प्राथमिक कक्षाओं में गणित विषय पढ़ाने का उद्देश्य केवल सवालों को हल करवाना और बच्चों को सही जवाब तक पहुंचाना भर नहीं है, इसका वास्तविक उद्देश्य गणितीय चिंतन का विकास करना है। उदाहरण के तौर पर कक्षा में जोड़ की अवधारणा पढ़ाते हुए आपने एक बच्चे की कॉपी का अवलोकन किया। आपने देखा कि एक बच्चा बड़े ध्यान से अपनी कॉपी में लिखता है: 28 + 15 = 313। आप उस बच्चे का उत्तर देखते हैं और सोचते हैं कि यह जवाब तो बिल्कुल गलत है।
क्या यह वाकई बच्चे द्वारा की गई सिर्फ एक गलती भर है। या फिर इसके पीछे बच्चे की एक पूरी सोच है जिस पर आपने अभी विशेष ध्यान नहीं दिया है? बच्चे जब जोड़ या घटाव के सवाल हल करते हैं तो उनकी गलतियाँ अचानक से नहीं होतीं।
ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि बच्चों की गलतियों में भी एक व्यवस्थित पैटर्न होता है। किसी सवाल को हल करने का उनका अपना एक तर्क या चिंतन (सोचने का तरीका) होता है। बच्चे के इस तर्क या सोचने के तरीके को समझना एक अच्छे शिक्षक की असली ताकत है। इससे आप बच्चे को उसकी जरूरत के अनुसार मदद करते हैं, जिससे बच्चे की अवधारणा स्पष्ट होती है और अंततः वह सही समझ के साथ किसी सवाल को हल करने में सक्षम हो जाता है।
सही जवाब नहीं, ‘सोचने का सही तरीका’ खोजें
अक्सर शिक्षक बच्चे के द्वारा हल किए सवाल का उत्तर देखते हैं और तुरंत “गलत जवाब है” ऐसा कहकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन शिक्षण का असली काम तो यहीं से शुरू होता है। आप बच्चे की कॉपी चेक करते समय उससे पूछिए कि तुमने यह सवाल कैसे हल किया? यह एक छोटा-सा सवाल है, जो बच्चे के चिंतन को समझने की खिड़की खोल देता है।
जैसे जब कोई बच्चा 28 + 15 लिखता है और जवाब 313 देता है, तो इसका मतलब है कि उसने 8 + 5 = 13 तो सही किया, लेकिन 13 में हासिल नहीं लिया। यानि उसकी प्रक्रिया आधी ही सही थी। इसे समझे बिना अगर हम उसके जवाब को “गलत” बोल दें, तो हम उसकी वास्तविक चुनौती (या ब्रेक डाउन) को कभी नहीं पहचान पाएंगे। ऐसी स्थिति में उसकी गलतियों की बार-बार पुनरावृत्ति होती रहेगी।
कक्षा अवलोकन पर आधारित हैं – जोड़ की गलतियों के ’11 प्रमुख पैटर्न’
कक्षा के अवलोकन से कुछ ऐसे पैटर्न सामने आए हैं जो बार-बार दिखते हैं। इन्हें जानना हर शिक्षक के लिए ज़रूरी है:
हासिल न लेना: जब इकाई का जोड़ 9 से अधिक हो जाए तो बच्चा पूरा जोड़ इकाई के नीचे लिख देता है। जैसे 28 + 15 का जवाब 313 आता है।
दहाई की तरफ से जोड़ने की शुरुआत करना: कई बार बच्चे दहाई की तरफ से जोड़ना शुरू करते हैं। ऐसी स्थिति में बिना हासिल वाले जोड़ तो सही हो जाते हैं, लेकिन हासिल वाले सवाल में यही पैटर्न गलत उत्तर का प्रमुख कारण बन जाता है। जबकि जोड़ की शुरुआत हमेशा इकाई की दिशा से करनी चाहिए। क्योंकि इकाईयों को मिलाकर अगर दहाई बनती है तो उसे हासिल के रूप में दहाई की संख्या में जो़ड़ते हैं और शेष इकाइयों को इकाई के नीचे लिख देते हैं।
प्रतीक की उलझन: कुछ बच्चे जोड़ के प्रतीक (+) को गुणा (×) समझ लेते हैं।
इकाई-दहाई के स्थान की अदला-बदली: 25 + 43 = 68 का सही जवाब होने के बाद भी बच्चा उत्तर 86 लिखता है — यानि वह अंकों की जगह बदल देता है।
शाब्दिक सवालों में उलझन: शब्दों से बना सवाल देखकर बच्चा पूछता है — “इसमें जोड़ना है या घटाना?”
गणित शिक्षण में क्या है ‘सीपीए अप्रोच’ क्या है?
प्रारंभिक कक्षाओं में गणित की अवधारणा पक्की करने के लिए सबसे कारगर तरीका है — सी-पी-ए (Concrete-Pictorial-Abstract) विधि। यह विधि बच्चे को ठोस अनुभव से शुरू करके धीरे-धीरे अमूर्त सोच तक ले जाती है।
C — ठोस चीज़ें (Concrete)
पहले बच्चों को तीली-बंडल, पत्थर, बटन या अन्य वस्तुएं देकर जोड़ करवाएं। खुली तीलियां = इकाई और 10 तीलियों का एक बंडल = दहाई। जब बच्चा अपने हाथों से गिनता है, तो अवधारणा उसके दिमाग में गहरी बैठती है।
P — चित्र (Pictorial)
अब बच्चे कागज़ पर गोले, टैली मार्क्स या बिंदु बनाकर संख्याओं को दर्शाएं। यह कदम ठोस से अमूर्त की ओर जाने का पुल है।
A — अमूर्त (Abstract)
अंत में बच्चे सीधे संख्याओं यानि अमूर्त प्रतीकों के साथ काम करते हैं। सवाल लिखते समय ऊपर “इ” (इकाई) और “द” (दहाई) ज़रूर लिखें — इससे बच्चों को जगह की समझ रहती है।
शाब्दिक सवाल — गणित विषय को बच्चों के जीवन से कैसे जोड़ें?
गणित की कक्षा हमेशा संख्याओं से शुरू नहीं होनी चाहिए। बच्चों की दुनिया से जुड़े शाब्दिक सवाल सबसे पहले उनके सामने चर्चा के लिए रखें।
जैसे — मोहन के पापा ने 4 रोटी खाई और माँ ने 6 रोटी — दोनों ने कुल कितनी रोटियाँ खाई?” या “एक पेड़ पर 5 चिड़ियाँ बैठी थीं, 15 और चिड़ियाँ आ गईं — अब पेड़ पर कुल कितनी चिड़ियाँ बैठी हैं?” जब सवाल बच्चे के अपने जीवन से जुड़ा हो, तो वह न सिर्फ उत्तर ढूंढता है बल्कि सोचता भी है।
यही सोचने की आदत उसे गणित में आगे ले जाती है। शाब्दिक सवाल बच्चे को यह समझने में मदद करते हैं कि किस स्थिति में जोड़ करना है और किसमें घटाव।
शिक्षक की भूमिका — अवलोकन करें, समझें और सटीक सहयोग करें
एक अच्छे शिक्षक का काम सिर्फ सही सवाल का सही जवाब बताना नहीं है। वास्तविक काम है — बच्चे की गलती में छुपे पैटर्न (लॉजिक) को समझना। जब शिक्षक बच्चे की गलतियों के पैटर्न को पहचान लेता है, तो वह पूरी कक्षा को उस बिंदु पर विशेष पर सटीक फीडबैक और अभ्यास दे सकते हैं।
कभी-कभी कक्षा में एक बच्चा ऐसा होता है जो कठिन सवाल भी चुटकियों में हल कर लेता है। उसकी रणनीति क्या है? ऐसे प्रयास को “ब्राइट स्पॉट” की तरह पूरी कक्षा के सामने रखें। एक बच्चे की समझ दूसरे बच्चों के लिए सबसे असरदार शिक्षक बन सकती है।
बच्चों को हमेशा सटीक फीडबैक दें। आपका जवाब “गलत है” ऐसा कहने की बजाय कहें: “तुमने दहाई की तरफ से जोड़ना शुरू किया — इकाई की तरफ से जोड़ करके देखो।” यह एक छोटा-सा बदलाव बच्चे को यह समझाता है कि वह कहाँ भूल कर रहा है और कहाँ उसे सुधार करना है। सटीक फीडबैक आता है, सटीक अवलोकन से, यानि बच्चे जब सवालों को हल कर रहे हों को कक्षा-कक्ष में घूमकर अवलोकन करें।
गलतियाँ हैं ‘सीखने की वास्तविक सीढ़ी’
जब शिक्षक यह समझ लेता है कि बच्चे की हर गलती उसकी सोच की एक झलक है, तो उसके शिक्षण का नज़रिया ही बदल जाता है।
गणित विषय में गलतियाँ दुश्मन नहीं हैं — वे एक ऐसा रोडमैप हैं, जो बताती हैं कि किसी बच्चे को वास्तविक सहयोग की जरूरत कहाँ पर है। इसके आधार पर कक्षा-कक्ष के शिक्षण और बच्चों के साथ होने वाले रेमेडियल को ज्यादा योजनाबद्ध और बच्चों की जरूरत के अनुरूप बनाया जा सकता है। तो अगली बार जब कोई बच्चा किसी सवाल का गलत जवाब लिखे तो आप क्या करेंगे? थोड़ा रुकिए और जिज्ञासा भरे भाव के साथ बच्चे से पूछिए: “आपने इस सवाल को कैसे हल किया?”
इस एक सवाल में गणित के प्रभावी शिक्षण का रहस्य छिपा है। शिक्षण को ‘बाल केंद्रित’ बनाने से बच्चों के सीखने में बेहतरी आती है और वे उस विषय के साथ एक स्वाभाविक जुड़ाव बना पाते हैं।
