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स्कूल छोड़ने के बाद भी काम आए शिक्षा- जॉन डिवी

शिक्षा दार्शनिक, जॉन डिवी के विचार

जॉन डिवी का मानना था कि शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन और प्रयोगशीलता की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए।

शिक्षा दार्शनिक जॉन डिवी का विचार था कि परिवेश और उसके साथ मनुष्य सम्बन्ध सतत (continuous)और गतिशील (dynamic) है। ऐसे में शिक्षा भी एक सतत और गतिशील प्रक्रिया के रूप में होनी चाहिए। तभी वह परिवेश को नियन्त्रित कर सकने में मनुष्य को निरंतर योग्य बनाए रख सकती है। शिकागो के शिक्षा-स्कूल में डिवी ने निरंतर प्रयोग किये और उनके आधार पर बाद में ‘डेमोक्रेसी एण्ड एजुकेशन’ नाम से एक किताब लिखी।

डिवी का मानना था कि आज जिस बच्चे को शिक्षा दी जानी है, उसे कल के परिवेश की नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि परिवेश निरंतर विकासशील है और इन चुनौतियों से संघर्ष के माध्यम से ही मनुष्य का नया विकास संभव है। इसलिए जरूरी है कि बच्चों की शिक्षा के लक्ष्यों और प्रक्रिया का निर्धारण कल के परिवेश की सम्भावित चुनौतियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

प्रयोग और परिवर्तन की गुंजाइश

इन चुनौतियों के स्वरूप और प्रक्रिया का अलग-अलग समाजों में अलग-अलग होना स्वाभाविक है। अतः शिक्षा का कोई भी सार्वभौमिक मॉडल भी तैयार नहीं किया जा सकता है। इसमें प्रयोगशीलता और परिवर्तन की गुंजाइश बराबर बनी रहनी चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में ये विचार क्रांतिकारी महत्व रखते हैं क्योंकि उनसे पहले शिक्षा की प्रक्रिया किसी भी समाज की रूढ़िबद्ध धारणाओं और अधिक से अधिक तात्कालिक आवश्यकताओं के आधार पर तय होती थी।

इस अर्थ में जॉन डिवी क्रांतिकारी शिक्षाशास्त्री थे क्योंकि उन्होंने कल की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा देने पर जोर दिया। इसके साथ ही यह भी माना कि स्कूल छोड़ने का तात्यपर्य शिक्षा की प्रक्रिया का पूर्ण हो जाना नहीं है। शिक्षा एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। इसलिए यह स्वाभाविक ही लगता है कि डिवी ने सैद्धांतिक या किताबी शिक्षा की बजाय व्यावहारिक शिक्षा पर अधिक ज़ोर दिया। इससे शिक्षार्थी परिवेश की चुनौतियों का सामना करने में अधिक समर्थ हो सकता है।

इससे स्पष्ट है कि स्कूल को एक छोटे-मोटे वर्कशॉप की तरह काम करना चाहिए। ताकि समाज की आवश्यकताओं और प्रक्रिया में शिक्षार्थी का प्रशिक्षण हो सके और स्कूल छोड़ने के बाद भी वह अफनी जानकारी और अनुभवों को बढ़ाता रह सके।

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