दार्शनिक जॉन लॉक की धारणा थी कि उपदेश से नहीं, उदाहरण और संगति से ही बालकों में सदगुणों का विकास संभव है। इसलिए शाला, परिवार और समाज में उचित वातावरण का विकास एक शैक्षणिक आवश्यकता है। इसी प्रकार उन्होंने पाठ्यक्रम में तर्कशास्त्र और प्राचीन दर्शनों की बजाय लॉक ने प्राकृतिक विज्ञानों के अध्ययन का आग्रह किया,जो एक अनुभववादी के लिए स्वाभाविक भी था। बल-प्रयोग दूसरे के व्यक्तित्व की अवमानना है जबकि शिक्षा में दूसरे के व्यक्ति के सम्मान का भाव अंतर्निहित है, इसलिए लॉक ने शिक्षण प्रक्रिया में बल प्रयोग को अनुचित ठहराया और अनुशासन के लिए भी बल-प्रयोगी की बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रशंसा की प्रेरणा पर ज़ोर दिया।
यह आश्चर्यजनक है कि भाषा-शिक्षण के बारे में लॉक के विचार बहुत आधुनिक थे। उनकी धारणा थी कि भाषा का सही और सहज ज्ञान उसके प्रयोग के वातावरण में ही संभव है। लॉक इस तर्क द्वारा लैटिन को अनिवार्य तौर पर पढ़ाए जाने का विरोध कर रहे थे। वे किसी भी विदेशी भाषा को अनिवार्यतः थोपे जाने के विरोधी थे। इसके साथ-साथ वह पाठ्यक्रम में व्याकरण के नियमों की शिक्षा को कम से कम कर देने के समर्थक थे। लॉक के शिक्षा दर्शन पर टिप्पणी करते हुए एक लेखक ने कहा है कि उनका मुख्य उद्देश्य एक उदार वैश्विकता की भावना का विकास तथा सभी प्रकार के पूर्वग्रहों, संकीर्णताओं और क्षेत्रीयताओं की अवमानना करना है।
(साभारः वाग्देवी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘आधुनिक विचार’ में संकलित ‘अनुभव का आग्रहः लॉक’ से यह अंश लिया गया है, जो शिक्षा पर लॉक के विचारों को सामने लाता है।)
