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भारत में प्राथमिक शिक्षा की मूल समस्या क्या है?

बेहतर स्कूली शिक्षा के मूल में एक विचार है कि कोई भी बच्चा सीखने के मामले में पीछे नहीं छूटना चाहिए। यानि किसी भी स्कूल में पहली से आठवीं तक के सभी बच्चों के ऊपर ध्यान दिया जाना चाहिए। ताकि पूरे स्कूल का रिजल्ट बेहतर हो। पूरे स्कूल का अधिगम स्तर (लर्निंग लेवल) बेहतर हो। केवल भाषा ही नहीं। बल्कि गणित और अंग्रेजी में भी। विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में भी। कला और संगीत में भी। बच्चों में पढ़ने में रुचि विकसित करने के प्रयास हों।

भारत में शिक्षा, वास्तविक स्थिति, असली सवाल, समस्या और समाधान

भारत में लाखों बच्चे अभी भी स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।

भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने में दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं पहली है पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा और दूसरी है प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास की उपेक्षा। आमतौर पर सरकारी स्कूलों में बड़ी कक्षाओं के ऊपर विशेष ध्यान दिया जाता है। छोटी कक्षाओं की उपेक्षा होती है।

इसके पीछे तर्क भी दिया जाता है कि आठवीं तो इस साल पास होकर चली जायेगी। उनके लिए हमारे पास अगला साल नहीं होगा। मगर पहली-दूसरी को तो बाद में भी समय देकर सिखाया जा सकता है। इस सोच के कारण बहुत से स्कूलों में हर साल पहली-दूसरी क्लास की उपेक्षा होती है। इसका असर बच्चों के अधिगम स्तर पर पड़ता है।

बदलाव के लिए पहल

इस स्थिति में बदलाव के लिए बच्चों के ऊपर पहली कक्षा से ही ध्यान देने की जरूरत है। ताकि बच्चों को शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सिखाया जा सके और उनका स्कूल से जुड़ाव बना रहे। अगर कोई बच्चा शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सीख ले तो उसके नियमित स्कूल आने की संभावना बढ़ जाती है। मगर यह सारी चीज़ें तभी संभव है जब स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हों और  पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना जरूरी माना जाता हो।

सतत आकलन, भारत में प्रारंभिक शिक्षा, अर्ली लिट्रेसी

सतत आकलन से मिलती है शिक्षण योजना बनाने में मदद।

सभी बच्चों के सीखने में होने वाली प्रगति की नियमित समीक्षा की जाती हो। सतत एवम व्यापक मूल्यांकन का सही ढंग से इस्तेमाल होता हो। बच्चे को सीखने में कहां पर दिक्कत हो रही है, इस बारे में शिक्षक सोच रहे हों।

साथ ही साथ समाधान निकालने की दिशा में कोशिश कर रहे हों। इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाये कि यह सारी चीज़ें किसी दबाव में न हो रही हों बल्कि सहज ढंग से हो रही हों। ऊपरी दबाव से सीसीई के रजिस्टर भरवाये जा सकते हैं, कक्षा में पढ़ाना सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।

डायरी भरी हुई है तो सब ठीक है?

मगर बहुत से लोग इस बात को समझने से चूक जाते हैं। उनको लगता है कि अगर डायरी भरी हुई है तो सब ठीक है। शिक्षा क्षेत्र में काम करने वालों की भाषा में इसे ‘बचाव का तरीका’ कहा जाता है। जब हमारा सारा जोर बचाव के तरीके खोजने में लगा रहेगा तो जाहिर है कि हम स्कूल की वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा में ख़ास प्रयास नहीं कर पाएंगे।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया।

अगर शिक्षक अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं। क्लासरूम में पढ़ा रहे हैं। बच्चों का नियमित आकलन कर रहे हैं। चीज़ों को समझने और बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं तो स्कूलों की समस्याएं बदलती रहती हैं।

पहली जुलाई को किसी क्लास विशेष की जो स्थिति थी, वह स्थिति 15 अगस्त को नहीं होती। शिक्षक दिवस के दिन शिक्षक आपस में स्कूल के जिन मुद्दों पर बात कर रहे होते हैं, वह बाल दिवस (14 नवंबर) आते-आते पूरी तरह बदल जाते हैं।

सफलता का एक उदाहरण

नवंबर की परीक्षाओं या आकलन के बाद पूरे स्कूल की वास्तविक स्थिति सामने होती है। इसके बाद फिर नए सिरे से रणनीति तैयार होती है कि स्कूल को आगे कैसे ले जाना है? कौन सी क्लास के बच्चे कहां पीछे रह रहे हैं, उनको कैसे सपोर्ट किया जा सकता है। प्लानिंग में क्या बदलाव करने की जरूरत है?

उदाहरण के तौर पर एक स्कूल की पहली कक्षा में प्रथम आकलन के समय मात्र तीन बच्चों की स्थिति बहुत अच्छी थी। जबकि 17 बच्चे सीखने के लिए संघर्ष कर रहे थे। मगर दूसरे आकलन के दौरान 12-13 बच्चों की स्थिति तीन बच्चों जैसी थी। ऐसी बेहतरी का श्रेय निश्चित रूप से शिक्षक की सजगता और चुनौती को एक अवसर के रूप में देखने वाले नज़रिये को जाता है।

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2 Comments on भारत में प्राथमिक शिक्षा की मूल समस्या क्या है?

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