
समरहिल एक आधुनिक स्कूल है। इसकी सबसे प्रमुख बात है आजादी। खेलने की आजादी, पढ़ने की आजादी, कमरों को अपनी मर्जी से रखने की आजादी। समरहिल के इस गुण को न देखकर अखबारों में इसे ‘मनमर्जी का स्कूल’ कहा जाता है। अखबार वाले इसे बिना कायदा-कानून, शिष्टाचार आदि से रहित स्कूल मानते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। यहाँ के विद्यार्थी किसी पब्लिक स्कूल के जबरन लादे गए अनुशासन के बिना भी अनुशासित हैं। समरहिल में जो प्रयोग शुरू किया गया था उसने यह साबित कर दिया कि आजादी एक कारगर चीज है।
समरहिल की स्थापना 1921 ई. में जर्मनी में हुई थी। 1923 में यह लंदन से करीब सौ मील दूर लाइस्टन गाँव में ले आया गया। यहाँ पाँच से पंद्रह-सोलह साल तक के बच्चे आते हैं। ये बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्राजील, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों के होते हैं। इन्हें उम्र के हिसाब से अलग-अलग समूहों में बाँट कर शिक्षा दी जाती है। बच्चों को इस बात की पूरी छूट होती है कि वे कक्षाओं में जाएँ या नहीं जाएँ। लेकिन ऐसा कम ही होता है कि वे कक्षाओं में नहीं जाते। जो बच्चे थोड़े बड़े होने पर समरहिल आते हैं वे शुरू-शुरू में इस आजादी का लाभ उठाते हुए कक्षाओं में नहीं आते हैं। धीरे-धीरे वे नियमित कक्षाओं में आने लगते हैं।
आजादी और भयमुक्त माहौल का असर
यह आजादी का ही प्रभाव है कि बच्चे यहाँ खुश रहते हैं। उन्हें घर की याद परेशान नहीं करती। आपस में बच्चे ज्यादा लड़ते भी नहीं हैं। वे यहाँ रोते भी नहीं। उनके मन में घृणा का भाव नहीं होता। मन में घृणा के दबे होने के कारण ही बच्चे रोते हैं, लड़ाई-झगड़ा करते हैं।
यहाँ बच्चों को दंड भी नहीं दिया जाता। शिक्षक यहाँ चीखते-चिल्लाते नहीं हैं। बच्चे उनसे जरा भी नहीं डरते। बच्चे तो मुझसे भी नहीं डरते। एक बार की बात है, रात के करीब ग्यारह बजे पहली मंजिल पर बच्चे तकियों से युद्द कर रहे थे। मैं अपनी मेज पर बैठा लिख रहा था। मुझे परेशानी हो रही थी। मैं उनसे इस बात की शिकायत करने को उठा। मैं बारामदे में गया तो बच्चे छुप गए। शान्ति छा गई। तभी कहीं से आवाज आई – “अरे! यह तो नील है!” बच्चे बाहर निकल आए और फिर से हल्ला-गुल्ला करने लगे। वे इसलिए छुप गए थे कि उन्हें लगा था – सोने का समय जाँचने वाला लड़का आ गया है। मैंने उन्हें समझाया कि मैं नीचे बैठकर एक किताब लिख रहा हूँ तो वे मान गए।
मैं नहीं चाहता कि बच्चे बड़ों से डरें। माता-पिता अगर बच्चों को डराते हैं तो वे गलत करते हैं। इससे बच्चे माता-पिता से नफरत करने लगते हैं। समरहिल में कोई बच्चा अगर कोई शीशा तोड़ता है तो वह आकर मुझसे कहता है – “नील मैने इतने शीशे तोड़े।”
शीशे तोड़ने पर स्कूल की आम सभा चाहे तो उसे दंड दे सकती है। यह दंड शारीरिक नहीं होता। बस उसे अपनी जेब खर्च से शीशे जुड़वाने का खर्च देना पड़ सकता है। स्कूल की आम सभा बच्चों द्वारा ही संचालित होती है। कोई नियम बनाने या उसे वापस लेने का अधिकार आम-सभा को ही होता है। इस आम सभा में एक बच्चे को भी उतना ही अधिकार है जितना मुझे या किसी शिक्षक को। मेरा भी कोई प्रस्ताव बच्चे नहीं मान सकते हैं। मैं अपनी बात कभी भी नहीं मनवाता।
स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचार को महत्व
समरहिल में बच्चे जैसे हैं, उसी रूप में बने रह सकते हैं। जिसकी रूचि जिस काम में हो, वह कर सकता है। कोई चाहे तो दिन-भर कारखाने में बैठकर ठोक-पीट सकता है, चाहे तो खेल सकता है। यहाँ किसी को जबरदस्ती संगीत या गणित नहीं सिखाया जाता। किसी को जबरदस्ती सिखाने से वह सीख तो जाता है लेकिन तब एक आज्ञाकारी, लीक पर चलने वाला वयस्क ही आगे चलकर हमें मिल सकता है। उनकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं होती, वे दूसरों की हाँ में केवल हाँ मिलाने वाले होते हैं।
बच्चों को सिखाने के लिए ली जाने वाली परीक्षाओं, अंक और इनाम के पक्ष मैं भी मैं नहीं हूँ। इनसे बच्चों का सही विकास नहीं होता। मैं बच्चों को बड़े-बड़े भाषण और नैतिक उपदेश देने के भी खिलाफ हूँ। बच्चों के लिए पिटाई को मैं सबसे खराब चीज मानता हूँ। जो माता-पिता या शिक्षक यह मानते हैं कि बच्चों को पीट-पीट कर ठीक किया जा सकता है, वे गलत हैं। पिटाई से बच्चे का नुकसान ही होता है। वे हीन-भाव से ग्रसित तो होते ही हैं, पिटाई करने वालों से घृणा भी करने लगते हैं।
मैं बच्चों के मन में जबरन आदर का भाव भी नहीं भरना चाहता। वे मुझे या स्कूल के शिक्षकों को नाम लेकर पुकार सकते हैं। मैं यह भी नहीं चाहता कि बच्चों को जबरन ‘धन्यवाद’ या ‘माफ कीजिए’, बोलना सिखाया जाय।
समरहिल में बच्चे गालियाँ बकते भी देखे जा सकते हैं। उन्हें इसके लिए भी नहीं टोका जाता। किसी भी बात के लिए रोक-टोक दरअसल बच्चों के मन को दबाना होता है, जो बच्चों के मन में कुंठा पैदा करती है। मैं एक गाली देने वाले या डॉक्टर-इंजीनियर न बनकर सफाई कर्मचारी बनने वाले आदमी को एक कुंठित आदमी से ज्यादा अच्छा मानता हूँ।
क्या हैं आजादी के मायने?
समरहिल में हर तरह की आजादी का मतलब यह नहीं है कि यहाँ कोई नियम-कानून नहीं है या कोई रूटीन नहीं है। बच्चों की आजादी पर दो-एक जगह रोक भी है। लेकिन यह रोक वहीं पर है जहाँ उनके जीवन को कोई खतरा हो। जैसे कि वे छत पर नहीं खेल सकते। या समुद्र में बिना शिक्षकों की उपस्थिति के नहीं नहा सकते। इसी तरह कोई बच्चा अगर चाहे कि वह आकर मेरी मेज पर कीलें ठोके तो इसकी अनुमति उसे नहीं होगी।
मैं जोर देकर यह कह सकता हूँ कि “यह मेज मेरी है, इस पर तुम कील नहीं लगा सकते।” ठीक इसी तरह कोई बच्चा मुझे अपनी साइकिल छूने से मना कर सकता है या अपने जन्म-दिन की पार्टी से अपने कमरे से बाहर जाने को कह सकता है। आजादी को मैं उस सीमा तक स्वीकार करता हूँ जब तक वह किसी दूसरे की आजादी में खलल न डाले।
समरहिल का एक रूटीन भी है लेकिन शिक्षकों के लिए भले ही यह अनिवार्य हो, बच्चों के लिए नहीं है। सुबह का नाश्ता, कक्षा, भोजन, शाम की चाय, सबका समय निर्धारित है। हस्त-शिल्प का कोई समय निर्धारित नहीं है। शाम में सिनेमा, संगीत, नृत्य, नाटक वगैरह होते रहते हैं। इसके बावजूद समरहिल को एक ऐसा स्कूल कहा जा सकता हैं जहाँ खेल ही सबसे अधिक होता हो। खेल से मेरा मतलब मैदानों या अखाड़ों पर व्यवस्थित ढंग से खेले जाने वाले खेल से नहीं है। समरहित में बच्चे अपनी कल्पना-जगत के खेल खेलते हैं – डाकू-डाकू का खेल, भूत का खेल, गुड़िया का खेल, मिट्टी का खेल। ऐसे खेल खेलते-खेलते बच्चे व्यवस्थित ढंग में हॉकी या टेनिस खेलना भी सीख ही जाते हैं। जिन माता-पिता को लगता है कि दिन-भर खेलने से उनका बच्चा पढ़ाई कैसे सीखेगा? उनको मैं कहता हूँ – अगर आपका बच्चा जी भरकर खेलता है तो वह बहुत कम समय की पढ़ाई में ही अपना पाठ पूरा कर लेगा।”
समरहिल में बच्चे नाटक भी खूब किया करते हैं। सर्दियों में रविवार की शाम वे अभिनय का मजा लेते हैं। नाटक भी प्रायः बच्चे ही लिखते हैं। कभी-कभी शिक्षक भी। दूसरों के नाटक चुराना उन्हें पसंद नहीं। एक बार जल्दबाजी में मुझे ही नाटक तैयार करना था। मैंने डब्ल्यू. डब्ल्यू. जेकब की कहानी को आधार बनाकर एक नाटक लिख दिया। बच्चे मुझे ‘नकलची’ और ‘चोर’ कहने लगे!
नाटकों में जरूरी पोशाकें भी बच्चे स्वयं तैयार करते हैं। वे मंच पर जाने में नहीं झिझकते। अभिनय करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।
बच्चों के नाटकों में कई बार मजेदार दृश्य भी देखने को मिलते हैं। एक बार छोटे बच्चों के लिए लिखे गए नाटक में बच्चों के भोजन करने का दृश्य था। मंच पर खाने-पीने की चीजें रखी थीं। बच्चे खाने-पीने मैं इतने रम गए कि अगले दृश्य पर जाने की उन्हें परवाह ही नहीं रही। पर्दे के पीछे जो प्रॉम्टर था, उसने बड़ी मुश्किल से इन अभिनेताओं को अगले दृश्य की ओर बढ़ाया था!
इसी तरह नृत्य-संगीत की बात है। बच्चे अपनी रुचि का संगीत सुन सकते हैं, अपने पद-संचालन से नाच सकते हैं। रोज शाम वे मेरे कमरे में जमा हो जाते हैं। बच्चों को ज्यादातर जैज़ संगीत ही पसंद आता है। जब मैं जैज़ से परेशान हो जाता हूँ तो यह नियम लागू कर देता हूँ कि चूँकि यह कमरा मेरा है, यहाँ वही संगीत बजेगा जो मुझे पसंद है। अब वे ही बच्चे कमरे में बच जाते हैं जिन्हें शास्त्रीय-संगीत पसंद हो। लेकिन ऐसा भी नहीं कि अपनी तरह शास्त्रीय संगीत सुनने वाले बच्चों को मैं अलग से प्रोत्साहित करता हूँ। मेरे लिए जैज़ सुनने वाले बच्चे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मैं किसी भी बच्चे से घृणा नहीं करता। इसी तरह किसी भी बच्चे को किसी से ज्यादा प्यार नहीं करता। हालाँकि कुछ बच्चे मुझे भी अधिक अच्छे लगते हैं लेकिन मैं किसी के सामने यह जताता नहीं हूँ।
समरहिल का वातावरण विश्वास देता है, बच्चों को सुरक्षा देता है। यहाँ संवेदनशीलता है। यहाँ दोषारोपण नहीं होता। बच्चे अमूमन झूठ नहीं बोलते। जब बच्चे आजाद होते हैं तो उन्हें ज्यादा झूठ बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक बार हमारे गाँव का थानेदार एक बच्चे की बात सुनकर चौंक गया। वह बच्चा कह रहा था – “नील! मुझसे बाहरी बैठक की खिड़की का शीशा टूट गया है!” बच्चे डर से ही झूठ बोलते हैं। अगर उन्हें डर नहीं होगा तो वे झूठ क्यों बोलेंगे?
समरहिल में बच्चों को आज्ञा पालन करना भी नहीं सिखाया जाता। साफ-सफाई भी बच्चों की मर्जी पर छोड़ दिया जाता है। यहाँ बच्चों को शोर करने की भी मनाही नहीं है। यहाँ बच्चों को शुद्ध आचरण का पाठ भी नहीं पढ़ाया जाता। न ही किसी धर्म या नैतिकता की बात यहाँ की जाती है।
समरहिल को चलाने में मेरे अलावे मेरी पत्नी और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये सभी अपार धैर्य वाले लोग हैं। यह धैर्य किसी जादू से नहीं आता बल्कि लगातार अभ्यास से आता है। अपने अध्यापक-जीवन की शुरुआत में मैं भी बच्चों पर हाथ उठा लेता था। लेकिन समरहिल के इन चालीस वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ।
मुझे इस बात का कोई घमंड नहीं है कि मैंने शिक्षा में अंतिम काम कर दिया है। लेकिन दुनिया जल्द एक बेहतर शिक्षा-पद्धति ढूँढ़ ले तो अच्छा होगा। अभी जो शिक्षा-पद्धति है, उसमें मेरा ज़रा भी विश्वास नहीं है।
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