‘शिक्षा और लोकतंत्र’ पर जॉन डिवी के विचार

शिक्षा दार्शनिक, जॉन डिवी के विचार

जॉन डिवी का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो स्कूल छोड़ने के बाद भी काम आए।

दार्शनिक जॉन डिवी की किताब का नाम है ‘शिक्षा और लोकतंत्र’। इसमें शिक्षा और लोकतंत्र के आपसी रिश्ते की पड़ताल करते हुए विभिन्न विषयों पर विचार किया गया है। ग्रंथ शिल्पी से प्रकाशित इस किताब का हिंदी में अनुवाद लाडली मोहन माथुर ने किया है। इस पोस्ट में पढ़िए इस किताब के प्रमुख अंश।

“स्कूल के अंदर सीखने की निरंतरता स्कूल के बाहर किए जाने वाले सीखने (अधिगम) के साथ-साथ होनी चाहिए। दोनों के बीच उन्मुक्त अंतःक्रिया होनी चाहिए। यह तभी संभव है जब स्कूल के भीतर की सामाजिक अभिरुचियों का स्कूल के बाहर की सामाजिक अभिरुचियों के साथ अनेक स्थलों पर संपर्क हो।

एक ऐसे स्कूल की कल्पना की जा सकती है जिसमें बंधुत्व और साझे क्रियाकलाप की भावना तो हो लेकिन जिसमें सामाजिक जीवन बाहर की दुनिया में इतना कटा हुआ हो जितना एक मठ में होता है। ऐसे स्कूल में सामाजिक सरोकार और समझ तो विकसित होगी लेकिन स्कूल के बाहर उनका उपयोग नहीं हो सकेगा; उन्हें स्कूल के बाहर प्रयोग नहीं किया जा सकेगा। ऐसे स्कूल में जो एकांत शैक्षिक जीवन होगा वह नागरिक जीवन से कटा हुआ होगा। भूतकाल की संस्कृति से जुड़े रहने से पैदा होने वाली सामाजिक भावना भी इसी प्रकार की होगी, क्योंकि उसमें एक व्यक्ति अपने समय के जीवन से इतना नहीं जुड़ पाएगा जितना किसी अन्य काल के जीवन से जुड़ा रहेगा। जो शिक्षा प्रकटतः सांस्कृतिक होती है उसके लिए यह खतरा विशेष रूप से रहता है।

आदर्शीकृत भूतकाल से भावना को प्रश्रय तथा सांत्वना मिलती है; वर्तमान काल के सरोकार क्षुद्र तथा ध्यान देने के अयोग्य माने जाते हैं। लेकिन सामान्यतः स्कूल की विलगता का मुख्य कारण यह है कि उसमें उस सामाजिक पर्यवरण का अभाव होता है जिसके संबंध में अधिगम की आवश्यकता होती है; और इसी विलगता के कारण स्कूल में प्राप्त किया गया ज्ञान जीवन में प्रयोग किए जाने योग्य नहीं रहता और इसलिए निष्फल होता है।”

1 Comment

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