Site icon एजुकेशन मिरर

लायब्रेरीः पठन कौशल को बेहतर बनाती हैं कहानी की किताबें


लायब्रेरी की किताबें पठन कौशल को बेहतर बनाने का पासपोर्ट होती हैं। मगर यह छोटी सी बात किसी स्कूल में काम करने वाले शिक्षकों तक पहुंचाना मुश्किल होता है। क्योंकि उनको लगता है कि अगर कोई किताब फट गई, अगर कोई किताब गुम हो गई, अगर कोई किताब किसी बच्चे ने अपने घर पर रख ली तो उसके पैसे शिक्षक को अपनी जेब से भरने पड़ेंगे।
ऐसे में उनको छठीं, सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों को किताबें देना सबसे सुरक्षित लगता है। क्योंकि शिक्षक मानते हैं कि ये बच्चे किताबों को संभालकर रखेंगे। किताब ग़ायब होने पर दोगुनी क़ीमत जमा करने के डर से किताब तो बिल्कुल नहीं फाड़ेंगे।
यानि बच्चों के हाथों तक किताब न पहुंचने के लिए केवल शिक्षकों को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। इसके लिए ऐसी व्यवस्था भी जिम्मेदार है जो शिक्षकों से साल के आखिर में लायब्रेरी से गुम होने वाली किताबों के बदले पैसे की मांग करती है। या उन पर आर्थिक दण्ड लगाती है।

सभी बच्चों तक पहुंचे किताबें

कुछ राज्यों में इस आशय की सूचना स्कूलों के साथ साझा की गई कि आप किताबों का इस्तेमाल करेंगे। बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए देंगे और किताबें फटने या ग़ायब होने की स्थिति में आपके ऊपर कोई आर्थिक दण्ड नहीं लगाया जायेगा। अगर स्कूलों में लायब्रेरी के इतिहास पर नज़र डालें तो यह बात सामने आती है कि पहली से आठवीं तक के स्कूलों में लायब्रेरी की किताबें सिर्फ छठीं, सातवीं और आठवीं कक्षाओं के बच्चों को देनी की परंपरा रही है।
 
इस परंपरा को तोड़ने की चुनौती उन लोगों के सामने होती हैं जो चाहते हैं कि प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को भी किताबें मिलें। किसी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों के सामने इस बात को स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि अगर बच्चों को ऐसी किताबें पढ़ने का मौका मिलता है, जो उनके रुचि के अनुरूप हों। उनके पठन कौशल के अनुरूप हों तो बच्चे आसानी से बेहतप पाठक बनने की दिशा में बढ़ सकेंगे। किताबों के साथ उनका परिचय एक सीढ़ी की तरह होगा जो उनको पठन कौशल के एक स्तर से दूसरे व तीसरे स्तर पर लेकर जायेगा।

लायब्रेरी में क्या सीखते हैं बच्चे?

लायब्रेरी में विभिन्न किताबों से गुजरने की प्रक्रिया में बच्चे अपने पसंद की किताबें चुनना, किताबें पढ़ना, उनके बारे में अपना विचार बनाना और समझकर पढ़ने की आदत का विकास करते हैं। अपने क्लास के बाकी बच्चों के साथ किताबों के ऊपर चर्चा करते हुए अपनी भाषा का विकास करते हैं। लायब्रेरी में अपने साथी को किताबें पढ़ते देख उनके बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है कि मैं भी किताब अच्छे से पढ़ सकता हूँ। लायब्रेरी वाले कालांश में ऐसी बात ग़ौर करने पर दिखाई देती है।

बच्चों को कहानी के ऊपर चित्र बनाने का मौका भी देना चाहिए।

लायब्रेरी कालांश में होने वाले जोड़ों के पठन जैसी गतिविधियां बच्चों को एक-दूसरे से सीखने (पियर लर्निंग) का मौका देती हैं। इसके साथ ही दूसरे साथी के ग़लत पढ़ने पर सुधार का मौका भी देती हैं। इससे बच्चों के भीतर सहयोग की भावना का विकास होता है। बच्चों को आनंद के लिए पढ़ने का मौका मिलता है। ऐसे में बड़ी सहजता के साथ उनके पठन कौशल का तेजी से विकास होता है।

किताबें पढ़ने का मतलब केवल लिखी हुई सामग्री को पढ़ना भर नहीं होता। यह किताब में छपे चित्रों से मायने निकालने की कला का विकास करनाा भी होता है। बच्चों को अपनी रुचि के दायरे का विस्तार करने का मौका लायब्रेरी में मिलता है, क्योंकि यहां पर विभिन्न विषयों से जुड़ी किताबें होती हैं। स्वतंत्र रूप से पढ़ने की आदत का विकास आने वाले सालों में बच्चों के जीवन को बहुत गहराई से प्रभावित करता है।

शिक्षकों की राय

वे यहां से मिलने वाले अनुभव का इस्तेमाल क्लास में विभिन्न विषयों को समझकर पढ़ने के लिए करते हैं। लायब्रेरी की किताबों का नियमित लेन-देन करने, उनके ऊपर चर्चा करने से क्या फायदा है? ऐसे सवालों के ऊपर स्कूलों में बात होनी चाहिए। तभी लायब्रेरी की किताबों को कोर्स की किताबों के साथ होने वाली तुलना में कमतर करके नहीं देखा जायेदा। क्योंकि आमतौर पर हर शिक्षक को इस बात की चिंता होती है कि उनका कोर्स बाकी है। ऐसी ही एक चर्चा के दौरान एक शिक्षक साथी ने कहा, “बच्चों का सिलेबस बाकी है और आप चाहते हैं कि मैं कहानी सुनाऊं।”
इसी सिलसिले में एक अन्य अन्य शिक्षक साथी की कही बात ग़ौर करने लायक है। उन्होंने कहा, “अगर बच्चों ने तीसरी क्लास तक पढ़ना-लिखना नहीं सीखा तो फिर आगे उनको पढ़ना सिखना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि शुरुआती सालों में हम बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के साथ-साथ पढ़ने की आदत का विकास भी करें।”
Exit mobile version