भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने में दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं पहली है पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा और दूसरी है प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास की उपेक्षा। आमतौर पर सरकारी स्कूलों में बड़ी कक्षाओं के ऊपर विशेष ध्यान दिया जाता है। छोटी कक्षाओं की उपेक्षा होती है।
इसके पीछे तर्क भी दिया जाता है कि आठवीं कक्षा तो इस साल पास होकर चली जायेगी, उनके लिए हमारे पास अगला साल नहीं होगा। पहली-दूसरी को तो बाद में भी समय देकर सिखाया जा सकता है। इस सोच के कारण बहुत से स्कूलों में हर साल पहली-दूसरी क्लास की उपेक्षा होती है और इसका सीधा असर बच्चों के अधिगम स्तर पर पड़ता है। जिन विद्यालयों में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और पहली-दूसरी कक्षा में पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, वहाँ के बच्चों की शैक्षिक स्थिति व अधिगम स्तर तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है।
बदलाव के लिए जरूरी है पहल करना
इस स्थिति में बदलाव के लिए बच्चों के ऊपर पहली कक्षा से ही ध्यान देने की जरूरत है। ताकि बच्चों को शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सिखाया जा सके और उनका स्कूल से जुड़ाव बना रहे। अगर कोई बच्चा शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सीख ले तो उसके नियमित स्कूल आने की संभावना बढ़ जाती है। मगर यह सारी चीज़ें तभी संभव है जब स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हों और पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना जरूरी माना जाता हो।
सभी बच्चों के सीखने में होने वाली प्रगति की नियमित समीक्षा की जाती हो। सतत एवम व्यापक मूल्यांकन का सही ढंग से इस्तेमाल होता हो। बच्चे को सीखने में कहां पर दिक्कत हो रही है, इस बारे में शिक्षक सोच रहे हों। साथ ही साथ समाधान निकालने की दिशा में कोशिश कर रहे हों।
इस बात को अब मस्तिष्क विकास के शोध भी सपोर्ट करते हैं कि आठ वर्ष की उम्र तक बच्चों के मस्तिष्क का तेजी से विकास होता है, इसलिए इस दौर में मिलने वाला सहयोग बच्चों के सीखने की एक मजबूत बुनियाद तैयार करने की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है।
इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाये कि यह सारी चीज़ें किसी दबाव में न हो रही हों बल्कि सहज ढंग से हो रही हों। विभिन्न राज्यों में जमीनी स्तर पर काम करने के अनुभव बताते हैं कि ऊपरी दबाव से सीसीई (CCE) या अन्य किसी योजना के रजिस्टर तो भरवाये जा सकते हैं, कक्षा में पढ़ाना सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।
‘डायरी भरी हुई है’ तो सब ठीक है?
बहुत से साथियों को लगता है कि अगर डायरी भरी हुई है तो सब ठीक है। शिक्षा क्षेत्र में काम करने वालों की भाषा में इसे ‘बचाव का तरीका’ कहा जाता है। जब हमारा सारा जोर बचाव के नये-नये तरीके खोजने में लगा रहेगा तो जाहिर है कि हम स्कूल की वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा में ख़ास प्रयास नहीं कर पाएंगे। (डायरी जिस उद्देश्य से भरी गई है यानि कक्षा-कक्ष में शिक्षण के लिए, वह प्रभावशाली ढंग से होना जरूरी है।)
अगर शिक्षक अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं। क्लासरूम में पढ़ा रहे हैं। बच्चों का नियमित आकलन कर रहे हैं। चीज़ों को समझने और बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं तो स्कूलों की चुनौतियों का समाधान होता है। चुनौतियों का स्वरूप बदलता रहता है, नई-नई चुनौतियों के आने को बदलाव की यात्रा के अलग-अलग पड़ाव के रूप में देखना चाहिए।
पहली जुलाई को किसी क्लास विशेष की जो स्थिति थी, वह स्थिति 15 अगस्त को नहीं होती। शिक्षक दिवस के दिन शिक्षक आपस में स्कूल के जिन मुद्दों पर बात कर रहे होते हैं, वह बाल दिवस (14 नवंबर) आते-आते पूरी तरह बदल जाते हैं। यानि समय के साथ बच्चों के सीखने की स्थिति में और उसके अनुसार शिक्षण की रणनीति और प्राथमिकता में भी बदलाव होता दिखाई देना चाहिए।
सफलता का एक उदाहरण
नवंबर की परीक्षाओं या आकलन के बाद पूरे स्कूल की वास्तविक स्थिति सामने होती है। इसके बाद फिर नए सिरे से रणनीति तैयार होती है कि स्कूल को आगे कैसे ले जाना है? कौन सी क्लास के बच्चे कहां पीछे रह रहे हैं, उनको कैसे सपोर्ट किया जा सकता है। प्लानिंग में क्या बदलाव करने की जरूरत है?
उदाहरण के तौर पर एक स्कूल की पहली कक्षा में प्रथम आकलन के समय मात्र तीन बच्चों की स्थिति बहुत अच्छी थी। जबकि 17 बच्चे सीखने के लिए संघर्ष कर रहे थे। मगर दूसरे आकलन के दौरान 12-13 बच्चों की स्थिति तीन बच्चों जैसी थी। ऐसी बेहतरी का श्रेय निश्चित रूप से शिक्षक की सजगता और चुनौती को एक अवसर के रूप में देखने वाले नज़रिये को जाता है।
आखिर में कह सकते हैं कि बच्चों के सीखने में वैयक्तिक विभिन्नता होती है, यानि हर बच्चे के सीखने की गति, सटीकता और सीखने में लगने वाला समय अलग-अलग होता है। इसलिए सभी बच्चों को पूरी कक्षा के साथ अवसर देते हुए, सीखने में सहयोग की अपेक्षा रखने वाले बच्चों के साथ रेमेडियल शिक्षण करना चाहिए।
यह बात सदैव ध्यान में रहनी चाहिए कि हर बच्चा विशिष्ट है, उसकी अपनी एक ख़ासियत है शिक्षा का काम उसकी अपनी विशिष्टता को मजबूत बनाना है। इसलिए कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहा है, या अभी संघर्ष कर रहा है, केवल इस कारण से उसकी उपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए।
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