड़ जाएंगी, क्योंकि संक्रमित लोगों की संख्या काफी बढ़ेगी। वहीं शहरों के प्रमुख अस्पतालों के ऊपर ऑक्सीजन गैस के सिलेंडर, जरूरी दवाओं समेत बेड्स की कमी और मदद माँगने वाली खबरें अख़बारों में नियमित रूप से छपने लगीं। भय और शंका के ऐसे माहौल में हर किसी शिक्षक की जुबाँ पर यही बात थी कि ग्राम पंचायत के यह चुनाव टाले जा सकते थे। अगर चुनाव नहीं होते तो हमारे बहुत से साथी शिक्षकों की जान सुरक्षित होती।

शिक्षक चपेट में आए तो जिम्मेदारी किसकी?

अप्रैल महीने के दौरान एक शिक्षक ने वर्तमान स्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “देश के विभिन्न हिस्से में काम करने वाले शिक्षकों के मन में सवाल है कि जब स्कूल में बच्चे नहीं आ रहे हैं तो उनको स्कूल में आने के लिए क्यों कहा जा रहा है। अगर वर्तमान परिस्थितियों में जब कोविड तेजी से फैल रहा शिक्षक भी इसकी चपेट में आ जाएं तो किसकी जवाबदेही होगी ?”

उस समय किसी ने भी ऐसे समय की कल्पना नहीं की थी कि जवाबदेही का यह सवाल बेहद गंभीर होकर यक्ष प्रश्न की तरह सामने आ खड़ा होगा। शिक्षक समुदाय में सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात को लेकर है कि शिक्षकों की जान एक ऐसी जगह पर जा रही है, जो उनके मूल दायित्वों में नहीं है। शिक्षकों का कहना है कि उनका मूल काम शिक्षा देना है, लेकिन उनको चुनावी ड्यूटी व ऐसे अन्य कार्यों के लिए मजबूर किया जा रहा है। यहाँ तक कि शिक्षकों की गिनती फ्रंटलाइन वर्कर्स में भी नहीं होती है और न ही चुनाव वाली ड्यूटी के पहले हम सभी शिक्षकों को वैक्सीन दी गई।

वर्तमान परिस्थितियों पर तंज़ करते हुए एक शिक्षक ने कहा, “हमारा सम्मान तो केवल बातों में और भाषणों में होता है। जब वास्तव में शिक्षकों के हितों व लाभ की बात आती है तो सवाल पूछा जाता है कि हमने किया क्या है?”

‘शिक्षक संगठनों पर उठे सवाल’

शिक्षक संगठनों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए एक शिक्षक ने कहा, “शिक्षक समाज में जो त्रासदी चल रही है,उससे मैं बहुत व्यथित हूँ। पंचायत चुनाव में सैकड़ों साथियों का चला जाना बहुत मार्मिक है। मेरी किसी से कोई शिकायत नहीं पर जिस तरह हम हज़ारों संगठनों में बंटे हैं,उससे हम संगठित नहीं हो सकते और शिक्षक हित प्रभावित हो रहा है। ऐसे में मैं खुद को इस व्यवस्था से अलग करना चाहता हूँ। एक स्वतंत्र विचार से सुसज्जित होना चाहता हूँ ताकि बिना किसी संगठन की परवाह किए शिक्षक हित की बात कर सकूं।”

इस पर एक अन्य शिक्षक की बात भी ग़ौर करने वाली है जिन्होंने कहा, “कितनी बड़ी विडंबना है कि सभी संगठन “संघे शक्ति कलियुगे” का नारा लगाते हैं और उसके बाद अलग अलग संगठन बनाते हैं।” चुनावों में ड्युटी के दौरान होने वाली दुर्घटना में निधन पर 15 लाख के मुआवजे का प्रावधान नियमानुसार चुनाव आयोग की तरफ से है। लेकिन कोविड-19 के संक्रमण के कारण बाद में होने वाली मृत्यु पर मुआवजे को लेकर संदेह की स्थिति है, इसलिए शिक्षकों की तरफ से इस प्रावधान में बदलाव की माँग हो रही है।

कोविड से मृत होने वाले शिक्षकों के परिवार को मिले 50 लाख मुआवजा

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं व प्राथमिक शिक्षक संघ ने कोविड-19 के संक्रमण के कारण होने वाली मौतों पर 50 लाख मुआवजा देने व मृतक आश्रितों को नौकरी देने की माँग की है। उत्तर प्रदेश के प्राथमिक शिक्षक संघ ने एक पत्र में कहा, “जिन शिक्षकों की कोरोना से मृत्यु हुई है उनके परिवार को 50 लाख की आर्थिक सहायता व उनके आश्रितों को नौकरी मिलनी चाहिए।”

इस बीच में विभिन्न राज्यों में भी शिक्षकों की स्थिति को लेकर मीडिया में विभिन्न रिपोर्ट्स प्रकाशित हो रही हैं। इनमें से एक ख़बर मध्य प्रदेश से आयी। मध्यप्रदेश में शिक्षकों की ड्युटी धार जिले में श्मशान घाट पर लगाने की ख़बर प्रकाशित हुई। इस घटना पर वहां के शिक्षक संघ ने सवाल पूछा कि अगर इस तरह की ड्यूटी के दौरान कोई शिक्षक संक्रमित हो जाता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? मध्य प्रदेश में भी शिक्षकों की कोविड-19 के संक्रमण से होने वाली मौतों के कारण शिक्षकों में इस तरह के कार्यों में लगाये जाने का विरोध किया।

शिक्षकों की सुरक्षा चिंताओं को लेकर मुखर बनें

कोविड-19 से जुड़े काम में लगे शिक्षक अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है, “कोरोना ड्यूटी में लगे अन्य कर्मचारियों को पीपीई किट, मास्क , सेनेटाइजर और दवाइयां मुहैया करवाई जाती है पर शिक्षकों के लिए ऐसी सुविधाएं नही होती।” यह काफी हद तक संभव है कि सब जगह ऐसी स्थिति न हो, लेकिन जहां भी ऐसी स्थिति है वहाँ शिक्षकों को अपनी आवाज़ मुखर करनी चाहिए क्योंकि जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है। इससे किसी भी हालत में कोई समझौता नहीं करना चाहिए। शिक्षक संगठन सही अर्थों में अपनी दिशा और प्रासंगिकता खो चुके हैं। यह विश्वास बहाली और प्रांसगिकता हासिल करने के लिए ज़मीनी प्रयास करने का है।

कोविड की दूसरी लहर के कारण उपजे हालात ने एक तरफ जहाँ शिक्षक समुदाय के शिक्षणेत्तर कामों में लगाये जाने के दर्द को सतह पर ला दिया है। वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों के कई संगठन होने कारण शिक्षकों की स्थिति कमज़ोर होने की बात भी साफ शब्दों में कही जा रही है, जिसके कारण शिक्षक समुदाय के माँग व चिंताओं की ढंग से सुनवाई नहीं हो रही है।

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