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शिक्षा और संप्रेषण पर जॉन डिवी के विचार

मिट्टी के खिलौने, बच्चा का खेल, गांव का जीवन, बच्चे कैसे सीखते हैं

एक आदिवासी गांव में मिट्टी से खिलौने बनाते छोटे बच्चे।

दार्शनिक जॉन डिवी की किताब का नाम है ‘शिक्षा और लोकतंत्र’। इसमें शिक्षा और लोकतंत्र के आपसी रिश्ते की पड़ताल करते हुए विभिन्न विषयों पर विचार किया गया है। ग्रंथ शिल्पी से प्रकाशित इस किताब का हिंदी में अनुवाद लाडली मोहन माथुर ने किया है। इस पोस्ट में पढ़िए इस किताब के प्रमुख अंश।

स्कूली शिक्षा सचमुच संप्रेषण के अनेक साधनों में से एक है जिससे अपरिपक्व लोगों के स्वभाव का निरूपण किया जाता है; लेकिन यह अन्य साधनों में से ही एक साधन है और अपेक्षाकृत ऊपरी साधन है। “

विचारों की समानता

जॉन डिवी कहते हैं, “व्यक्ति समुदाय में रहते हैं क्योंकि उनके बीच कुछ सामान्य बातें होती हैं; और संप्रेषण ऐसा रास्ता है जिससे वे उन सामान्य वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। एक समुदाय व समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि उनके बीच कुछ बातें सामान्य हों। ये बातें हैं: लक्ष्य, आस्थाएं, आकांक्षाएं, ज्ञान और आम समझ। समाजशास्त्रियों की शब्दावली का उपयोग करें तो कहा जाएगा, विचारों की समानता। ये बातें, एक से दूसरे को, भौतिक रूप में नहीं दी जा सकती हैं, जैसे ईंटें दी जा सकती हैं; उन्हें लोग उस प्रकार नहीं बांट सकते जैसे समोसे या गुझिया के स्थूल टुकड़ों को बांटकर खाते हैं।

सामान्य विचारों में भागीदारी ऐसे संप्रेषण से उत्पन्न होती है जिससे समान भावनात्मक और बौद्धिक स्वभाव का निर्माण होता है, अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के प्रति समान अनुक्रिया का निर्माण होता है।”

सहमति के लिए संप्रेषण जरूरी है

समाज का निर्माण उसमें रहने वाले लोगों की शारीरिक निकटता से नहीं होता। इसी प्रकार, किसी व्यक्ति पर सामाजिक प्रभाव पड़ना केवल इस कारण से बंद नहीं होता कि वह दूसरे लोगों से कुछ फीट या मीलों की दूरी पर रहता है। एक दूसरे से हजारों मील की दूरी पर रहने वाले व्यक्तियों के बीच जितनी घनिष्टता एक पुस्तक या पत्र के द्वारा कायम हो सकती है, उतनी घनिष्टता एक छत के नीचे रहने वाले लोगों के बीच भी नहीं हो सकती। 

ऐसे व्यक्तियों से भी सामाजिक समूह का निर्माण नहीं होता जो सभी सामान्य लक्ष्य के लिए काम करते हों। एक मशीन के पुर्जे समान नतीजे हासिल करने के लिए अधिकतम सहयोग से काम करते हैं, लेकिन वे समुदाय का रूप नहीं लेते। लेकिन यदि वे सब सामान्य लक्ष्य को पहचानते हों और सभी उसमें इतनी रुचि रखते हों कि अपनी विशेष क्रिया को उसी दृष्टि से नियमित करते हों तो वे समुदाय का रूप ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए संप्रेषण की जरूरत होगी। इनमें से हर एक को जानना होगा कि दूसरा क्या कर रहा है और हर एक को अपने प्रयोजन और प्रगति के बारे में दूसरे को किसी न किसी प्रकार बताना होगा। सहमति के लिए संप्रेषण जरूरी है।

समाज के मशीनी रिश्ते

अतः हम यह मानने के लिए विवश होते हैं कि सर्वाधिक सामाजिक समूह में भी ऐसे अनेक संबंध होते हैं जो आज तक सामाजिक नहीं बन सके हैं। किसी भी सामाजिक समूह में अनेक ऐसे मानव संबंध होते हैं जो अभी तक मशीनी स्तर पर ही कायम हैं। जो आप चाहते हैं, उन परिणामों को पाने के लिए व्यक्ति एक दूसरे का उपयोग करते हैं, और ऐसा करते समय, वे उन लोगों के भावनात्मक और बौद्धिक मिजाज की परवाह नहीं करते जिनका वे उपयोग करते हैं। दूसरे का इस प्रकार उपयोग करके वे अपनी शारीरिक श्रेष्ठता अथव अपनी स्थिति, कौशल, तकनीकी योग्यता अथवा अपने मशीनी या वित्तीय साधनों की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करते हैं।

जब तक माता-पिता और संतान, शिक्षक-छात्र, मालिक और नौकर, शासक और शासित के बीच संबंध इस स्तर पर कायम रहते हैं तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि वे वास्तविक सामाजिक समूह के अंग हैं, भले ही अपनी-अपनी गतिविधियों के कारण उनके बीच कितनी ही निकटता क्यों न हो। आदेश देने और आदेश लेने से क्रिया और परिणाम का स्वरूप तो बदल सकता है लेकिन उससे प्रयोजनों की भागीदारी पैदा नहीं होती, सरोकारों का संप्रेषण नहीं होता।

सामाजिक जीवन न केवल संप्रेषण से अभिन्न होता है बल्कि सभी प्रकार का संप्रेषण (अतः सभी प्रकार का वास्तविक सामाजिक जीवन) शिक्षाप्रद होता है। संप्रेषण की प्राप्ति से अनुभव की वृद्धि होती है और उसमें परिवर्तन होता है। संप्रेषण करने वाला भी इस प्रक्रिया में प्रभावित होता है।

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