NEP-2020: पूर्व-प्राथमिक शिक्षा में बदलाव की उम्मीद बने ‘आंगनबाड़ी’ केंद्र

प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा में एक ऐसे पाठ्यक्रम की दरकार है जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को एक सुगमकर्ता के रूप में मजबूत बनाए और तीन से आठ वर्ष के बच्चों के सीखने की आवश्यकताओं को भी पूरा करे। अगर हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के बाद आए एनसीएफ–फाउण्डेशन स्टेज की पाठ्यचर्या को देखें तो वह इस आवश्यकता को काफी हद तक सैद्धांतिक रूप से पूरा करती है। लेकिन वास्तविक सवाल फाउण्डेशन स्टेज की पाठ्यचर्या के ‘पॉलिसी ट्रांसलेशन‘ यानि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की है। इस लेख में धरातल की वास्तविकता को समझने की कोशिश है। आप भी कमेंट लिखकर अपने अनुभव बता सकते हैं।
फाउण्डेशन स्टेज की पाठ्यचर्या (NCF-FS) खेल, खोज और गतिविधि आधारित शिक्षण को अपनाने की पैरवी करती है, जो बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा, रचनात्मकता और आत्मविश्वास को बनाए रखे। इसमें शारीरिक, भाषायी, संज्ञानात्मक, सामाजिक-भावनात्मक और रचनात्मक समेत विकास के सभी पाँचों आयामों को प्रमुखता के साथ शामिल किया गया है।
घर से आंगनबाड़ी केंद्र/बाल वाटिका के बीच बच्चे का पहुंचना सहजता के साथ हो पाए और वह सीखने की औपचारिक दुनिया में सहज महसूस करे यह एक ध्यान रखने वाली बात है। इन सभी आयामों पर काम करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को किताब के कई पन्ने पलटने पलटते हैं, यह एक जमीनी सच्चाई है।
संक्षेप में कह सकते हैं कि जो भी शिक्षक हैंडबुक बने उसमें गतिविधियों को समायोजित करते हुए साप्ताहिक योजना के रूप में विस्तार से लिखना ज्यादा उपयोगी होगा। इससे उस योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाने वाली आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं या शिक्षिकाओं को मदद मिलेगी। इस काम को करने के लिए आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को ऑनसाइट सपोर्ट की जरूरत है।
वार्षिक कैलेंडर की गतिविधियों वाली किताब को देखकर कार्यकर्ता कई बार अपने आत्मविश्वास के ऊपर संदेह करते हैं, कई बार नये अवधारणाओं को सामने रखने वाले शब्दों को देखकर ठिठक जाते हैं यह कौन सी नई चीज आ गई। इन शंकाओं का समाधान गतिविधियों के वास्तविक डेमो के माध्यम से किया जाता है। इसमें एक–दूसरे को देखकर सीखना, छोटे समूह में डेमो करना, बड़े समूह में आकर डेमो करना और सीखने में गलतियों को स्वाभाविक रूप से देखने का भाव होने से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं।
स्वतंत्र खेल से निर्देशित खेलों की तरफ बढ़ने की है जरूरत
कई केंद्रों पर आँगनबाड़ी सहायिका की शिक्षा ज्यादा है और उनमें से अनेक ने बीएड भी किया हुआ है ऐसे में वे शिक्षण प्रक्रिया के काम में भी सहयोग करती हैं, लेकिन ऐसे पहलू को कुछ केंद्रों के संदर्भ में अच्छी सहयोग वाली स्थिति के रूप में देखा जा सकता है।
वास्तव में आँगनबाड़ी केंद्र को सक्रिय बनाने के लिए आँगनबाड़ी सहायिका और आँगनबाड़ी कार्यकर्ता के बीच अच्छा तालमेल और सहयोग बहुत जरूरी है।

आँगनबाड़ी केंद्रों पर जो गतिविधि स्वाभाविक रूप से होती है वह है स्वतंत्र खेल। लेकिन निर्देशित खेलों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए लगातार डेमो करने और बच्चों के साथ उसकी पुनरावृ्त्ति पर काम करने से चीजें आगे बढ़ेंगी। अगर भाषायी विकास वाले आयाम की बात करें तो कविताओं पर काम करने को लेकर आँगनबाड़ी शिक्षिकाएं सहज हैं, कई बार हैरानी होती है कि हिन्दीभाषी राज्यों के अलग-अलग हिस्सों में कुछ चुनी हुई कविताओं को बच्चे सुनाते हैं।
इन कविताओं में भी नयेपन को शामिल करने की जरूरत है, ताकि बच्चों को गाने के लिए और उनके ऊपर चर्चा के लिए ऐसी कविताएं मिलें जो हाव-भाव व तथ्य में थोड़ा सा नयापन लेकर आएं। यहाँ गौर करने वाली बात है कि आँगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों के साथ कविताओं को बेहद सहज माहौल में व हाव-भाव के साथ करवाती हैं और कविता को रटाने के ऊपर कोई जोर नहीं देते हैं।
कविताओं पर अच्छा काम हो रहा है, कहानियों पर देना होगा ध्यान
लेकिन आँगनबाड़ी केंद्र पर कहानियों को लेकर होने वाले काम की अपनी सीमाएं हैं, कई बार हिन्दी में जो कहानियां संदर्भ सामग्री या हैंडबुक के रूप में आंगनबाड़ी शिक्षिकाओं को मिल रही हैं वे छोटे बच्चों की जरूरत व सीखने की स्थिति की दृष्टि से ज्यादा कठिन और प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होती हैं। कहानी ऐसी होनी चाहिए जिसे कार्यकर्ता स्वयं से पढ़कर, बच्चों के घर की भाषा में कहानी को स्वाभाविक रूप से बच्चों को सुना सकें। ऐसी स्थिति में ज्यादा बेहतर परिणाम मिलेंगे।
इसके लिए बाल साहित्य से ऐसी कहानियों को खोजना होगा जो बच्चों को कहानी के मानसिक चित्र बनाने में, अपने परिवेशीय अनुभवो से जोड़कर कहानी को समझने में और कहानी को सुनाते समय शब्दों के चुनाव के लिए स्वाभाविक रूप से तैयारी में मदद करती हों। कहानी सुनाने के हुनर पर क्षमतावर्धन को समूह में काम करके और डेमो का अवसर देकर बेहतर बनाया जा सकता है। बच्चों के साथ इस काम की निरंतरता आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को खुद से सीखने का रास्ता देंगी। बच्चों के घर की भाषा को समझना एक संसाधन है और इसका इस्तेमाल कहानी के सत्र में जरूर किया जाए, इस पर बातचीत व केंद्र पर इसके अमल के बड़े सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।
संज्ञानात्मक विकास वाले आयाम पर छोटे-बड़े की अवधारणा और पास-दूर जैसे मुद्दों पर काम होता दिख रहा है। लेकिन इसे ज्यादा व्यावहारिक बनाने और बच्चों के परिवेशीय अनुभवों व ठोस चीजों का इस्तेमाल करके करने की जरूरत है। केंद्र पर पर्याप्त सामग्री व संसाधन तो हैं लेकिन उनके प्रभावशाली उपयोग को चरणबद्ध तरीके से बेहतर बनाने के उपाय किये जा सकते हैं। रंगों की पहचान, चिड़ियों व जानवरों की आवाज इत्यादि मुद्दों पर भी काफी अच्छा काम हो रहा है।
सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए भी बच्चों के साथ आपस में मिलकर काम करने, चीजों को साझा करने और छोटे बच्चों का स्वाभाविक रूप से किसी चीज की माँग करने पर दे देने इत्यादि को लेकर एक निरंतरता में काम हो तो बहुत सी चीजें स्वतः बेहतर होने लगती हैं। बच्चों के बीच झगड़े वाली स्थिति में भी बातचीत करने और नियम बनाने व उसके अनुसार काम करने से बच्चों को एक अहसास होने लगता है कि किस तरीके से काम करना सबके लिए अच्छा है।
रचनात्मक आयाम – बच्चों के बनाए चित्रों पर बातचीत करें
आँगनबाड़ी केंद्रों के संदर्भ में जिस बात की सबसे ज्यादा चिंता जताई जाती है वह है कम बच्चों का नामांकन और नामांकन के सापेक्ष उपस्थिति का न होना। अगर जिन बच्चों का नामांकन है और वे नियमित नहीं आ रहे हैं तो फिर कार्यकर्ता के मोटीवेशन पर इस बात का असर पड़ता है। इसका एक प्रमुख कारण आँगनबाड़ी को लेकर लोगों के बीच में बनी छवि बनी हुई है कि वहाँ पर बच्चों की पढ़ाई नहीं होती।
आँगनबाड़ी केंद्र में बच्चों की पढ़ाई होती है,और छोटे बच्चों की पढ़ाई खेल-खेल में होती है इस बात को कार्यकर्ताओं ने काफी अच्छे भाव व तैयारी के साथ आत्मसात किया है। उन्होंने इस बात को समझा है कि तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए खेलने और सीखने में कोई अंतर नहीं है। इस विचार को ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वित होता देखकर खुशी होती है।
इस बात को अभिभावकों के बीच भी पहुंचाने की जरूरत है क्योंकि वे आँगनबाड़ी या बाल वाटिका के शिक्षकों पर सीधे वर्णमाला, गिनती और एबीसीडी पढ़ाने के लिए कहते देखे जाते हैं।

रचनात्मक आयाम पर बच्चों के लिए बनाई गई वर्कबुक्स काफी सारे मौके उपलब्ध कराती हैं और अगर उसका अच्छे से इस्तेमाल हो तो बच्चे अपनी एक स्वाभाविक लय चित्रों को बनाने, रंगों को भरने और अपनी बनाई आकृतियों के बारे में बताने से हासिल कर लेते हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात बच्चों से पूछना और जानने की कोशिश करना है कि उन्होंने क्या बनाया है।
उदाहरण के लिए एक छोटी बच्ची मछली की तरह की आकृतियां बनाती थी, जब उससे बातचीत हुई तो पता चला कि उसने अपने मम्मी-पापा, दादा-दादी, भाई व ब बहन का चित्र बनाया था, जो बाजार जा रहे थे। यहाँ पर परिवार के सदस्यों की संख्या के साथ एक गतिविधि में उनकी भागीदारी को भी दर्शाया गया है, लेकिन यह बात हमें तभी पता चलती है जब हम बच्चों से बात करके उनके बनाये चित्रों को समझने की कोशिश करें।
शिक्षण–अधिगम का ‘औसत समय‘ बढ़ाने की जरूरत
आँगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों के शिक्षण को मिलने वाला वास्तवित समय काफी कम है। अपेक्षा तो तीन से चार घंटे के शिक्षण की है लेकिन वास्तविक स्थिति 35 मिनटे से 60 मिनट और आदर्श स्थिति में 90 मिनट या इससे ज्यादा की मिल जाती है जहाँ पर साप्ताहिक योजना को लागू किया जा रहा है और गतिविधियों को योजना के अनुसार करवाने के लिए बुकलेट की मदद ली जाती है।
यहाँ पर रेखांकित करने की बात है कि यह मुद्दा पाठ्यचर्या से ज्यादा टाइम ऑन टास्क या वास्तविक शिक्षण को मिलने वाले समय का है जिसे बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ शिक्षण की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाने की जरूरत है ताकि बच्चों को स्वाभाविक माहौल में सीखने, खेल-खेल में विभिन्न अवधारणाओं पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने, अपनी जिज्ञासा को व्यक्त करने और एक खुशनुमा माहौल में पढ़ने का अवसर मिले।
आखिर में आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मिलने वाले सपोर्टिव सुपरविजन या सहयोग पर भी थोड़ी चर्चा करते हैं। आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का काम बेहद महत्वपूर्ण और उनके इस काम के लिए उनको प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए, यह सबसे जरूरी बात है। अगर हमारी उनसे अपेक्षा है कि बच्चों को वे भयमुक्त माहौल प्रदान करें तो उनको भी काम करने के लिए भयमुक्त माहौल मिलना चाहिए। उनकी वास्तविक चुनौतियों व समस्याओं का व्यावहारिक समाधान भी मिलना चाहिए। हर महीने होने वाली मीटिंग्स में उनके ज़मीनी स्तर पर बच्चों के सीखने-सिखाने के अनुभवों व अच्छा काम करने वाला उदाहरणों को रेखांकित करना बहुत मदद करता है।
आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के काम को करें प्रोत्साहित
यहाँ एक ग़ौर करने वाली बात है कि आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के पास शिक्षण के अलावा बाकी काम लंबे समय से प्राथमिकता में शामिल रहे हैं, अभी इसमें एक नीतिगत शिफ्ट है और जमीनी स्तर पर भी बदलाव हो रहा है। इसलिए प्रोत्साहित करने वाले नजरिये से आंगनबाड़ी की विजिट करते समय जरूर जानने की कोशिश करें कि बच्चे किन खेलों में सबसे ज्यादा आनंद ले रहे हैं, कौन सी कविताओं को हाल-भाव से सुनाते हैं, कौन सी कहानियां बच्चों को बहुत ज्यादा अच्छी लगती हैं। क्या किसी कहानी को बच्चे अपने घर की भाषा में सुना सकते हैं। शारीरिक विकास की गतिविधियों में क्या स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह की मांसपेशीयों के विकास वाले अवसर दिए जा रहे हैं या नहीं।
आँगनबाड़ी केंद्र पर डिसप्ले की गई शिक्षण सामग्री क्या बच्चों की पहुंच में हैं, इसका अवलोकन करें और ऐसा करने के लिए बच्चों का उदाहरण लेकर प्रोत्साहित करें। ऐसे माइंडसेट या सोच के साथ आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मिला सहयोग आँगनबाडी को सीखने के जीवंत व सक्रिय केंद्रों के रूप में परिवर्तित करने और अभिभावकों की सोच बदलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बदलाव की इस कहानी में आँगनबाड़ी कार्यकर्ता के अपने सीखने व बेहतर करने की क्षमता पर भरोसे की भी बहाली शामिल है। इस अभियान में सहायिकाओं की भी एक अहम भूमिका है इस बात को हमें जरूर याद रखना चाहिए। दोनों के साझा प्रयास ही आँगनबाड़ी केंद्रों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में जीवंत करने और समुदाय से अपेक्षित सहयोग पाने में मदद करेंगे।
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