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बच्चों को ख़ुद से सीखने का अवसर दें

अगर बच्चों की ग़लती पर टोकना आपको भी पसंद है तो पढ़िए यह पोस्ट। यहां ग़लतियों का मतलब किसी विषय को पढ़ते समय होने वाली भूलों से हैं। सीखने की प्रक्रिया में हम सभी ऐसी ग़लतियां करते हैं और उनको सुधारते हैं। इस तरह से सीखने की प्रक्रिया अंततः हमारी समझ को पुख़्ता करती है।

भारत में शिक्षाआमतौर पर पढ़ने-लिखने के दौरान अगर कोई बच्चा ग़लती करता है तो हम उसे तुरंत टोक देते हैं कि देखो इसे ऐसे नहीं ऐसे लिखते हैं? इसको ऐसे पढ़ते हैं। कहने का अर्थ है कि हम बच्चे की हर ग़लती को तुरंत सुधार देना चाहते हैं। शायद ऐसा करते समय हम सौ फ़ीसदी निश्चित होते हैं कि अब बच्चे से यह ग़लती तो दोबारा होगी ही नहीं। बच्चे उसे हमेशा के लिए याद कर लेंगे।

यहां सबसे ग़ौर करने वाली बात है कि हम बच्चे के सीखने की क्षमता पर भरोसा करने की बजाय उसके रटने की क्षमता पर भरोसा जता रहे हैं। रटने वाला फॉर्मूला पूरी तरह दुरुस्त नहीं है क्योंकि रटी हुई चीज़ ध्यान से उतर भी सकती है। इसलिए हमारा फ़ोकस बच्चे को रटने की बजाय चीज़ों को समझने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। 

सवाल और जवाब के बीच का फासला

किसी भी सवाल का जवाब एक प्रक्रिया से होकर आता है। भले ही वह प्रक्रिया इतनी छोटी क्यों न हो कि हमें नज़र ही ना आए। दो और दो जोड़ने की तरह तुरंत चार में तब्दील हो जाने वाली ही प्रक्रिया हो।

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सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए शिक्षक।

बच्चे किसी सवाल को अपने तरीके से हल करते हैं। हमें सवाल और जवाब के बीच का समय अंतराल बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस समय बच्चे सोचते हैं। सवालों की प्रासेसिंग करते हुए जवाब तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। अगर एक तरीके से जवाब नहीं आता है तो दूसरा तरीका अपनाते हैं।

दूसरा तरीका भी काम नहीं करता तो फिर दूसरों की कॉपी देखते हैं या फिर किसी दोस्त से पूछते हैं। अगर उनको कोई बहुत ग़ौर से देख न रहा हो तो वे कॉपी बंद करके कोई और काम करते हैं । बहुत से स्कूलों में बच्चों को हर चीज़ रटा देने की कोशिश होती है। इस रटाने वाली प्रवृत्ति को अंग्रेजी-हिंदी की वर्णमाला और गिनतियों को रटा देने वाली कोशिशों का बार-बार दोहरान करते देखा जा सकता है।

समझ बनाना है सबसे जरूरी

अगर किसी सवाल का जवाब रटा हुआ है तो क्या होगा? जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में एक बच्चे को सोचने-विचारने की प्रक्रिया से ख़ुद गुजरने का मौका नहीं मिलेगा। यहां ख़ुद करके सीखने वाली बात काफ़ी ग़ौर करने वाली है। जो चीज़ हम ख़ुद करके सीखते हैं वह हमारी दीर्घ कालीन स्मृति (लांग टर्म मेमोरी) का हिस्सा बन जाती है। बार-बार दोहरान से भी चीज़ों को दीर्घकालीन स्मृति का हिस्सा बनाया जा सकता है। लेकिन इससे समझ निर्माण की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचता है।

पठन कौशल, पढ़ने की आदत, रीडिंग स्किल, रीडिंग हैबिट, रीडिंग रिसर्च,

एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

जब हम ज़िंदगी में जब कोई काम पहली बार कर रहे होते हैं तो वब बिल्कुल संपूर्ण नहीं होता। बिल्कुल दुरुस्त नहीं होता। धीरे-धीरे उसमें सुधार आता है। इस बात को सुलेख के संदर्भ में देखा जा सकता है। हर बच्चे की राइटिंग बिल्कुल अलग होती है। उसकी राइटिंग पर उसकी स्पष्ट छाप होती है। हर अक्षर को बनाने का अपना उसका ख़ास अंदाज होता है। अक्षरों की मूल बनावट से समानता के बावजूद उनके लिखावट की एक अलग विशिष्टता होती है।

ग़लतियां करना भी सीखने का हिस्सा है

ग़लतियां करना भी सीखने का हिस्सा है। इस बात को एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। गणित के कालांश में एक स्कूल में पांचवीं कक्षा के बच्चे गिनती गिनते समय 4 और 2 बयालिस बोल रहे थे। बच्चों के सामने एक सवाल रखा गया कि चार के बाद दो और गिनने के बाद क्या आता है?  तो उनमें से कुछ बच्चों ने जवाब दिया कि 6 आता है। इस तरीके से बच्चे अपनी ही अवधारणा को ख़ुद सुधार रहे थे। 4 और 2 को मिलाकर 42 बनाने वाली बात पर सवाल उठा रहे थे। आगे की बातचीत में 40 के  आगे गिनते हुए उनको 42 भी मिला। तो उनको समझ में आया कि 40 में 2 और जोड़ने पर 42 होता है। जबकि 4 में 2 जोड़ने पर 6 ही होता हैं।

अपने एक लेख शिक्षा क्या है और इसे कैसा होना चाहिए में वेणी शंकर झा ने लिखा था,

कला वाली गतिविधि से बच्चे ख़ुद को अभिव्यक्त करना सीखते हैं।

अब दूसरा उदाहरण भाषा का लेते हैं। राजस्थान के सिरोही ज़िले में च को स और स को ह बोला जाता है। स्थानीय स्तर पर भाषा के इस प्रयोग के कारण बच्चे सिरोही को हिरोई और चम्मच को सम्मस बोलते हैं। छठी कक्षा के बच्चों से मात्राओं के ऊपर बात हो रही थी तो मैंने कहा कि सिरोही लिखने वाले भी सही हैं। ‘हिरोई’ लिखने वाले भी सही हैं। क्योंकि लोगों द्वारा ‘हिरोई’ भी बोला जाता है।

‘सीरोही’ लिखने वाले बच्चे ने भी स पर ई की मात्रा लगाने के अलावा तो बाकी पूरा शब्द तो बिल्कुल ठीक लिखा है। इससे बच्चे को उस बिंदु पर फ़ोकस करने का मौका मिला, जहाँ उनको सुधार करने की आवश्यकता है।

जानिए क्या कहते हैं ‘शिक्षक प्रशिक्षक’

इस बारे में एक शिक्षक प्रशिक्षक कहते हैं, “किसी बच्चे के प्रयास को समझे बग़ैर उसकी भूल सुधारना सही नहीं है। इससे बच्चा कोशिश करने से डरने लगता है। बच्चे को लगता है कि ‘सही जवाब’ कोई ऐसी चीज़ है जहाँ तक वह ख़ुद कोशिश करके नहीं पहुंच सकता।”

images_4दूसरे शब्दों, “जब सही जवाब बार-बार किसी और की तरफ़ से आती है तो बच्चे के मन में यह बात आती है कि सही जवाब तो किसी और के अधिकार क्षेत्र की बात है। यह तो उसके वश की बात नहीं है।”

इसका असर बच्चे के मोटीवेशन पर पड़ता है। इसलिए बच्चों को पढ़ाते (या कोई टॉपिक समझाते) समय ध्यान रखना चाहिए कि हम बच्चे की कोशिश को स्वीकार करें। उसे महत्व दें। उसे भी सवाल का जवाब खोजने की प्रक्रिया में शामिल करें। उसे भूल के बिंदु तक पहुंचने के लिए ख़ुद से कोशिश करने दें ताकि उसे लगे कि अरे! ऐसा करना तो बहुत अासान है।”

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