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कविताः ‘तारे टिम टिम करते हैं, कहाँ किसी की सुनते हैं’



 

जब आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने एक कविता की दो पंक्तियों को आगे बढ़ाया तो 34 पंक्तियां स्वाभाविक रूप से बनती चली गईं। इन पंक्तियों को जो बात मुझे सबसे ग़ौर करने वाली लगी, वह थी बच्चों के परिवेशीय अनुभवों के साथ गहरा जुड़ाव। उनकी लिखी कविता की पंक्तियां आपके साथ भी साझा है ताकि जब आप अगली बार आँगनबाड़ी शिक्षिकाओं या आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से संवाद करें तो उनकी सृजनशील भूमिका का भी ध्यान रख सकें कि वे महज ज्ञान की उपभोक्ता या रिसीवर भर नहीं है, वे भी ज्ञान का सृजन करती हैं और अपने अनुभवों को समृद्ध तरीके से विभिन्न कार्यों में उपयोग करती हैं।

यह बात ख़ासतौर से कविताओं को आँगनबाड़ी केंद्र पर मौजूद बच्चों को हाव–भाव के साथ सुनाने के दौरान विशेष रूप से दिखाई देता है। तो आप भी पढ़िए कविता की मूल पंक्ति और इस कविता की आगे बढ़ाई गई पंक्तियों को – 

मकड़ी जाला बुनती है
कहाँ किसी की सुनती है

कुत्ता हड्डी खाता है
कहाँ किसी की सुनता है

चिड़िया दाना चुगती है
कहाँ किसी की सुनती है

बिल्ली दूध पीती है
कहाँ किसी की सुनती है

बकरी घास खाती है
कहाँ किसी की सुनती है

गाय बछड़े को दूध पिलाती है
कहाँ किसी की सुनती है

तारे टिम टिम करते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

बच्चे झूला झूलते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

कौआ काँव–काँव करता है
कहाँ किसी की सुनता है

बिल्ली चूहा खाती है
कहाँ किसी की सुनती है

तोता मिर्ची खाता है
कहाँ किसी की सुनती है

बारिश में मोर नाचता है
कहाँ किसी की सुनता है

मछली पानी पीती है
कहाँ किसी की सुनती है

मछली पानी में तैरती है
कहाँ किसी की सुनती है

मेंढक टर्र टर्र करते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

बच्चे बारिश में खेलते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

भैंस तालाब में नहाती है
कहाँ किसी की सुनती है

पानी टिप टिप करता है
कहाँ किसी की सुनता है

बच्चे पानी में छप छप करते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

बादल गड़ गड़ करते हैं
कहाँ किसी की सुनते हैं

(आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुक, एक्स और यूट्यूब के जरिए भी जुड़ सकते हैं। अपने लेख, कक्षा–शिक्षण के अनुभव भेजें educationmirrors@gmail.com पर।)

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