बाल साहित्य की दुनिया में कभी–कभी ऐसी किताबें आती हैं जो बच्चों और बड़ों दोनों को भीतर तक झकझोर देती हैं। नॉर्वे के प्रसिद्ध लेखक, कवि और मनोचिकित्सक हाँस सांडे की किताब “आ जाओ अब रात” ऐसी ही एक अनूठी पुस्तक है। दिसंबर 2021 में एकलव्य प्रकाशन द्वारा इसका हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ। प्रकाशन के तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी, यह किताब आज भी एकलव्य प्रकाशन के आउटलेट “पिटारा“ में देखने पर बिल्कुल नई लगती है जैसे पहली बार छपकर आई हो।
इस किताब का कवर बेहद आकर्षक है, जो सहज ही पाठक का ध्यान खींच लेता है। लेकिन आश्चर्य यह है कि बहुत–से पाठक, शिक्षक और अभिभावक इसे पलटते हैं, और फिर उतनी ही जल्दी वापस रख भी देते हैं। सवाल उठता है कि आखिर क्यों?
बच्चों की किताबों में शब्द ही नहीं, चित्र भी बोलते हैं
हाँस सांडे की यह किताब केवल एक कहानी नहीं, बल्कि चित्रों और भावनाओं का गहरा अनुभव है। इसमें सात पेंटिंग्स हैं जो जीवन, मृत्यु, और अस्तित्व के प्रश्नों को अपने रंगों में पिरोती हैं। बाल साहित्य में लंबे समय तक यह बहस चलती रही कि बच्चों की किताबों में शब्द अधिक अहम हैं या चित्र। अब यह समझ बन चुकी है कि चित्र भी कहानी कहने का उतना ही सशक्त माध्यम हैं।
लेकिन व्यवहार में यही पेंटिंग्स कई बार किताब को पाठकों तक पहुँचने से रोक देती हैं। शायद इसलिए कि इनमें से एक चित्र बच्ची के नग्न शरीर को दिखाता है, जो समाज में तुरंत असहजता पैदा कर देता है।
क्या हम किताब को उसके कवर से आँकते हैं?
हम बड़े लोग अक्सर किताब को पूरा पढ़ने से पहले ही उसका निर्णय कर लेते हैं। अगर किसी किताब में नग्न शरीर का चित्र दिख जाए, तो हम उसे अश्लीलता के नजरिए से देखने लगते हैं। लेकिन क्या लेखक और चित्रकार का उद्देश्य यही था?
“आ जाओ अब रात” में यह चित्र न तो उत्तेजना जगाता है, न ही किसी अनुचित विचार को जन्म देता है। यह तो जीवन और मृत्यु के प्राकृतिक चक्र का प्रतीक है। पहली पेंटिंग जन्म की ओर इशारा करती है, और आख़िरी मृत्यु की ओर, जैसे जीवन का चक्र अपनी पूरी यात्रा पूरी कर शांत हो गया हो।
हाँस सांडे का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है। वे बच्चों के मन, उनकी भावनाओं और अनुभवों को गहराई से समझते हैं। यही कारण है कि वे मृत्यु जैसे जटिल विषय को भी सरल, संवेदनशील और सौंदर्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत कर पाते हैं।
बच्चों से कठिन विषयों पर क्यों करें बात?
बाल साहित्य में मृत्यु पर आधारित किताबें बहुत कम हैं। शायद इसलिए कि हम मानते हैं कि बच्चे इन विषयों के लिए “बहुत छोटे” हैं। लेकिन बच्चों के मन में भी जीवन, हानि, और विदाई के सवाल उठते हैं। अगर हम उन्हें ऐसी किताबें पढ़ने दें, तो वे भावनात्मक रूप से अधिक परिपक्व हो सकते हैं।
लेखक की यह पंक्ति, “क्या जीवन हो सकता है इतना सुंदर?” पाठक के मन में गूँजती है। यह प्रश्न केवल मृत्यु को नहीं, बल्कि जीवन की गहराई को समझने का निमंत्रण है। अब पढ़ते हैं इस किताब का एक अंश–
“सारे आँसू कहाँ से आते हैं?
क्या वे अँधेरे तालाब से आते हैं?
क्या वे नमकीन समुद्र से आते हैं?
क्या वे ठण्डी हवा से आते हैं?
आँसू सिव की मुस्कान से आते हैं।“
इस अंश से साफ़ है कि बच्चा मृत्यु के अनुभव से गुजर रहा है। ऐसा मुझे लगता है कि किताब की ये दोनों पेंटिंग्स भी इसी यात्रा को रूप देती हैं–पहली जन्म का प्रतीक, आख़िरी मृत्यु का। यह जीवन चक्र और मानव सभ्यता की गहरी मान्यता की ओर इशारा है।
साहित्य पढ़ने में ‘संवेदनशीलता और सौंदर्यबोध‘
अगर किसी अभिभावक या शिक्षक को यह किताब असहज लगती है, तो सबसे अच्छा तरीका यही है कि पहले वे खुद इसे पूरी तरह पढ़ें। लेखक और चित्रकार का परिचय, किताब की भूमिका और बीच के कुछ अंश पढ़ने से ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य बच्चों को डराना नहीं, बल्कि जीवन को समझना है। हाँस सांडे हमें यह सिखाते हैं कि बच्चों के साहित्य में ईमानदारी और संवेदनशीलता दोनों जरूरी हैं। जीवन की तरह ही मृत्यु को भी सहजता से स्वीकार करना, यही जीवन का सौंदर्य है।
आख़िर में हमारे मन में प्रश्न फिर से उठता है कि “क्या जीवन हो सकता है इतना सुंदर?” शायद हाँ। अगर हम बच्चों के साथ कठिन विषयों पर खुलकर बात कर सकें। अगर हम चित्रों को पूर्वाग्रह से नहीं, संवेदना और सौंदर्यबोध के भाव से देख सकें। हम किसी किताब को उसके कवर से नहीं, उसकी कहानी से पहचानें।
(लेखक परिचय: कुँवर सिंह, किताबें पढ़ने के शौकीन हैं। किताबों के बारे में खूब बातचीत करना पसंद करते हैं। आप वर्तमान में एकलव्य के प्रकाशन कार्यक्रम में किताबों को पाठकों तक पहुंचाने के काम से जुड़े हैं। साथ ही एकलव्य के “लाइब्रेरी से दोस्ती” कोर्स टीम के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं। पराग टाटा ट्रस्ट के लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स के 2021 बैच के साथी हैं।)
