बच्चों को मशीनी तरीके से जोड़ व घटाव सिखाने का तरीका अध्यापकों के दिमाग पर इतना बुरी तरह से हावी रहता है कि वे एक अंकीय जोड़ व घटाव सीखते ही बच्चों को दो/तीन अंकीय जोड़ व घटाव के ऐसे सवालों का मशीनी अभ्यास करवाने लगते हैं जिनमें हासिल नहीं लगता हो। इससे बहुत जल्द ही उनके मन में यह खुशफहमी पैदा होने लगती है कि देखो उनके बच्चे कितनी तेजी से दो व तीन अंकीय जोड़ व घटाव सीख गए हैं।
ऐसी ही एक कक्षा में एक अध्यापिका को बच्चों को तीलियों की मदद से गुणा सिखाने में मुश्किल आ रही थी, जिस तरीके को उसने प्रशिक्षण में सीखा था। साफ था कि प्रशिक्षण में किया गया काम उसमें गुणा सिखाने का भरोसा जगाने में नाकाम रहा था। जब मैं उसकी कक्षा का अवलोकन करने गया तो उसने मुझसे कहा कि मैं तीन-चार लड़कियों को गुणा सिखा दूं ताकि वह गुणा पर काम करने का तरीका सीख जाए। यह मदद मांगते वक्त उसने यह नहीं सोचा कि उस वक्त बाकी बच्चे क्या करेंगे। मेरे काम शुरू करने के थोड़ी देर बाद ही उसे बाकी बच्चों के साथ व्यस्त हो जाना पड़ा और मुझे लड़कियों को गुणा सिखाते हुए देखने की उसकी ख्वाहिश अधूरी ही रह गई।
गणित की कक्षा का एक अनुभव
उन लड़कियों के साथ तीलियों की मदद से गुणा के सवाल पर काम करते ही मुझे यह समझ में आ गया कि उन्हें संख्याओं को मन में जोड़ने व घटाने में भी परेशानी आ रही है। मैंने अध्यापिका से पूछा तो उसने बताया कि उन लड़कियों को जोड़ व घटाव आता है। मैंने उन्हें 25 में 17 जोड़ने का सवाल हल करने के लिए दिया। उन्होंने तुरंत जवाब में 312 निकाल कर लिख दिया है। मैं समझ गया कि उन्हें हासिल के जोड़ व घटाव के सवाल नहीं आते। साफ था कि शिक्षिका का उन बच्चों के बारे में आकलन गलत था।
अब मैंने तीलियां लीं। उनसे खुली तीलियों व दस के बंडलों की मदद से 25 व 17 बनवाए और उन्हें जोड़ने के लिए कहा। थोड़ी सी मशक्कत के बाद उन्होंने दोनों संख्याओं को जोड़ कर सही जवाब बता दिया। मैंने उनसे एक दो सवाल और करवाए। उन्होंने उन सवालों को ठीक से कर दिया। मैंने उनके साथ जोड़ का सवाल हल करते वक्त खुली तीलियों में से दस का एक बंडल बना कर हासिल बनने व उसे बंडलों में जोड़ने की बातचीत भी की।
ये ‘1’ कहाँ जाएगा?
अब मुझे लगा कि वे दो अंकीय हासिल के जोड़ कॉपी में हल करने के लिए तैयार हैं। मैंने उन्हें 29 में 14 जोड़ने का सवाल हल करने के लिए कहा।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि उनमें एक लड़की 9 व 4 के नीचे 13 लिख कर गहरे सोच में डूबी हुई है। मैंने उससे पूछा कि वह पूरा सवाल क्यों हल नहीं कर रही है।
उसने निहायत ही भोलेपन से पूछा, ‘’ये ‘1’ कहां जाएगा, इसका क्या होगा?’’मुझे यह समझ में आया कि तीली व बंडल से किए गए जोड़ के सवालों ने इतना तो कर दिया है कि उसके मन में यह संदेह पैदा हो गया है कि हासिल वाला ‘1’ जिस जगह लिखा है वो ठीक नहीं है, लेकिन उसे किस जगह जाकर बैठना चाहिए और क्यों वहीं बैठना चाहिए, यह उसके दिमाग में साफ नहीं हुआ है।
यह भी समझ आया कि हासिल के जोड़ के सवाल को तीलियों/सामग्री की मदद से हल करने का यह मतलब नहीं है कि बच्चे उस सवाल को अंकों में भी अपने आप व आसानी से हल कर लेंगे। यह भी कि सिर्फ दो तीन सवालों को हल करवा कर यह मान लेना ठीक नहीं है कि उन सवालों के जरिए सीखी जाने वाली अवधारणा, जैसे, यहां पर हासिल व हासिल को जोड़ने की अवधारणा सीख ली गई है। फिर नई अवधारणा के साथ नई शब्दावली भी सीखनी होती है। मैं वहां पर यह पक्का करने से चूक गया कि उन लड़कियों ने नई अवधारणा व उससे जुड़ी शब्दावली व उसका मतलब ठीक से समझ लिया है।
जोड़ सिखाने की प्रक्रिया पर चिंतन
इस घटना से मेरे सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि मैंने उसे सिखाने में क्या व कहां चूक की। बाद में सोचने पर लगा कि पहली चूक तो मुझसे वहां पर हुई जहां पर मैंने उसे ठोस चीजों यानी तीलियों की मदद से हासिल का जोड़ सिखाया व उस पर बातचीत की। मैंने अपनी तरफ से बातचीत एक दो सवालों को हल करवा कर व उन पर बातचीत करके यह मान लिया कि वह इन सवालों को हल करने से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवालों को न सिर्फ समझ चुकी है बल्कि अपनी समझ पर अमल भी कर सकती है व पूछने पर बता भी सकती है। वे सवाल कुछ इस तरह के हो सकते थे,
- हासिल कैसे बनता है?
- हासिल क्यों बनाना पड़ता है?
- बनने के बाद हासिल कहां जुड़ता है?
- बनने के बाद हासिल वहीं क्यों जुड़ता है?
जितने साफ शब्दों में सवाल अभी यहां लिखे हैं, उतने साफ सवाल मैंने उस वक्त बातचीत में उससे पूछे नहीं थे। मैं अगर उस वक्त उससे इन सवालों को पूछ कर यह पक्का कर लेता कि वह इन सभी के जवाब तीलियों की मदद से निकाल पाती है और अपनी शब्दावली में दूसरों को ठीक से संप्रेषित कर पाती है तो मुमकिन है कि उसके लिए आगे चल कर अपनी कॉपी में सवालों को हल करना व उनके बारे में बात करना आसान हो जाता।
दूसरी चूक मेरी इस मान्यता में थी कि तीलियों की मदद से सवाल हल कर लेने के बाद बच्चे उसी तरह के सवालों को अपने आप कॉपी में लिखित रूप में हल कर सकते हैं। यह मान्यता उन मामलों में ठीक नहीं ठहरती, जब बच्चों को ठोस चीजों के साथ किए गए कामों को अंकों यानी प्रतीकों की मदद से दर्शाने का ज्यादा अनुभव न हो।
मुझे उनके साथ अंकों में लिखे सवाल को हल करने पर दो-एक तरीकों से काम करना चाहिए था।
पहला, उसे सवाल पढ़ कर तीलियों की मदद से संख्याएं बना कर हल करने के लिए कहना।
दूसरा, सवाल में लिखी संख्याओं के सामने तीलियों-बंडलों के चित्र बना कर हल करने के लिए कहना।
और इसके साथ ही जब वह सवाल को हल कर रही होती तो उसके साथ बात करते रहना कि वह आगे क्या करेगी व वैसे ही क्यों करेगी?
संभवत: इस बातचीत से उसके दिमाग में चीजों, चित्रों व अंकों की मदद से हासिल के सवालों को हल करने के तरीके व उससे जुड़ी शब्दावली ज्यादा साफ व पक्की हो जाती। मुमकिन है कि वह कुछ सवालों को इस तरीके से हल करने के बाद हासिल के किसी सवाल को चीजों व चित्रों की मदद के बगैर सीधे ही हल कर पाती। और पूछने पर सवाल को हल करने का तरीका व उस तरीके के कदमों को उठाने के कारण अपने शब्दों में बता पाती। और तब उसे पता होता कि ये हासिल वाला ‘1’ कहां जाएगा व वहीं क्यों जाएगा।
(लेखक परिचयः रविकांत शैक्षिक सलाहकार के तौर पर विभिन्न संस्थाओं व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षण सामग्री, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण संदर्शिकाएँ आदि का निर्माण, शैक्षिक शोध तथा अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गणित शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को समझने-समझाने में खास रुचि और शिक्षकों के क्षमतावर्धन में विशेषज्ञता।)
