एक आँगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों के साथ गिनने को लेकर काम कर रहा था। अधिकांश बच्चे एक से पाँच तक गिन पा रहे थे। पत्थरों से ढेर में से एक से पाँच तक की संख्याओं में पत्थरों को गिनकर दे भी पा रहे थे। उनसे जब कक्षा में मौजूद आठ बच्चों को गिनने के लिए कहा गया तो अधिकांश से एक से सात तक बच्चों को गिना और ‘खुद को गिनना’भूल गए।
लेकिन जब शिक्षिका द्वारा इस तरफ ध्यान दिया गया तो उन्होंने खुद से अपने प्रयास में ‘सेल्फ करेक्शन’कर लिया। खुद को इतनी सहजता से बरतने का अंदाज-ए-बयां जीवन का एक फलसफा भी बयान करता है। अपने अस्तित्व को लेकर सहज रहना और यह स्वीकार करना कि बाकी दुनिया के होने में अपना भी होना शामिल है, एक बहुत बड़ी बात है।
जब हम छोटे होते हैं तो यह बड़ी महत्वपूर्ण बात बिना किसी प्रयास के हमारे ध्यान में रहती है। लेकिन जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं ‘सेल्फ’ को लेकर हम इतने सजग हो जाते हैं कि खुद को हमेशा याद दिलाते रहते हैं कि हम कितने ख़ास और महत्वपूर्ण हैं। हम खुद को गिनना कभी नहीं भूलते। लेकिन अगर कोई दूसरा हमें गिनना भूल जाए या हमें अपेक्षित महत्व न दे तो हमारा ईगो हर्ट हो जाता है और हम दुःखी महसूस करते हैं।
आखिर में कह सकते हैं कि बच्चों की नज़र से दुनिया को देखना भी एक कला है, जिसे हमें सप्रयास विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए।
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